इंडोनेशिया को ब्रह्मोस देने की तैयारी में भारत, PM मोदी के दौरे में हो सकती है डील, टेंशन में चीन!

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान एक ऐसी रक्षा डील पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो न केवल दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दे सकती है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकती है.

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नई दिल्ली: भारत अपने रक्षा निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान एक ऐसी रक्षा डील पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो न केवल दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दे सकती है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकती है. चर्चा है कि भारत और इंडोनेशिया के बीच लंबे समय से प्रस्तावित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सौदे पर इस यात्रा के दौरान अहम प्रगति या अंतिम सहमति बन सकती है.

ब्रह्मोस डील भारत के लिए क्यों है अहम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जुलाई से इंडोनेशिया के तीन दिवसीय दौरे पर रहेंगे. इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संभावित ब्रह्मोस मिसाइल समझौता माना जा रहा है. यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्र की बड़ी उपलब्धियों में शामिल होगा. साथ ही इससे भारत की रक्षा तकनीक पर वैश्विक भरोसा भी और मजबूत होगा. भारत पिछले कुछ वर्षों में ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा आत्मनिर्भरता के तहत अपने हथियारों के निर्यात पर विशेष जोर दे रहा है. ऐसे में इंडोनेशिया जैसे महत्वपूर्ण साझेदार के साथ यह समझौता भारत की वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ती मौजूदगी का संकेत माना जा रहा है.

दक्षिण-पूर्व एशिया में बनेगी ब्रह्मोस देशों की नई श्रृंखला

फिलीपींस पहले ही भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीद चुका है, जबकि वियतनाम भी इस दिशा में आगे बढ़ चुका है. यदि इंडोनेशिया भी इस सूची में शामिल हो जाता है, तो वह ब्रह्मोस संचालित करने वाला दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक मलेशिया और थाईलैंड ने भी इस मिसाइल प्रणाली में रुचि दिखाई है. यदि भविष्य में इन देशों के साथ भी समझौते होते हैं, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई रणनीतिक समुद्री इलाकों के आसपास ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की एक मजबूत सुरक्षा श्रृंखला विकसित हो सकती है.

भारत की रणनीतिक स्थिति होगी मजबूत

इंडोनेशिया के साथ संभावित रक्षा समझौता केवल व्यापारिक उपलब्धि नहीं होगा, बल्कि इसका सीधा असर क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी पड़ सकता है. दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन लगातार अपनी सैन्य मौजूदगी और समुद्री गतिविधियों का विस्तार कर रहा है. ऐसे में इस क्षेत्र के कई देश अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. ब्रह्मोस जैसी लंबी दूरी की सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल इन देशों को समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अधिक सक्षम बना सकती है. इससे वे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत कर सकेंगे और संभावित खतरों का बेहतर तरीके से सामना कर पाएंगे.

साउथ चाइना सी पर क्यों टिकी रहती है दुनिया की नजर?

साउथ चाइना सी दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है. हर साल इस रास्ते से खरबों डॉलर का वैश्विक व्यापार गुजरता है. यही वजह है कि यह इलाका आर्थिक और सामरिक, दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस समुद्री क्षेत्र पर चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और अन्य देशों के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय दावे और विवाद बने हुए हैं. बीते वर्षों में चीन ने यहां कृत्रिम द्वीपों का निर्माण किया है, सैन्य ढांचे को मजबूत किया है और नौसैनिक गतिविधियों में भी तेजी लाई है. इससे क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ा है.

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