Iran US War: वॉशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब ध्यान केवल सैन्य हमलों या कूटनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं रह गया है. इसके साथ ही ईरान के भीतर एक शांत लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है, जो धीरे-धीरे यह तय कर रहा है कि वास्तविक सत्ता कहां केंद्रित है और दुनिया के सामने उसे कैसे प्रस्तुत किया जा रहा है.
इस बदलते परिदृश्य के केंद्र में तीन अहम स्तंभ हैं: मोजतबा खामेनेई, जिनके पास अंतिम अधिकार है; इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), जिसने अपने परिचालन और रणनीतिक प्रभाव को लगातार बढ़ाया है; और मसूद पेज़ेश्कियन, जो निर्वाचित नेता हैं और इस संकट के दौरान अपेक्षाकृत संतुलित और कूटनीतिक आवाज के रूप में उभरे हैं.
अब यह साफ तौर पर दिखाई देने लगा है कि ईरान बाहरी दुनिया के सामने खुद को जिस तरह पेश करता है और अंदरूनी तौर पर फैसले जिस तरह लिए जाते हैं, उनके बीच अंतर बढ़ता जा रहा है. पेज़ेश्कियन लगातार संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए संयम का संकेत दे रहे हैं और वैश्विक धारणा को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका नरम रुख IRGC के सख्त और आक्रामक रुख से बिल्कुल अलग नजर आता है. हालांकि सुरक्षा और रणनीतिक फैसलों के मामले में रिपोर्ट्स यह संकेत देती हैं कि IRGC की भूमिका ज्यादा निर्णायक हो गई है, यहां तक कि उसने नागरिक प्रशासन के कुछ हिस्सों को पीछे भी कर दिया है. यह युद्धकाल का एक जाना-पहचाना पैटर्न है, जहां सैन्य संस्थाएं अधिक शक्ति हासिल कर लेती हैं और नागरिक नेतृत्व गौण हो जाता है.
इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान खासा चर्चा में रहा. उन्होंने कहा कि अमेरिका “ईरान के असली नेता” से बातचीत कर रहा है, जिससे एक जानबूझकर अस्पष्टता पैदा हुई. यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उनका इशारा पेज़ेश्कियन की ओर था या नहीं, क्योंकि ईरान की संवैधानिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेता की भूमिका स्पष्ट रूप से सर्वोपरि है. लेकिन इस बयान ने यह अटकलें जरूर बढ़ा दी हैं कि क्या इस तरह की भाषा का इस्तेमाल ईरान के भीतर के अंतर को उजागर करने या उसे और बढ़ाने के लिए किया जा रहा है.
यह स्थिति एक बड़े रणनीतिक सवाल को जन्म देती है: क्या बाहरी दबाव, चाहे वह सैन्य हो, आर्थिक हो या मनोवैज्ञानिक, इस उम्मीद पर आधारित है कि यदि ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व को कमजोर किया जाए, तो पेज़ेश्कियन जैसे अपेक्षाकृत उदार नेता के लिए रास्ता खुल सकता है?
पहली नजर में यह सोच संभव लगती है. एक निर्वाचित और कूटनीतिक रुख रखने वाले नेता के रूप में पेज़ेश्कियन वैश्विक स्तर पर बेहतर संवाद स्थापित कर सकते हैं और ईरान की छवि को कम टकरावपूर्ण बना सकते हैं. उनका दृष्टिकोण उन लोगों को भी आकर्षित कर सकता है जो पहले सख्त नीतियों से असंतुष्ट रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए वह एक “सुरक्षित आंतरिक विकल्प” के रूप में सामने आ सकते हैं, जिससे विरोध की भावना धीरे-धीरे उम्मीद में बदल सकती है.
इस स्थिति के महत्वपूर्ण प्रभाव भी हैं. पेज़ेश्कियन अगर जनता के असंतोष को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं, खासकर शहरी और मध्यम वर्ग के बीच तो वह एक स्थिरता देने वाले नेता के रूप में उभर सकते हैं. इससे विरोध प्रदर्शनों के बजाय असंतोष को संस्थागत ढांचे के भीतर मोड़ा जा सकता है, जिससे आंतरिक अस्थिरता कम होगी और उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ेगी.
हालांकि, ईरान की राजनीतिक संरचना की वास्तविकता यह तय करती है कि यह प्रभाव सीमित ही रहेगा. संकट के समय सत्ता राष्ट्रपति तक नहीं पहुंचती. अगर काल्पनिक तौर पर अली खामेनेई सत्ता में नहीं भी रहते, तो भी नेतृत्व परिवर्तन असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के जरिए होगा, जिसमें IRGC जैसी संस्थाओं का मजबूत प्रभाव रहेगा. ऐसे में प्राथमिकता सुधार नहीं, बल्कि निरंतरता और नियंत्रण बनाए रखना होगा.
इसलिए संभावित परिणाम किसी उदार बदलाव का नहीं, बल्कि एक और सख्त नेतृत्व या और अधिक केंद्रीकृत सुरक्षा-आधारित ढांचे का हो सकता है. मौजूदा हालात भी इसी ओर इशारा करते हैं. जैसे-जैसे बाहरी दबाव बढ़ रहा है, व्यवस्था कमजोर होने के बजाय और मजबूत हो रही है, जिसमें IRGC की स्थिति और मजबूत होती जा रही है और नागरिक नेतृत्व सीमित होता जा रहा है.
यह एक रणनीतिक विरोधाभास पैदा करता है. यदि बाहरी दबाव और बयानबाजी का उद्देश्य आंतरिक मतभेदों को उजागर करना है, तो इसका तत्काल प्रभाव उल्टा दिखाई देता है. व्यवस्था टूट नहीं रही, बल्कि और अधिक सुदृढ़ हो रही है और यह सुदृढ़ीकरण उन्हीं सख्त संस्थाओं के इर्द-गिर्द हो रहा है.
इसलिए पेज़ेश्कियन की भूमिका को सीधे चुनौती देने वाले नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक और राजनीतिक संतुलनकर्ता के रूप में समझना चाहिए. वह ईरान की वैश्विक छवि को बेहतर बना सकते हैं और आंतरिक असंतोष को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सत्ता संतुलन को मूल रूप से बदलने की उनकी क्षमता सीमित है.
अंत में, यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सच्चाई को उजागर करती है: ईरान जैसे सिस्टम में बाहरी दबाव हमेशा बदलाव नहीं लाता, बल्कि कई बार मौजूदा शक्ति केंद्रों को और मजबूत कर देता है. संकट के समय भले ही मध्यमार्गी आवाजें ज्यादा सुनाई दें, लेकिन दिशा तय करने का काम अंततः सख्त संरचनाएं ही करती हैं.
लेखक- मोहम्मद आरिफ खान, मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञ