जब सऊदी अरब और पाकिस्तान ने 17 सितंबर 2025 को अपने पहले आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो सऊदी अरब के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा था कि यह एक व्यापक रक्षा समझौता है, जिसमें सैन्य मदद के सभी साधन शामिल हैं. हालांकि, इस बयान में परमाणु हथियारों का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किया गया था, लेकिन इसके कई मायने निकाले गए. लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि सऊदी अरब को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से सुरक्षा मिल सकती है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो उनका देश भी ऐसा ही कदम उठाएगा. इसी वजह से शुरुआत से ही इस रक्षा समझौते को परमाणु हथियारों के नजरिए से देखा गया. हालांकि, दोनों देशों की सरकारों ने इस बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया.
11 महीने बाद इस समझौते में एक और देश शामिल हो गया और इसे नया नाम मिला. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसका उद्देश्य किसी भी देश की ओर से होने वाले हमले के खिलाफ मिलकर सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई की क्षमता मजबूत करना है. समझौते में यह प्रावधान भी शामिल है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा.
हालांकि, परमाणु हथियारों से जुड़ी बात समझौते के आधिकारिक दस्तावेज में नहीं, बल्कि इस पर होने वाली चर्चाओं में सामने आई है. एएफपी ने इस गठबंधन का जिक्र करते हुए बताया कि इसमें नाटो के बाद दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक मानी जाने वाली तुर्की की सेना, इस्लामी दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश पाकिस्तान और खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख ताकत सऊदी अरब शामिल हैं. लेकिन इस्लामाबाद, रियाद या अंकारा के किसी भी अधिकारी ने यह नहीं कहा है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार सऊदी अरब या तुर्की की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे. पाकिस्तान के किसी अधिकारी ने इन हथियारों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल करने की बात भी नहीं कही है. यानी परमाणु सुरक्षा को लेकर चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन इसकी पुष्टि किसी आधिकारिक घोषणा में नहीं हुई है.
तीनों देशों की सैन्य ताकत में क्या है अंतर?
तीनों देशों की सैन्य क्षमता पर नजर डालें तो पाकिस्तान के पास सबसे बड़ी सक्रिय सेना है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना में करीब 6.60 लाख सक्रिय सैनिक हैं. उसके पास 1,397 विमान और 2,677 टैंक हैं. हालांकि, पाकिस्तान का रक्षा बजट करीब 9.1 अरब डॉलर है, जो सऊदी अरब के 63.9 अरब डॉलर और तुर्की के 51.4 अरब डॉलर के मुकाबले काफी कम है.
ऐसे में पाकिस्तान की सबसे खास ताकत उसके परमाणु हथियार हैं, जिन्हें तैयार करने और विकसित करने में किसी देश को लंबा समय लग सकता है. गल्फ इंटरनेशनल फोरम की डानिया थाफर का कहना है कि सऊदी अरब इस समझौते को केवल राजनीतिक घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे एक प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था में बदलना चाहता है. इसी वजह से पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को लेकर सवाल उठते रहते हैं, जबकि समझौते में इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.
ईरान के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
ईरान के नजरिए से इस समझौते का महत्व पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति के कारण भी बढ़ जाता है. पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है. इसके अलावा, पाकिस्तान ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तेहरान और वॉशिंगटन के बीच बातचीत में एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है.
17 जून को हुए इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन ने एक व्यापक समझौते की दिशा में रास्ता खोला था. इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे. इस तरह पाकिस्तान एक ओर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत में मदद कर रहा है, तो दूसरी ओर वह सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते का हिस्सा भी है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो उनका देश भी ऐसा करने पर विचार करेगा.
हालांकि, ईरान ने सार्वजनिक रूप से इस पहलू पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पड़ोसी देशों के बीच आत्मनिर्भरता और सच्चे भाईचारे की जरूरत पर जोर दिया था. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने न तो इस रक्षा समझौते का नाम लिया और न ही पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का जिक्र किया.
यमन के घटनाक्रम में क्या रही पाकिस्तान की भूमिका?
5 अक्टूबर को इस रक्षा व्यवस्था को सक्रिय करने से जुड़ा घटनाक्रम यमन के एक सशस्त्र समूह और उसकी मिसाइलों तथा ड्रोन से संबंधित था. फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के अनुसार, इस दौरान जिन सैन्य तैनातियों पर चर्चा हुई, उनका उद्देश्य रक्षा व्यवस्था मजबूत करना था. तुर्की ने वायु रक्षा प्रणाली उपलब्ध कराने के संकेत दिए, जबकि पाकिस्तान पहले से ही सऊदी अरब के भीतर सैन्य सहायता दे रहा था.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर ईरानी हमलों के बाद पाकिस्तान ने वहां लड़ाकू विमान और सहायक विमान भेजे थे. उस समय भी परमाणु हथियारों के इस्तेमाल या किसी परमाणु सुरक्षा गारंटी का सार्वजनिक रूप से जिक्र नहीं किया गया था. अब तक पाकिस्तान ने सऊदी अरब के लिए जो सैन्य मदद दी है, वह पारंपरिक सैन्य क्षमताओं से जुड़ी रही है.
सऊदी अरब की सुरक्षा करेंगे पाकिस्तान के परमाणु हथियार?
इस पूरे मामले में तीन बातें खास हैं. पहली, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो उनका देश भी ऐसा कदम उठा सकता है. दूसरी, सऊदी अरब के एक वरिष्ठ अधिकारी ने 2025 के रक्षा समझौते को सैन्य मदद के सभी साधनों को शामिल करने वाला बताया था, लेकिन परमाणु हथियार साझा करने की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की थी.
तीसरी, 5 अक्टूबर को रक्षा व्यवस्था सक्रिय करने से जुड़ी चर्चा सऊदी अरब की सुरक्षा, सैन्य तैनाती और पारंपरिक हथियारों पर केंद्रित थी. इसमें परमाणु हथियारों का कोई उल्लेख नहीं था.
इसलिए पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को सऊदी अरब की सुरक्षा की गारंटी मानना अभी जल्दबाजी होगी. तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ा है, लेकिन पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को सऊदी अरब या तुर्की की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करने का कोई आधिकारिक वादा नहीं किया है.
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