काठमांडू: नेपाल में हाल ही में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व राजनीतिक घटना घटी, जिसने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया. यह पहली बार हुआ जब किसी लोकतांत्रिक देश में सरकार को जन आंदोलन के जरिए हटाया गया और एक नया प्रधानमंत्री सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म डिस्कॉर्ड के जरिए चुना गया. इस पूरे घटनाक्रम में देश की Gen-Z यानी नई पीढ़ी ने निर्णायक भूमिका निभाई.
इस डिजिटल आंदोलन को “डिजिटल क्रांति” या “डिजिटल लोकतंत्र की शुरुआत” कहा जा रहा है, जिसमें एक ऐप ने चुनावी मंच का रूप ले लिया और राजनीतिक व्यवस्था को ही बदल दिया.
कैसे शुरू हुआ आंदोलन?
नेपाल में पिछले कुछ समय से भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद (Nepotism) और इंटरनेट सेंसरशिप को लेकर जनता, खासकर युवा वर्ग में गहरी नाराजगी थी. सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के फैसले ने इस आक्रोश को और बढ़ा दिया. यही वह समय था जब युवाओं ने पारंपरिक राजनीति से अलग एक नया रास्ता चुना और वह रास्ता था एक गेमिंग ऐप.
‘हामी नेपाल’ नाम की एक युवा संस्था, जिसमें लगभग 1.6 लाख सदस्य हैं, ने इस क्रांति का नेतृत्व किया. यह संगठन सोशल मीडिया सेंसरशिप के विरोध में लामबंद हुआ और उसने एक नया मंच चुना- डिस्कॉर्ड (Discord).
आखिर क्या है डिस्कॉर्ड ऐप?
डिस्कॉर्ड एक अमेरिकी ऐप है जो मूल रूप से गेमिंग समुदाय के लिए बनाया गया था. इसमें वॉयस कॉल, वीडियो कॉल, टेक्स्ट चैट, पोल्स और लाइव स्ट्रीमिंग जैसी सुविधाएं होती हैं. यह ऐप खासतौर पर Gen-Z में बेहद लोकप्रिय है क्योंकि यह:
जब सरकार ने फेसबुक, ट्विटर (अब X), और TikTok जैसे प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगाई, तब युवाओं को एक विकल्प की जरूरत थी और डिस्कॉर्ड ने वह विकल्प मुहैया कराया.
आंदोलन कैसे आगे बढ़ा?
‘हामी नेपाल’ ने डिस्कॉर्ड पर एक चैनल शुरू किया- "Youth Against Corruption". इस चैनल में शुरू में 10,000 से अधिक लोग जुड़े. फिर जैसे-जैसे बहस तेज़ होती गई और सर्वर पर लोड बढ़ा, उन्होंने इसे यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीम करना शुरू किया, जहाँ 6,000 और लोग शामिल हुए. इसमें न केवल नेपाल के लोग थे, बल्कि दुनिया भर में बसे नेपाली डायस्पोरा ने भी भाग लिया.
इस डिजिटल मंच पर युवाओं ने न केवल बहस की, बल्कि वोटिंग के माध्यम से प्रभावी नेतृत्व के लिए उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट भी किया.
कैसे हुई वोटिंग? कौन-कौन थे शामिल?
डिस्कॉर्ड पर लाखों संदेशों और चर्चाओं के बाद युवाओं ने 5 प्रमुख नामों को वोटिंग के लिए चुना:
हालांकि, काठमांडू के चर्चित मेयर और रैपर बालेन शाह का नाम भी सामने आया, लेकिन उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से अलग रखा. बाद में उन्होंने सुशीला कार्की का समर्थन किया.
क्या सोच रहे थे युवा?
रेजिना बेसनेट, जो एक 25 वर्षीय लॉ ग्रेजुएट हैं और इस आंदोलन में सक्रिय थीं, ने कहा, "हम सब एक साथ सीख रहे थे. कई लोगों को शुरू में यह भी नहीं पता था कि संसद भंग करने या अंतरिम सरकार क्या होती है. लेकिन हमने सवाल किए, जवाब पाए, और मिलकर समाधान निकाला."
वहीं 26 साल के एक और प्रदर्शनकारी विशाल सपकोटा ने बताया कि, "यह एक संगठित राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि स्वतःस्फूर्त विरोध था. हमें भी यह उम्मीद नहीं थी कि सरकार इतनी जल्दी गिर जाएगी."
यहां तक कि गलत सूचना और अफवाहों से निपटने के लिए प्रदर्शनकारियों ने “फैक्ट चेक” नाम का एक सब-रूम भी डिस्कॉर्ड पर बनाया, जहाँ जानकार लोग वायरल हो रही जानकारी की पुष्टि करते थे.
कैसे बनी सुशीला कार्की आम सहमति की नेता?
लंबी बहस और चर्चाओं के बाद, 10 सितंबर को डिस्कॉर्ड सर्वर पर सर्वसम्मति बनी कि देश का नेतृत्व अब सुशीला कार्की को संभालना चाहिए.
7,713 वोटों के साथ वे पहले उम्मीदवार बनीं जिन्होंने 50% वोटों का आंकड़ा पार किया. इसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री के लिए सर्वसम्मति से चुना गया.
12 सितंबर को नेपाल के राष्ट्रपति ने उन्हें आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई. इस तरह वह नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं और यह पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से युवाओं की भागीदारी से पूरी हुई जो शायद दुनिया में पहली बार हुआ.
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