पाकिस्तान इस समय अपनी आर्थिक बदहाली के ऐसे दौर में फंसा है, जहां बुनियादी खर्चों के लिए भी उसे कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है. IMF की सख्त शर्तें गले की फांस बन चुकी हैं और सरकारी खजाना लगभग खाली है. लेकिन इन हालातों के बावजूद पड़ोसी देश की प्राथमिकताएँ चौंकाने वाली हैं. जनता की रोजमर्रा की जरूरतों से ज्यादा, पाकिस्तान को चिंता है कराची से लाहौर के बीच बुलेट ट्रेन दौड़ाने की वही रेलवे, जिसकी आम ट्रेनें समय पर चल जाएं तो लोग उसे ‘चमत्कार’ मानते हैं.
पाकिस्तान रेलवे ने दावा किया है कि वह 2030 तक कराची-लाहौर के 20 घंटे के सफर को घटाकर सिर्फ 5 घंटे कर देगा. यह कदम अचानक नहीं, बल्कि भारत की 2027 में शुरू होने वाली पहली बुलेट ट्रेन से मुकाबले की कोशिश लगती है. लेकिन सवाल यह है. जिस देश के पास अपनी ट्रेनों की मरम्मत के पैसे नहीं, वह हाई-स्पीड रेल का सपना कैसे पूरा करेगा?
कर्ज में डूबा पाकिस्तान, लेकिन सपना बुलेट ट्रेन का
पाकिस्तान रेलवे का मौजूदा ढांचा जर्जर है. कई रूट समय पर नहीं चलते, फ्रेट सेक्टर लगभग खत्म है—कुल हिस्सा सिर्फ 4%. इस हालत में भी नेताओं को भरोसा है कि बुलेट ट्रेन पाकिस्तान को विकास की ओर ले जाएगी. इसके लिए पाकिस्तान ने CPEC के 6.8 अरब डॉलर वाले ML-1 प्रोजेक्ट में हाई-स्पीड रेल का प्रस्ताव जोड़ दिया है.
250 किमी/घंटा की रफ्तार, लेकिन किस कीमत पर?
इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत 1,215 किमी लंबी हाई-स्पीड लाइन बनेगी, जिस पर ट्रेन 250 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेगी. रूट में कराची, हैदराबाद, मुल्तान और सहिवाल जैसे बड़े शहर शामिल होंगे. चीन तकनीक से लेकर फंडिंग तक सब कुछ संभालेगा. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है—यह परियोजना वरदान नहीं, बल्कि चीन का ‘हाई-इंटरेस्ट ट्रैप’ भी साबित हो सकती है. क्योंकि चीन और पाकिस्तान के कई रेल प्रोजेक्ट पहले से ही देरी, बढ़ती लागत और नुकसान का शिकार रहे हैं.
दुनिया भर में चीन की ‘रेल डिप्लोमेसी’ कैसे चली फेल
चीन पिछले एक दशक से हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट्स को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है. शुरुआत में चमकदार सपने दिखाए जाते हैं, पर कई देश बाद में कर्ज के दलदल में फंस जाते हैं.
इंडोनेशिया का उदाहरण
चीन ने जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड रेल को ‘आर्थिक चमत्कार’ बताया था. लेकिन चार साल की देरी 1.2 अरब डॉलर की अतिरिक्त लागत के बाद इंडोनेशिया ने खुद इसे “टिकिंग टाइम बम” कहा और अब चीन से कर्ज पुनर्गठन मांग रहा है.
मलेशिया, थाईलैंड और फिलिपींस का अनुभव
मलेशिया और थाईलैंड ने प्रोजेक्ट छोटे कर दिए, क्योंकि ब्याज और कर्ज बोझ असहनीय था.
फिलिपींस ने 2023 में तीन बड़े रेल प्रोजेक्ट रद्द कर दिए क्योंकि चीन फंडिंग में देरी कर रहा था.
पाकिस्तान जाने-अनजाने उसी रास्ते पर
CPEC के प्रोजेक्ट पहले ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. अधिकतर काम अधूरे या घाटे में हैं. अब बुलेट ट्रेन के माध्यम से पाकिस्तान एक और जोखिम उठा रहा है. एशियन डेवलपमेंट बैंक ने कराची-रोहरी लाइन के लिए 2 अरब डॉलर की मदद इसलिए दी क्योंकि चीन अब फंडिंग धीमी कर चुका है. यह साफ संकेत है कि चीन खुद भी इस प्रोजेक्ट को फायदेमंद नहीं मानता.
आर्थिक संकट में ऐसा सपना कितना व्यावहारिक?
जब देश पेट्रोल, बिजली, दवाओं और आटे जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ हो, तब 250 किमी प्रति घंटे की बुलेट ट्रेन का सपना किसी फिल्मी कल्पना जैसा ही लगता है. विशेषज्ञों की राय में पाकिस्तान शायद वही गलती दोहरा रहा है, जो कई देशों ने पहले चीन की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं के चलते की—सपनों के बदले कर्ज का पहाड़ खड़ा कर लेना.
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