Indus Waters Treaty: भारत ने हेग स्थित कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) के हालिया फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है. भारत ने साफ कहा है कि यह संस्था अवैध तरीके से बनाई गई है और इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि इसलिए इसके किसी भी फैसले, आदेश या कार्रवाई को भारत मान्यता नहीं देता.
भारत का साफ रुख
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 15 मई 2026 को सिंधु जल संधि से जुड़े एक मामले में जो फैसला दिया गया, वह भारत के लिए पूरी तरह अमान्य है. उन्होंने कहा कि भारत पहले भी इस तथाकथित कोर्ट के सभी फैसलों को खारिज कर चुका है और आगे भी इसे नहीं मानेगा.
Our response to media queries on matters pertaining to the illegally constituted so-called Court of Arbitration ⬇️
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) May 16, 2026
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सिंधु जल संधि पर भारत का मौजूदा स्टैंड
भारत ने साफ किया है कि सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को फिलहाल स्थगित रखा गया है. यह संधि 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसमें सिंधु नदी के पानी के बंटवारे का समझौता किया गया था. भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक यह संधि स्थगित रहेगी.
भारत ने कहा- संप्रभु अधिकारों पर कोई सवाल नहीं
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि जब तक संधि स्थगित है, भारत उस समझौते के तहत किसी भी दायित्व को निभाने के लिए बाध्य नहीं है. भारत ने साफ कहा कि कोई भी अवैध या तथाकथित अदालत उसके संप्रभु अधिकारों पर सवाल नहीं उठा सकती.
किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर भी विवाद
इससे पहले भी इस कथित अदालत ने जम्मू-कश्मीर की किशनगंगा और रतले हाइड्रो प्रोजेक्ट को लेकर फैसले दिए थे. भारत ने उन फैसलों को भी खारिज कर दिया था और कहा था कि इस संस्था को कभी कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया गया. भारत का कहना है कि इस तरह की मध्यस्थता प्रक्रिया खुद सिंधु जल संधि के नियमों के खिलाफ है.
पाकिस्तान पर भारत का आरोप
भारत ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों का गलत इस्तेमाल कर रहा है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान इस तरह की प्रक्रियाओं का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करता है और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाता है.
भारत का सख्त संदेश
भारत ने एक बार फिर दोहराया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा. सरकार का कहना है कि ऐसे किसी भी अवैध फैसले या संस्था को भारत भविष्य में भी मान्यता नहीं देगा.
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