नई दिल्ली: धरती लगातार गर्म हो रही है और अब वैज्ञानिकों की नई चेतावनी ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी और यूके मेट ऑफिस की ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आने वाले पांच साल इंसानी इतिहास के सबसे गर्म सालों में शामिल हो सकते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 से 2030 के बीच वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है, जिसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इंसानों की जिंदगी, खेती, समुद्र और पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो दुनिया जल्द ही उस खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाएगी जहां से जलवायु परिवर्तन को रोकना बेहद मुश्किल हो सकता है. सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि आर्कटिक क्षेत्र बाकी दुनिया की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है.
पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट की सीमा पार होने का खतरा
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगले पांच वर्षों के दौरान पृथ्वी का औसत तापमान इंडस्ट्रियल एज से पहले के स्तर के मुकाबले 1.3 डिग्री से लेकर 1.9 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दौरान कम से कम एक साल ऐसा जरूर आएगा जब वैश्विक तापमान पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट के तहत तय की गई 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगा.
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक साल में इस सीमा का पार होना यह साबित नहीं करता कि पेरिस समझौता पूरी तरह विफल हो गया है. क्योंकि इस समझौते में लंबे समय यानी लगभग 20 वर्षों के औसत तापमान को आधार माना जाता है. लेकिन लगातार बढ़ता तापमान इस बात का संकेत जरूर है कि दुनिया खतरनाक स्थिति की ओर तेजी से बढ़ रही है.
2024 से भी ज्यादा गर्म हो सकता है कोई साल
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2026 से 2030 के बीच कोई एक साल ऐसा हो सकता है, जो 2024 से भी ज्यादा गर्म रिकॉर्ड किया जाए. गौरतलब है कि 2024 को अब तक का सबसे गर्म साल माना गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और वातावरण में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें हैं.
कार्बन उत्सर्जन, जंगलों की कटाई, औद्योगिक गतिविधियां और जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग धरती के तापमान को तेजी से बढ़ा रहा है. यही वजह है कि अब मौसम के पैटर्न में भी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं.
आर्कटिक में तेजी से पिघलेगी बर्फ
रिपोर्ट में सबसे गंभीर असर आर्कटिक क्षेत्र पर बताया गया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में आर्कटिक की सर्दियां सामान्य से लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो सकती हैं. इसका सीधा असर समुद्री बर्फ पर पड़ेगा और बेरेंट्स सागर, बेरिंग सागर और ओखोत्स्क सागर जैसे इलाकों में बर्फ तेजी से पिघल सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्कटिक में तेजी से हो रहा बदलाव पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करेगा. इससे समुद्र के स्तर में वृद्धि, तेज तूफान, अनियमित बारिश और चरम मौसमी घटनाओं की संख्या बढ़ सकती है.
दुनिया भर में दिखेंगे जलवायु परिवर्तन के असर
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते तापमान का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से दिखाई देगा. उत्तरी यूरोप, अलास्का, साइबेरिया और साहेल क्षेत्र में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है, जबकि अमेजन के जंगलों को गंभीर सूखे का सामना करना पड़ सकता है.
इसके अलावा इस साल के अंत तक ‘अल नीनो’ वेदर सिस्टम के मजबूत होने की आशंका भी जताई गई है. अल नीनो प्रशांत महासागर के पानी को गर्म करता है, जिससे वैश्विक तापमान और बढ़ सकता है. इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है और कई देशों में सूखा, बाढ़ और भीषण गर्मी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं.
आने वाले साल इंसानों के लिए बड़ी चुनौती
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दुनिया ने अभी भी कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं. बढ़ती गर्मी का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य संकट, पानी की कमी और स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में भी सामने आएगा.
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