BrahMos NG: 3 गुना रेंज, आधा वजन... ब्रह्मोस-NG बनेगा दुश्मनों का काल; सुखोई-तेजस से भी बरसेगी तबाही

BrahMos NG: कम वजन, ज्यादा रेंज और बेहतर स्टील्थ फीचर्स के साथ ब्रह्मोस-NG भारत की अगली पीढ़ी की सबसे ताकतवर सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनने की ओर बढ़ रही है.

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BrahMos NG: भारत और रूस की साझेदारी में विकसित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस अब अपने नए संस्करण ब्रह्मोस-एनजी (Next Generation) के साथ रक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है. यह मिसाइल मौजूदा ब्रह्मोस की तुलना में काफी हल्की और अधिक आधुनिक होगी. वजन कम होने के बावजूद इसकी मारक क्षमता और ऑपरेशनल दक्षता पहले से कहीं अधिक प्रभावी रहने वाली है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस-एनजी भारतीय सशस्त्र बलों की आक्रामक क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती है और वैश्विक हथियार बाजार में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ेगी.

हल्का डिजाइन देगा युद्ध में बड़ा फायदा

मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल का वजन लगभग 3 टन है, जिसकी वजह से इसे सीमित प्लेटफॉर्म्स पर ही तैनात किया जा सकता है. वहीं, नई ब्रह्मोस-एनजी का वजन करीब 1.2 टन होगा. हल्का और कॉम्पैक्ट डिजाइन होने से इसे विभिन्न लड़ाकू विमानों और नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स पर आसानी से लगाया जा सकेगा. इसका सबसे बड़ा लाभ भारतीय वायुसेना को मिलेगा. पहले जहां सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमान सीमित संख्या में ब्रह्मोस मिसाइलें लेकर उड़ान भरते थे, वहीं नई मिसाइल के आने के बाद एक ही मिशन में अधिक मिसाइलें ले जाना संभव होगा. इससे दुश्मन के कई ठिकानों पर एक साथ सटीक हमला किया जा सकेगा.

तेजस और मिग-29K जैसे विमानों पर भी होगी तैनाती

ब्रह्मोस-एनजी को केवल सुखोई-30 तक सीमित नहीं रखा जाएगा. इसका छोटा आकार और कम वजन इसे एलसीए तेजस, मिग-29K, छोटे युद्धपोतों और पनडुब्बियों के लिए भी उपयुक्त बनाता है. इससे भारतीय सेना को अलग-अलग मोर्चों पर एक ही मिसाइल सिस्टम का व्यापक उपयोग करने की सुविधा मिलेगी.

स्टील्थ तकनीक बनाएगी दुश्मन के लिए बड़ी चुनौती

नई पीढ़ी की इस मिसाइल में अत्याधुनिक स्टील्थ फीचर्स शामिल किए जा रहे हैं. इसका उद्देश्य दुश्मन के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देना है. कम रडार सिग्नेचर और उन्नत तकनीक के कारण इसे ट्रैक करना पहले की तुलना में अधिक कठिन होगा, जिससे ऑपरेशन के दौरान इसकी सफलता की संभावना बढ़ जाएगी.

रेंज और स्वदेशीकरण पर भी रहेगा खास जोर

ब्रह्मोस-एनजी को लंबी दूरी तक सटीक हमला करने के लिए विकसित किया जा रहा है. भविष्य में इसकी मारक क्षमता को और बढ़ाने की भी योजना है. साथ ही, आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इसके अधिकतर महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण देश में ही किया जाएगा. पहले जहां कई अहम कंपोनेंट रूस से आयात किए जाते थे, अब बूस्टर के बाद वारहेड का निर्माण भी भारत में ही करने की दिशा में काम तेजी से आगे बढ़ रहा है. इससे उत्पादन पर विदेशी निर्भरता कम होगी और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को मजबूती मिलेगी.

उत्पादन लागत में आएगी बड़ी कमी

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व एमडी एवं सीईओ सुधीर कुमार मिश्रा के अनुसार, मिसाइल के निर्माण में एडवांस कंपोजिट मैटेरियल्स का उपयोग किया जा रहा है, जिससे इसका वजन कम हुआ है. वहीं, स्वदेशीकरण और वैल्यू इंजीनियरिंग की वजह से कच्चे माल और विभिन्न कंपोनेंट्स की लागत भी घट रही है. रक्षा उद्योग से जुड़े अधिकारियों का अनुमान है कि अगले दो वर्षों में ब्रह्मोस मिसाइल की कुल निर्माण लागत में करीब 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है. इससे भारत के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान होगा और विदेशी ग्राहकों को भी प्रतिस्पर्धी कीमत पर मिसाइल उपलब्ध कराई जा सकेगी.

फिलीपींस के बाद कई देशों की नजर ब्रह्मोस पर

फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कंपनी के सीईओ जयतीर्थ आर. जोशी के अनुसार, वियतनाम के साथ मिसाइल सौदे को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और केवल कुछ औपचारिक मंजूरियां शेष हैं. इसके अलावा इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समेत कई अन्य देशों के साथ भी भारत की बातचीत आगे बढ़ चुकी है. यदि ये समझौते पूरे होते हैं तो भारत वैश्विक रक्षा निर्यात के क्षेत्र में और मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है.

ब्रह्मोस-NG की प्रमुख खूबियां

विशेषता- ब्रह्मोस-NG
वजन- लगभग 1.2 टन
डिजाइन- कॉम्पैक्ट और हल्का
तैनाती- तेजस, सुखोई-30, मिग-29K, छोटे युद्धपोत और पनडुब्बियां
तकनीक- एडवांस स्टील्थ फीचर्स
रेंज- लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता
स्वदेशीकरण- बूस्टर और वारहेड दोनों का स्वदेशी निर्माण
लागत- अगले दो वर्षों में करीब 20% तक कमी की संभावना

भारत की रक्षा क्षमता को मिलेगा नया आयाम

ब्रह्मोस-एनजी केवल मौजूदा मिसाइल का हल्का संस्करण नहीं, बल्कि भारतीय रक्षा तकनीक का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है. कम वजन, अधिक प्लेटफॉर्म्स पर तैनाती, आधुनिक स्टील्थ तकनीक और बढ़ते स्वदेशीकरण के साथ यह मिसाइल भारतीय सेना की रणनीतिक क्षमता को नई मजबूती दे सकती है. साथ ही, बढ़ती वैश्विक मांग भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकती है.

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