अफगानिस्तान की तरह उज्बेकिस्तान की भी उम्मीद है चाबहार बंदरगाह, भारत को दिया बड़ा ऑफर, क्या होगी डील?

ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह, एक बार फिर से दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की भूराजनीतिक रणनीतियों के केंद्र में आ गया है.

Like Afghanistan Uzbekistan is also hoping for Chabahar port
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नई दिल्ली: ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह, एक बार फिर से दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की भूराजनीतिक रणनीतियों के केंद्र में आ गया है. यह बंदरगाह न केवल भारत की रणनीतिक पहुंच के लिहाज़ से अहम है, बल्कि अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे भू-आवृत (landlocked) देशों के लिए भी समुद्र तक पहुंच का एकमात्र व्यवहारिक विकल्प है. मौजूदा समय में, जहां वैश्विक राजनीति में तीव्र बदलाव हो रहे हैं, वहीं यह बंदरगाह नई साझेदारियों और भू-राजनीतिक खेल का मुख्य केंद्र बन चुका है.

चाबहार: अफगानिस्तान-उज्बेकिस्तान की उम्मीद

चाबहार बंदरगाह, ईरान के दक्षिण-पूर्व में स्थित है और यह भारत, ईरान और अफगानिस्तान के त्रिपक्षीय समझौते के तहत विकसित किया गया था. इसका उद्देश्य अफगानिस्तान और मध्य एशिया को पाकिस्तान को बाईपास करते हुए एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग प्रदान करना था. खासकर अफगानिस्तान के लिए, यह पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम था.

अब, तालिबान की सरकार और उज्बेकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश, दोनों इस बात की उम्मीद लगाए हुए हैं कि भारत इस बंदरगाह के जरिए उनका सुरक्षित और स्थिर व्यापार मार्ग बनाए रखेगा. भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और उसकी निवेश क्षमता इस क्षेत्र में एकमात्र ऐसा विकल्प है जो स्थायित्व और दीर्घकालिक सहयोग सुनिश्चित कर सकता है.

अमेरिकी प्रतिबंध और भारत की कूटनीतिक चुनौती

हाल ही में अमेरिका ने ईरान पर पुनः प्रतिबंध लागू कर दिए, जिससे चाबहार प्रोजेक्ट पर अनिश्चितता बढ़ गई है. जबकि, 2018 में ट्रंप प्रशासन ने भारत को चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए विशेष छूट (waiver) दी थी, ताकि अफगानिस्तान को पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना व्यापार मार्ग मिल सके.

अब चाबहार को लेकर अमेरिका की नीति एक बार फिर बदलती दिख रही है, जिससे भारत और अन्य साझेदार देशों की चिंता बढ़ गई है. इस स्थिति में भारत के लिए यह एक कूटनीतिक अग्निपरीक्षा बन चुकी है, जहां उसे अपने हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका को फिर से राज़ी करना होगा कि चाबहार किसी भी प्रकार से वैश्विक प्रतिबंधों के उल्लंघन का हिस्सा नहीं है.

उज्बेकिस्तान का भारत को बड़ा प्रस्ताव

भारत के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने के लिए उज्बेकिस्तान ने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है. वह भारत के साथ मिलकर यूरेनियम खनन और आपूर्ति के क्षेत्र में साझेदारी करना चाहता है. यह भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण मौका हो सकता है, क्योंकि भारत की परमाणु ऊर्जा जरूरतें दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं.

इस समय फ्रांस भी उज्बेकिस्तान में यूरेनियम प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है. ऐसे में भारत के लिए यह साझेदारी न केवल रणनीतिक, बल्कि ऊर्जा नीति के दृष्टिकोण से भी अहम बन सकती है. यदि भारत इस अवसर का सही उपयोग करता है, तो वह मध्य एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को भी संतुलित कर सकता है.

उज्बेकिस्तान की BRI से दूरी और भारत से आस

एक और अहम पहलू यह है कि उज्बेकिस्तान, केवल चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पर निर्भर नहीं रहना चाहता. वह चाह रहा है कि उसके पास वैकल्पिक व्यापार मार्ग भी हों, जिनमें भारत के नेतृत्व वाला चाबहार कॉरिडोर सबसे मजबूत विकल्प के रूप में सामने आता है.

BRI को लेकर कई मध्य एशियाई देशों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं, खासकर ऋण-जाल (debt trap) और चीन की सैन्य उपस्थिति को लेकर. ऐसे में भारत के साथ जुड़कर उज्बेकिस्तान अपनी रणनीतिक विविधता बनाए रखना चाहता है.

भारत उठाए अमेरिका से बात- अफगानिस्तान

अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी, हाल ही में भारत यात्रा पर आए थे. उन्होंने चाबहार को लेकर भारत से आग्रह किया है कि वह अमेरिका के साथ इस मसले पर बातचीत करे, ताकि बंदरगाह पर लगे प्रतिबंधों में फिर से छूट (exemption) मिल सके.

तालिबान सरकार भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह मान्यता प्राप्त न हो, लेकिन अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति और भारत के साथ उसके व्यापारिक हित इस परियोजना को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं.

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