Global Oil Crisis: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट को एक बार फिर दबाव में ला दिया है. तेल और रिफाइंड फ्यूल की सप्लाई प्रभावित होने से कई देशों में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं. अमेरिका में भी डीजल की कीमतें पहली बार 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर जाने की रिपोर्ट सामने आई है.
इस उथल-पुथल के बीच भारत की रिफाइनिंग क्षमता और मजबूत सप्लाई नेटवर्क ने उसे अंतरराष्ट्रीय फ्यूल मार्केट में अहम स्थिति में पहुंचा दिया है. तुर्की से लेकर यूरोप और केन्या तक कई बाजारों में भारतीय रिफाइनरियों से निकलने वाले पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ी है. हालांकि, इसे केवल किसी एक सरकारी रणनीति का परिणाम मानने के बजाय वैश्विक सप्लाई में आए बदलाव और भारतीय रिफाइनिंग क्षमता दोनों के संदर्भ में देखना जरूरी है.
रूस से घटा डीजल तो तुर्की ने बढ़ाया भारत का रुख
तुर्की लंबे समय से रूसी डीजल पर काफी निर्भर रहा है. 2025 में उसके कुल डीजल आयात का करीब 85 फीसदी रूस से आया था. लेकिन 2026 में रूस से सप्लाई में आई कमी और डीजल एक्सपोर्ट प्रतिबंधों के बीच तुर्की को नए सप्लायर तलाशने पड़े. अगस्त 2026 में रूस से तुर्की की डीजल सप्लाई घटकर करीब 80 हजार बैरल प्रतिदिन रह गई, जिससे रूसी हिस्सेदारी लगभग 20 फीसदी पर आ गई.
इसी दौरान भारत से तुर्की को डीजल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. Kpler के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में तुर्की ने भारत से 1.2 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा डीजल आयात किया. अमेरिका से भी आयात करीब 90 हजार बैरल प्रतिदिन रहा. यानी रूसी सप्लाई में आई कमी के बाद तुर्की ने भारत और अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख किया.
यूरोप की फ्यूल सप्लाई में भारत की बड़ी हिस्सेदारी
भारत की बढ़ती भूमिका सिर्फ तुर्की तक सीमित नहीं है. अगस्त 2026 में यूरोप जाने वाले जहाजों ने बाब-अल-मंडेब रूट से करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल और गैसऑयल पहुंचाया. Vortexa के आंकड़ों के मुताबिक, इस मात्रा का लगभग 60 फीसदी भारतीय रिफाइनरों से आया था.
रूसी डीजल निर्यात में गिरावट और अमेरिकी सप्लाई कमजोर पड़ने के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोपीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. इस बदलाव से पता चलता है कि वैश्विक फ्यूल ट्रेड में भारत की रिफाइनिंग क्षमता अब सिर्फ घरेलू जरूरत पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में भी उसकी अहम भूमिका है.
केन्या में भी बढ़ी भारतीय पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मांग
अफ्रीकी बाजार में भी भारत की मौजूदगी बढ़ी है. अगस्त में सामने आई Kpler और EOA से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक, भारत केन्या के लिए पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का प्रमुख सप्लायर बनकर उभरा. भारतीय कंपनियां केन्या को गैसोलीन, डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल की सप्लाई कर रही हैं.
इस बदलाव के पीछे वेस्ट एशिया में सप्लाई बाधित होना एक अहम वजह बताया गया है. साल की शुरुआत में केन्या को UAE से करीब 90 हजार बैरल प्रतिदिन पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स मिल रहे थे, लेकिन अगस्त तक यह मात्रा घटकर करीब 15 हजार बैरल प्रतिदिन रह गई. ऐसे में भारत समेत दूसरे एशियाई सप्लायरों की भूमिका बढ़ी.
भारत की रिफाइनिंग क्षमता बनी बड़ी ताकत
भारत की ग्लोबल फ्यूल सप्लाई में बढ़ती भूमिका के पीछे उसकी विशाल रिफाइनिंग क्षमता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है. भारत की स्थापित रिफाइनिंग क्षमता 258.1 मिलियन टन प्रति वर्ष है और देश को दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर बताया जाता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 61.5 मिलियन टन पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का निर्यात किया था.
भारत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और घरेलू रिफाइनरियों में उसे पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में बदला जाता है. घरेलू मांग पूरी करने के बाद उपलब्ध अतिरिक्त रिफाइंड प्रोडक्ट्स को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजा जा सकता है. यही मॉडल भारत को ग्लोबल फ्यूल मार्केट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद करता है.
रूस से सस्ता क्रूड और भारतीय रिफाइनिंग का कनेक्शन
भारत की ऑयल स्ट्रेटजी में रूसी क्रूड की भी अहम भूमिका रही है. हालांकि अगस्त 2026 में भारत का रूसी तेल आयात घटकर करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, फिर भी रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना रहा. साथ ही भारत ने इराक, UAE और अन्य स्रोतों से भी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है.
यही विविधता भारत की ऊर्जा व्यवस्था को वैश्विक बाजार में बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने में मदद करती है. एक तरफ भारतीय रिफाइनरियां आयातित क्रूड को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग के मुताबिक फ्यूल में बदलती हैं, वहीं दूसरी तरफ अलग-अलग देशों से कच्चे तेल की खरीद भारत को सप्लाई स्रोतों में बदलाव के लिए कुछ लचीलापन देती है.
ग्लोबल संकट ने बदला फ्यूल ट्रेड का नक्शा
मिडिल ईस्ट और रूस-यूक्रेन से जुड़े संघर्षों ने वैश्विक तेल बाजार की पुरानी सप्लाई चेन को प्रभावित किया है. रूस और मिडिल ईस्ट से रिफाइंड फ्यूल की सप्लाई में व्यवधान के बीच एशियाई रिफाइनरों ने कई बाजारों में खाली हुई जगह को भरना शुरू किया है. अगस्त में एशिया से अफ्रीका जाने वाला डीजल निर्यात भी करीब साढ़े चार साल के उच्च स्तर पर पहुंचा. इस पूरे बदलाव में भारत की भूमिका इसलिए खास है क्योंकि उसके पास बड़े पैमाने पर रिफाइनिंग क्षमता, क्रूड आयात का विस्तृत नेटवर्क और कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच है. आने वाले समय में ग्लोबल सप्लाई रूट और भू-राजनीतिक हालात किस दिशा में जाते हैं, उसी के आधार पर भारतीय पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की अंतरराष्ट्रीय मांग भी बदल सकती है.
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