राजस्थान में खांसी की दवा बनी 'जहर', 2 बच्चों की मौत से हड़कंप, ताला लगाकर भागी कफ स‍िरप बनाने वाली कंपनी

भरतपुर और सीकर जैसी जगहों पर बच्चों की मौत और गंभीर बीमारियों के मामले सामने आने के बाद अब यह खुलासा हुआ है कि संबंधित दवा एक पहले से डिबार की गई कंपनी केयसंस फार्मा लिमिटेड द्वारा बनाई गई थी.

Cough syrup company shuts down and disappears after 2 children die from its medicine
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राजस्थान में बच्चों के लिए दी जाने वाली खांसी की सिरप ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. भरतपुर और सीकर जैसी जगहों पर बच्चों की मौत और गंभीर बीमारियों के मामले सामने आने के बाद अब यह खुलासा हुआ है कि संबंधित दवा एक पहले से डिबार की गई कंपनी केयसंस फार्मा लिमिटेड द्वारा बनाई गई थी. जयपुर की यह कंपनी अब अपनी फैक्ट्री पर ताला डाल कर गायब है.

फैक्ट्री पर लटका ताला

जयपुर के सरना डूंगर इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित केयसंस फार्मा की फैक्ट्री इस समय पूरी तरह बंद है. न कोई कर्मचारी मौजूद है, न ही मालिक का कोई अता-पता है. दो दिन पहले भरतपुर में हुई घटना के बाद सैंपल जांच में दवा की गुणवत्ता फेल पाई गई, जिसके बाद से कंपनी ने फैक्ट्री को बंद कर दिया है.

सैंपल में मिला था दोष

करीब छह महीने पहले ड्रग विभाग ने कंपनी की खांसी की सिरप (बैच नंबर KL 22/357) का सैंपल लिया था. जांच में यह सामने आया कि सिरप में मौजूद मेंटॉल तय मानक (0.5mg) के अनुरूप नहीं था. इसके बाद फरवरी 2025 में कंपनी को एक साल के लिए डिबार कर दिया गया था. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि डिबार के बावजूद कंपनी की अन्य दवाएं सरकारी अस्पतालों में लगातार सप्लाई होती रहीं.

सीकर में बच्चे की मौत

Dextromethorphan Syrup पीने से सीकर के अजीतगढ़ में एक 5 वर्षीय बच्चे की मौत हो गई. इसी दवा से जयपुर और भरतपुर में भी कई बच्चे बीमार पड़े. एक डॉक्टर को भी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. इसके बाद चिकित्सा विभाग ने तत्काल इस सिरप के वितरण पर रोक लगा दी और सैंपल दोबारा लैब भेजे गए हैं. रिपोर्ट का इंतजार है.

पहले भी बिगड़ी थीं बच्चों की तबीयत

यह मामला नया नहीं है. 2021 में दिल्ली के कलावती सरन अस्पताल में भी इसी कंपनी की दवा पीने से 16 बच्चों की तबीयत बिगड़ गई थी. तब मेडिकल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि यह दवा 4 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बिल्कुल असुरक्षित है. 2023 में राजस्थान ड्रग्स कंट्रोल कमिश्नरेट ने भी इस कंपनी की एक अन्य सिरप को "नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी" घोषित किया था.

जांच के लिए बनी समिति

सरकार ने अब पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है. साथ ही संबंधित सिरप के वितरण पर रोक लगाई गई है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब बार-बार सैंपल फेल हो रहे थे, तो ऐसी दवाएं पास कैसे होती रहीं? और डिबार कंपनी की दवाएं सरकारी अस्पतालों तक कैसे पहुंचती रहीं?

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