भारत के खिलाफ नहीं काम कर पाया पाकिस्तान का प्लान, चीन का अरबों डॉलर पानी में डूबा, जिनपिंग का सपना टूटा!

China CPEC In Pakistan: चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर में अरबों डॉलर खर्च करके एक बड़ा बंदरगाह तैयार किया था. इस प्रोजेक्ट को चीन की बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा माना गया. इसका मकसद चीन के पश्चिमी इलाके शिनजियांग को सीधे अरब सागर से जोड़ना था.

China massive bet on Gwadar Port Pakistan turns into a headache multi-billion dollar investment
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China CPEC In Pakistan: चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर में अरबों डॉलर खर्च करके एक बड़ा बंदरगाह तैयार किया था. इस प्रोजेक्ट को चीन की बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा माना गया. इसका मकसद चीन के पश्चिमी इलाके शिनजियांग को सीधे अरब सागर से जोड़ना था.

चीन के लिए ग्वादर पोर्ट की अहमियत इसलिए भी ज्यादा थी क्योंकि इसके जरिए वह मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता था. लेकिन अब यही प्रोजेक्ट चीन के लिए परेशानी बनता नजर आ रहा है. ग्वादर पोर्ट से उम्मीद के मुताबिक कारोबार नहीं हो पाया. इसके अलावा जिस इलाके से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) गुजरता है, वहां सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बनी हुई है.

ग्वादर में इतना निवेश करके भी चीन क्यों परेशान है?

ग्वादर पोर्ट को चीन के शिनजियांग से जोड़ने के लिए एक लंबा जमीन का रास्ता तैयार किया गया है. इसके लिए काराकोरम हाईवे का इस्तेमाल होता है. यह रास्ता बेहद ऊंचे और मुश्किल पहाड़ी इलाकों से गुजरता है. कई जगहों पर इसकी ऊंचाई 4,600 मीटर से भी ज्यादा है. यहां भूस्खलन, बर्फबारी और खराब मौसम जैसी समस्याएं अक्सर सामने आती हैं. इस वजह से इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कंटेनर और भारी सामान पहुंचाना आसान नहीं है.

लोवी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में एनालिस्ट जयदीप साइकिया ने भी इस कॉरिडोर की सुरक्षा और भौगोलिक चुनौतियों का जिक्र किया है. उनके मुताबिक, चीन से ग्वादर तक जाने वाला रास्ता गिलगित-बाल्टिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान से होकर गुजरता है. इन इलाकों में हिंसा, आतंकी गतिविधियों और स्थानीय विद्रोह की समस्या रही है. खासकर बलूचिस्तान में चीनी नागरिक और चीन से जुड़े प्रोजेक्ट लगातार निशाने पर रहे हैं.

BLA के हमलों ने बढ़ाई चीन की चिंता

ग्वादर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है. यह इलाका लंबे समय से विद्रोही गतिविधियों से प्रभावित रहा है. बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और दूसरे बलूच विद्रोही संगठन CPEC का विरोध करते रहे हैं. उनका आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का फायदा पाकिस्तान और चीन उठा रहे हैं.

इसी वजह से चीनी इंजीनियरों, कर्मचारियों, वाहनों और CPEC से जुड़े प्रोजेक्ट पर कई बार हमले हुए हैं. BLA की मजीद ब्रिगेड पर चीनी नागरिकों और उनके काफिलों को निशाना बनाकर आत्मघाती हमले करने के आरोप लगे हैं. इन घटनाओं ने चीन की सुरक्षा चिंता बढ़ा दी है.

चीनी नागरिकों और प्रोजेक्ट की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने स्पेशल सिक्योरिटी डिवीजन (SSD) भी बनाया है. हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक इसके बावजूद चीनी परियोजनाओं को पूरी तरह सुरक्षित रखना पाकिस्तान के लिए मुश्किल साबित हुआ है.

ग्वादर से कारोबार करना चीन के लिए क्यों महंगा है?

ग्वादर पोर्ट का एक बड़ा उद्देश्य चीन तक तेल और दूसरे सामान को कम दूरी के रास्ते से पहुंचाना था. लेकिन जमीन और पाइपलाइन के जरिए सामान पहुंचाना समुद्री रास्ते के मुकाबले काफी महंगा पड़ सकता है.

ग्वादर से शिनजियांग तक का रास्ता हजारों किलोमीटर लंबा है और इसमें काफी हिस्सा पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरता है. अगर पाइपलाइन के जरिए तेल पहुंचाया जाता है तो उसे ऊंचाई वाले इलाकों तक पंप करने में भी काफी ऊर्जा खर्च होगी.

इसके अलावा इतनी लंबी पाइपलाइन या रेलवे लाइन को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती है. जिन इलाकों से यह रास्ता गुजरता है, वहां विद्रोही समूहों के हमलों का खतरा बना रहता है. समुद्र के रास्ते आने वाला तेल भी आखिरकार हिंद महासागर से होकर गुजरता है. ऐसे में चीन को अपनी समुद्री सुरक्षा और भारतीय नौसेना की मौजूदगी को भी ध्यान में रखना पड़ता है.

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी बनी बड़ी समस्या

CPEC की सफलता के लिए पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी अहम है. लेकिन पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक और विदेशी मुद्रा संकट से जूझता रहा है. देश को अपने भुगतान संतुलन को संभालने के लिए कई बार IMF की मदद लेनी पड़ी है. 

इसके अलावा चीन से लिए गए कर्ज की शर्तों में राहत और भुगतान को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की गई है. ऐसे माहौल में ग्वादर जैसे बड़े प्रोजेक्ट से उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं होना चीन के लिए चिंता की बात है.

91 फीसदी कमाई चीन को, फिर भी ग्वादर खाली क्यों?

ग्वादर पोर्ट को लेकर एक और बड़ी बात इसकी कमाई से जुड़ी है. मौजूदा 40 साल की लीज व्यवस्था के तहत बंदरगाह से होने वाली कमाई का करीब 91 फीसदी हिस्सा चीन की कंपनी को मिलने की बात कही गई है. लेकिन समस्या यह है कि बंदरगाह पर कारोबार ही उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रहा. 

यानी कमाई कम है, जबकि बंदरगाह और उससे जुड़े ढांचे की सुरक्षा पर लगातार पैसा खर्च करना पड़ रहा है. चीन के लिए यह स्थिति इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उसे अपने नागरिकों और निवेश की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है.

क्या चीन ग्वादर से पीछे हट सकता है?

ग्वादर पोर्ट अब चीन के लिए एक मुश्किल मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है. एक तरफ पाकिस्तान के लिए इसकी सुरक्षा और रखरखाव का खर्च उठाना आसान नहीं है. दूसरी तरफ चीन भी ऐसे प्रोजेक्ट में लगातार पैसा लगाना नहीं चाहता, जहां कमाई कम और सुरक्षा जोखिम ज्यादा हो. लोवी इंस्टीट्यूट के विश्लेषण में यह संभावना जताई गई है कि चीन भविष्य में ग्वादर में अपनी गतिविधियां सीमित कर सकता है.

ऐसा जरूरी नहीं है कि चीन अचानक ग्वादर से पूरी तरह बाहर निकल जाए. इसके बजाय वह बंदरगाह के इस्तेमाल का तरीका बदल सकता है. मसलन, एक बड़े कमर्शियल पोर्ट की जगह इसे सीमित कारोबार और नौसैनिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

ग्वादर को लेकर चीन की सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि जिस प्रोजेक्ट को कभी रणनीतिक फायदे का बड़ा रास्ता माना गया था, वह आर्थिक लागत, मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों और सुरक्षा चुनौतियों के कारण लगातार कठिन होता जा रहा है.

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