1. 'दो चॉकलेट' में निपटेगी क्या यूपी की भूख!
रामलीला मैदान में राहुल-अखिलेश की गुफ्तगू..क्या सीटों के बंटवारे का सांकेतिक ट्रेलर?
जब चुनावी मंचों पर भाषण लंबे खिंच जाएं तो भूख लगना स्वाभाविक है, लेकिन सियासत में जेब से निकली चीज भी सुर्खियां बन जाती है. रामलीला मैदान की रैली में जब अखिलेश यादव ने राहुल गांधी से कुछ खाने को मांगा तो राहुल ने जेब से दो पैकेट चॉकलेट निकालकर मुस्कुराते हुए कहा-'दिनभर की खुराक हो गई'..अखिलेश ने भी तुरंत नहले पर दहला जड़ते हुए चुटकी ली 'नहीं भाई, मेरी खुराक ज्यादा है!' ठहाके तो गूंज उठे, लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक इस हल्के-फुल्के मजाक के गहरे मायने तलाशने में जुट गए हैं. सचमुच यूपी के सियासी दंगल में जब सीटों की हिस्सेदारी तय होगी, तो कांग्रेस की तरफ से मिलने वाली सीमित पेशकश से क्या सपा की बड़ी भूख शांत होगी? अब गठबंधन के भीतर यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि क्या दो चॉकलेट का यह संकेत भविष्य की सीट-शेयरिंग में मिठास घोलेगा या फिर खुराक की इस खींचतान में सियासी तल्खी बढ़ेगी?
2. कन्नड़ राज्योत्सव का बहाना या गुम हुई घड़ी का फसाना!
दिल्ली रैली से डीके शिवकुमार नदारद, सिद्धारमैया ने मंच पर जमाई पूरी धमक!
विपक्षी एकजुटता के महामंच पर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री तो पूरी मुस्तैदी से जुटे, लेकिन कर्नाटक के संकटमोचक कहे जाने वाले डीके शिवकुमार की गैर-हाजिरी ने कानाफूसियों का बाजार गर्म कर दिया. औपचारिक तौर पर तो कन्नड़ राज्योत्सव में व्यस्तता का हवाला दिया गया, अलबत्ता अंदरखाने की खबरें कुछ और ही राग अलाप रही हैं. सियासी गलियारों में चर्चा है कि पिछली यात्रा के दौरान ट्रक से उतरने और एक बेशकीमती घड़ी के गुम हो जाने के पुराने जख्म अभी भरे नहीं हैं. उधर सिद्धारमैया ने मंच पर अकेले ही कर्नाटक का परचम लहराते हुए अपनी धमक दिखा दी. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि बेंगलुरु की अंदरूनी खींचतान अब दिल्ली के मंचों पर भी साफ छलकने लगी है. सचमुच, जब नाराजगी के धागे इतने लंबे खिंच जाएं, तो मंच की कुर्सियां खुद-ब-खुद बहुत कुछ बयां कर देती हैं. अब यक्ष प्रश्न यह है कि डीके की यह दूरी सिर्फ एक तारीख का इत्तेफाक है या आने वाले किसी बड़े सियासी घमासान का पूर्व-संकेत?
3. सोनिया-लालू की चाय और पकती नई 'खिचड़ी'!
दिल्ली में लालू परिवार की सोनिया गांधी से मुलाकात, क्या है गठबंधन का भावी रोडमैप?
दिल्ली के सत्ता-गलियारों में आज उस वक्त सुगबुगाहट तेज हो गई, जब कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार से एक अहम शिष्टाचार मुलाकात की. अलबत्ता चुनावी मौसम में बड़े नेताओं की ऐसी कोई भी मुलाकात केवल चाय-नाश्ते तक सीमित नहीं होती. राजनीतिक प्रेक्षक इसे आगामी सियासी चक्रव्यूह और गठबंधन की राष्ट्रीय रणनीति को धार देने की कसरत मान रहे हैं. दोनों परिवारों के बीच दशकों पुरानी समझ और समीकरण जगजाहिर हैं, लेकिन बदलते दौर में क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं रहा. सचमुच जब दो पुराने रणनीतिकार आमने-सामने बैठते हैं, तो विरोधियों के कान अपने आप खड़े हो जाते हैं. अब राजनीतिक हलकों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या इस बंद कमरे की बैठक से गठबंधन की कोई नई ठोस स्क्रिप्ट तैयार होगी या फिर यह सिर्फ पुराने रिश्तों को गरमाहट देने तक महदूद रहेगी?
4. लाल झंडे को दीदी का ग्रीन सिग्नल... 'हो जाओ राइट'!
ममता बनर्जी का वामपंथियों को खुला न्योता..क्या बंगाल में बनेगा टीएमसी, कांग्रेस और लेफ्ट का त्रिकोण?
पश्चिम बंगाल की सियासत में जो कभी अकल्पनीय माना जाता था, आज उसी की जमीन तैयार होती दिख रही है. वामपंथियों के खिलाफ दशकों तक सियासी संघर्ष की अगुवाई करने वाली तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अब लेफ्ट को खुला न्योता देकर सबको चौंका दिया है. ममता ने दो टूक कहा कि लेफ्ट को अब बड़ी भूमिका में आना होगा और हमारे साथ 'राइट' होना पड़ेगा. अलबत्ता यह वही बंगाल है जहां लाल और हरे झंडे का आमना-सामना हमेशा तीखा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे भाजपा की बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर बंगाल में एक अभेद्य त्रिकोणीय मोर्चा खड़ा करने की बेचैनी मान रहे हैं. सचमुच, सियासत में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन. अब कोलकाता के चौराहों पर यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि क्या सालों का कैडर-वार भुलाकर लेफ्ट कैडर ममता के साथ कदमताल करने को राजी होगा, या यह 'राइट' होने का फॉर्मूला रास्ते में ही भटक जाएगा?
5. 'सुपरफास्ट' चुनावी दौरे और फिर पासपोर्ट पर नजर!
पंजाब और उत्तराखंड में राहुल गांधी का तूफानी आगाज, क्या दौरों के तुरंत बाद बनेगा विदेश का प्लान?
कांग्रेस के चुनावी प्रचार का मीटर अचानक पांचवें गियर में आ गया है. 4 तारीख से राहुल गांधी पंजाब में चुनावी बिगुल फूंकेंगे और उसके फौरन बाद दो-तीन दिनों के भीतर उत्तराखंड के पहाड़ों में जनसभाओं का मोर्चा संभालेंगे. पार्टी संगठन इन दोनों राज्यों के तूफानी दौरों को रिकॉर्ड रफ्तार में समेटने में दिन-रात एक किए हुए है. अलबत्ता इस तेज रफ्तार शेड्यूल के पीछे सियासी गलियारों में एक और चर्चा ने पंख पसार लिए हैं. फुसफुसाहट है कि इन दोनों राज्यों के दौरे को निपटाते ही राहुल गांधी के एक और विदेश दौरे का खाका तैयार हो रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि ताबड़तोड़ चुनावी कैंपेन के बाद विदेश जाना राहुल की कार्यशैली का जाना-पहचाना पैटर्न रहा है, जिस पर भाजपा हमेशा निशाना साधती आई है. सचमुच रफ्तार इतनी तेज हो तो कयासों का बाजार गर्म होना तय है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या यह सिर्फ विरोधियों की उड़ाई अफवाह है या चुनावी शंखनाद के तुरंत बाद फिर फ्लाइट का बोर्डिंग पास तैयार मिलेगा?