Iran Israel War: रूस से टैंकर भर-भरकर तेल खरीदेगा भारत, मिडिल ईस्ट जंग के बीच मिला दोस्त का साथ!

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है.

Iran Israel War India will buy oil tankers from Russia amid middle east tension
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Iran Israel War: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है. इस स्थिति को देखते हुए भारत ने अपनी तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है. इसी क्रम में रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दिए जाने के बाद भारत रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करने की तैयारी में है. इससे आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में रूसी तेल टैंकर भारतीय बंदरगाहों की ओर रुख कर सकते हैं.

इस महीने 33 मिलियन बैरल तेल आने की संभावना

एनालिटिक्स फर्म केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार इस महीने भारत में लगभग 33 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल पहुंच सकता है. एआईएस प्रोजेक्शन डेटा से यह भी पता चलता है कि महीने की शुरुआत में ही करीब 10 मिलियन बैरल तेल भारतीय बंदरगाहों पर उतर चुका है.

बाकी लगभग 23 मिलियन बैरल तेल आने वाले दिनों में अलग-अलग बंदरगाहों पर पहुंच सकता है. हालांकि वास्तविक मात्रा में कुछ बदलाव संभव है, क्योंकि टैंकरों के मूवमेंट के अनुसार सप्लाई में उतार-चढ़ाव हो सकता है.

केप्लर का कहना है कि जैसे-जैसे नए टैंकरों के सिग्नल मिलते जाएंगे, भारत में आने वाले रूसी तेल की मात्रा और भी बढ़ सकती है.

क्या भारत ने कभी रोका रूसी तेल?

केप्लर के वरिष्ठ रिफाइनिंग विश्लेषक निखिल दुबे के अनुसार भारत ने आधिकारिक रूप से रूसी कच्चे तेल की खरीद कभी पूरी तरह बंद नहीं की थी. उन्होंने बताया कि अमेरिका से मिली छूट के बाद भारतीय रिफाइनरी कंपनियां फिर से रूसी तेल खरीदने के लिए अधिक उत्सुक दिखाई दे रही हैं.

दुबे के मुताबिक कच्चे तेल पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं था. हालांकि कुछ कंपनियों ने अपनी तरफ से रूसी तेल की खरीद अस्थायी रूप से कम कर दी थी. इसकी वजह यह थी कि यूरोपीय संघ और अमेरिका ने रूस से बने पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था.

मिडिल ईस्ट में बढ़ता संकट

ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष के कारण मिडिल ईस्ट क्षेत्र में स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई है. खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थिति अधिक संवेदनशील बनी हुई है.

यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है. कई तेल टैंकर इसी रास्ते से होकर दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचते हैं. लेकिन हालिया तनाव के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है.

रिपोर्टों के मुताबिक ईरान ने इस मार्ग से गुजरने वाले कुछ जहाजों को रोकने की चेतावनी दी है, जिससे वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ गई है.

भारत की ऊर्जा जरूरतों पर असर

भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है. अनुमान के अनुसार भारत के कुल तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ऐसे देशों से आता है, जिनका तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है.

ऐसे में यदि इस मार्ग पर कोई बड़ा व्यवधान पैदा होता है तो इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है.

भारत ने शुरू किए वैकल्पिक रास्ते

तेल आपूर्ति में संभावित बाधाओं को देखते हुए भारत अब अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काम कर रहा है. इसके तहत रूसी तेल की खरीद बढ़ाने के साथ-साथ अन्य समुद्री मार्गों और सप्लाई चैनलों पर भी ध्यान दिया जा रहा है.

मार्केट डेटा के अनुसार मार्च के शुरुआती चार दिनों में लाल सागर के टर्मिनलों से लगभग 10 मिलियन बैरल कच्चा तेल लोड किया गया. इसका मतलब है कि औसतन करीब 2.5 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन शिपमेंट के लिए तैयार किया गया.

बताया जा रहा है कि भारतीय रिफाइनरियों ने लाल सागर के रास्ते आने वाले टैंकरों की बुकिंग भी शुरू कर दी है, ताकि तेल की सप्लाई लगातार बनी रहे और किसी प्रकार की कमी न हो.

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया है. सोमवार को तेल की कीमतों में भारी तेजी दर्ज की गई.

सुबह करीब 11 बजे ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 23 प्रतिशत बढ़कर करीब 115.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड ऑयल में भी लगभग 23 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली और इसकी कीमत करीब 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई.

विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में उत्पादन बाधित होने और शिपिंग गतिविधियों में कमी आने के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है.

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