Sawan Hariyali Teej 2026: सावन की हरियाली और भक्ति के रंगों के बीच आज हरियाली तीज का पावन पर्व मनाया जा रहा है. सनातन परंपरा में सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और परिवार में समृद्धि का वातावरण रहता है. तृतीया तिथि 14 अगस्त शाम 6:46 बजे शुरू हुई और आज शाम 5:28 बजे समाप्त होगी. पूजा के लिए सुबह 5:54 से 9:07 बजे तक और प्रदोष काल में शाम 6:38 से रात 8:51 बजे तक का समय शुभ माना गया है.
सुहागिन महिलाओं के लिए खास है हरियाली तीज
हरियाली तीज का व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. महिलाएं पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं. इस दिन हरे रंग के वस्त्र पहनना, हरी चूड़ियां धारण करना और मेहंदी लगाना शुभ परंपरा का हिस्सा है. सोलह श्रृंगार कर महिलाएं माता पार्वती का ध्यान करती हैं और अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं. मान्यता है कि श्रद्धा से किया गया यह व्रत मन को आध्यात्मिक शांति देता है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है.
108 साल की तपस्या और शिव-पार्वती के मिलन की कथा
हरियाली तीज से जुड़ी धार्मिक कथा भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम, तपस्या और समर्पण को दर्शाती है. मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी. उनकी तपस्या और अटूट संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसी वजह से हरियाली तीज को शिव-शक्ति के पवित्र मिलन और अखंड सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है. इस दिन भक्त भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण कर अपने जीवन में सुख, शांति और वैवाहिक समृद्धि की कामना करते हैं.
मिट्टी के शिव-पार्वती की पूजा से जुड़ी प्राचीन परंपरा
हरियाली तीज पर प्रातःकाल या प्रदोष काल में मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है. श्रद्धालु विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करते हैं और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सच्चे मन से की गई आराधना और व्रत व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता और धैर्य बढ़ाता है. हालांकि पूजा-पाठ में स्थानीय परंपराओं और परिवार की मान्यताओं का भी ध्यान रखना उचित माना जाता है.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है.. भारत 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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