भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को लेकर मध्यस्थता के दावे कोई नए नहीं हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दर्जनों बार यह कह चुके हैं कि उन्होंने दोनों देशों के बीच तनाव कम कराने में भूमिका निभाई है. इन बयानों से भारत लंबे समय तक असहज रहा, हालांकि बाद में नई दिल्ली ने ऐसे दावों पर प्रतिक्रिया देना लगभग बंद कर दिया.
लेकिन 2025 के अंत में चीन द्वारा किया गया मध्यस्थता का दावा भारत के लिए कहीं ज्यादा गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है. यह ऐसा दावा है जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता.
चीन के दावे ने बढ़ाई भारत की कूटनीतिक चिंता
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने वर्ष 2025 की अपनी कूटनीतिक उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए भारत-पाकिस्तान तनाव में मध्यस्थता का दावा किया. यह बयान साधारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि वांग यी सिर्फ विदेश मंत्री ही नहीं हैं, बल्कि वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य और सेंट्रल कमीशन फॉर फॉरेन अफेयर्स के शीर्ष अधिकारी भी हैं.
यानी चीन की विदेश नीति को दिशा देने वालों में वे सबसे अहम चेहरा हैं. इसलिए उनका यह बयान व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि बीजिंग की आधिकारिक सोच को दर्शाता है.
एशिया का ‘चौधरी’ बनने की कोशिश
वांग यी के बयान का सीधा संदेश यह है कि चीन खुद को एशिया और वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है. भारत-पाकिस्तान विवाद में मध्यस्थता का दावा कर चीन ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह अब वही भूमिका निभाएगा, जो दशकों तक अमेरिका निभाता रहा.
इस दावे के जरिए चीन ने न केवल क्षेत्रीय मामलों में अपनी पकड़ दिखाने की कोशिश की, बल्कि भारत की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति को भी चुनौती दी है.
दोनों को एक ही तराजू में तौलने की कोशिश
चीन का यह दावा ऐसे समय आया है, जब भारत खुद को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित कर चुका है. इसके बावजूद भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की बात कर चीन ने दोनों देशों को एक ही स्तर पर खड़ा कर दिया है.
इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि बीजिंग दोनों को बराबर मानते हुए खुद को शांति कराने वाला ‘निर्णायक’ मान रहा है. यह भारत की उस नीति के बिल्कुल खिलाफ है, जिसमें नई दिल्ली साफ कहती रही है कि भारत-पाकिस्तान विवाद द्विपक्षीय है और इसमें किसी तीसरे देश की कोई भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी.
ट्रंप के दावों से क्यों अलग है चीन का बयान
डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता वाले दावों को भारत ने धीरे-धीरे अनदेखा करना शुरू कर दिया था. लेकिन चीन का दावा अलग इसलिए है, क्योंकि वह एक पड़ोसी देश, सीमाई प्रतिद्वंद्वी और पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार भी है.
चीन का यह बयान भारत के उस रुख को कमजोर करने की कोशिश करता है, जिसमें भारत यह कहता है कि पाकिस्तान के डीजीएमओ के संपर्क के बाद ही सीजफायर हुआ था, न कि किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से.
खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की रणनीति
वांग यी का बयान यह भी दर्शाता है कि चीन दक्षिण एशिया में खुद को एक स्थायी मध्यस्थ के रूप में पेश करना चाहता है.
चीन-पाकिस्तान संबंध पहले से ही बेहद मजबूत हैं. इसके अलावा रूस के साथ उसकी नजदीकी, BRICS और SCO जैसे मंचों पर प्रभाव, और शी जिनपिंग का “साझा भविष्य वाले समुदाय” का विचार ये सभी संकेत देते हैं कि भारत-पाकिस्तान तनाव को चीन अपनी कूटनीतिक प्रयोगशाला की तरह देख रहा है.
भारत के लिए क्यों अहम है जवाब देना
अगर भारत इस दावे पर सिर्फ एक औपचारिक बयान देकर चुप हो जाता है, तो चीन इस नैरेटिव को आगे बढ़ाता रहेगा. इससे न केवल भारत की वैश्विक छवि को नुकसान हो सकता है, बल्कि वे देश भी हतोत्साहित हो सकते हैं, जो भारत को चीन के विकल्प के तौर पर देखते हैं.
खासकर ऐसे समय में, जब वैश्विक राजनीति में अमेरिका-चीन ‘G2’ जैसी अवधारणाओं की चर्चा हो रही है और दुनिया दो ध्रुवों में बंटती दिख रही है.
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