Bangladesh Violence: बांग्लादेश में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के लिए कानून-व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बन चुकी है. देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा, गोलीबारी और आपराधिक गतिविधियों की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. राजधानी ढाका एक बार फिर अशांति का केंद्र बन गई है, जहां हालिया दिनों में हिंसक घटनाओं ने लोगों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है.
ढाका के धानमंडी-32 इलाके में उस्मान हादी की मौत के बाद हालात एक बार फिर विस्फोटक हो गए. यह वही इलाका है जो बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास के कारण ऐतिहासिक महत्व रखता है. गुरुवार रात बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए, जिसके बाद इलाके में तनाव फैल गया. कई जगहों पर तोड़फोड़ और हिंसक गतिविधियों की खबरें सामने आईं.
कट्टरपंथी गुटों और अपराधी नेटवर्क
सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय विश्लेषकों के अनुसार, बांग्लादेश का बड़ा हिस्सा अब कट्टरपंथी संगठनों और संगठित अपराधी गिरोहों की चपेट में आता जा रहा है. अवैध हथियारों की उपलब्धता इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि उपद्रवी उन्हें खुलेआम लेकर हिंसक वारदातों को अंजाम दे रहे हैं. पुलिस और प्रशासन की पकड़ कमजोर होती दिख रही है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं.
15 महीनों में करीब 5000 हत्याएं
पुलिस थानों में दर्ज आंकड़े हालात की भयावहता को बयां करते हैं. पिछले 15 महीनों में करीब 5,000 लोगों की हत्या दर्ज की जा चुकी है. ये सिर्फ वे मामले हैं जो आधिकारिक तौर पर दर्ज हुए हैं. जमीनी हालात इससे कहीं अधिक गंभीर बताए जा रहे हैं. हिंसा का सबसे ज्यादा असर अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ रहा है, जिनमें हिंदू और ईसाई समुदाय विशेष रूप से कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं.
चुनाव से पहले क्यों बिगड़ रहे हैं हालात?
बांग्लादेश में यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब फरवरी 2026 में राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव कराने की घोषणा की जा चुकी है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही हिंसा और अस्थिरता बढ़ती जा रही है. ‘ढाका ट्रिब्यून’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हालात इतने खराब हैं कि बीएनपी से नामित उम्मीदवार मोहम्मद मसूदुज्ज़मान मसूद ने नारायणगंज-5 सीट से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया. उनका कहना है कि मौजूदा माहौल में उनकी जान को गंभीर खतरा है.
अवैध हथियारों की खुली तस्करी बना बड़ी वजह
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हालात बिगड़ने की एक बड़ी वजह अगस्त 2024 की वे घटनाएं हैं, जब कई पुलिस थानों से हथियार लूट लिए गए थे. ये हथियार अब भी अपराधियों के पास मौजूद हैं. इसके अलावा सीमावर्ती इलाकों से अवैध तस्करी के जरिए हथियारों की सप्लाई लगातार जारी है. इन्हीं हथियारों के दम पर कट्टरपंथी और अपराधी गुट अपना दबदबा बनाए हुए हैं.
बीते कुछ हफ्तों में कई हाई-प्रोफाइल हत्याओं ने देश को हिला दिया है. पाबना के ईशुरदी इलाके में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के एक नेता की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई. वहीं ढाका में ‘इंक़िलाब मंच’ के प्रवक्ता उस्मान हादी को सिर में गोली मारी गई, जिनकी इलाज के दौरान मौत हो गई. चटगांव में एक कारोबारी के घर पर अंधाधुंध फायरिंग की घटना ने भी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
नवंबर में अपराध के आंकड़े और भी चौंकाने वाले
पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ नवंबर महीने में ही पूरे देश में 279 हत्याएं दर्ज की गईं. इसी अवधि में 184 डकैती, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा के 1,744 मामले, 93 अपहरण और 1,110 चोरी व झपटमारी की घटनाएं सामने आईं. नवंबर में कुल 14,465 आपराधिक मामले दर्ज किए गए. पिछले 15 महीनों में दर्ज 4,809 हत्याओं में से 3,236 हत्याएं अकेले 2025 के पहले दस महीनों में हुईं.
चार घटनाएं जिन्होंने हालात को और भड़काया
11 दिसंबर को पुराने ढाका के श्यामबाजार इलाके में मसाला व्यापारी अब्दुर रहमान की हत्या कर दी गई. 12 दिसंबर को ढाका के बिजयनगर इलाके में उस्मान हादी को गोली मारी गई. 17 दिसंबर को पाबना में दिनदहाड़े बीएनपी नेता बिरू मोल्ला की हत्या कर दी गई. इससे पहले खुलना के कोर्टपाड़ा इलाके में दो लोगों की सार्वजनिक हत्या और मीरपुर में जुबो दल के नेता गोलाम किब्रिया की गोली मारकर हत्या की घटनाएं भी सामने आईं.
ऑपरेशन डेविल हंट भी नहीं ला पाया असर
सरकार और सुरक्षा एजेंसियां हालात काबू में होने का दावा कर रही हैं. रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) के अनुसार, पूरे देश में निगरानी बढ़ा दी गई है और अवैध हथियारों के खिलाफ अभियान तेज किया गया है. ‘ऑपरेशन डेविल हंट: फेज-2’ के तहत एक ही दिन में 1,921 लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई हथियार जब्त किए गए. हालांकि, पूर्व पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ये कदम पर्याप्त नहीं हैं और अपराधियों के पास अब भी भारी मात्रा में हथियार मौजूद हैं.
गृह मंत्रालय और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि देश की सुरक्षा स्थिति नियंत्रण में है और लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट नजर आती है. नेता चुनाव से पीछे हट रहे हैं, आम नागरिक भय के माहौल में जी रहे हैं और कट्टरपंथी ताकतें हालात का फायदा उठाती दिख रही हैं.
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