US-Greenland Tension: ग्रीनलैंड में तैनात होगा अमेरिका का लड़ाकू विमान, क्या और बढ़ेगी तनातनी?

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच अमेरिकी सेना ने एक अहम सैन्य फैसला लिया है.

American fighter aircraft will be deployed in Greenland
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US-Greenland Tension: ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच अमेरिकी सेना ने एक अहम सैन्य फैसला लिया है. अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपने लड़ाकू विमानों की तैनाती का ऐलान किया है. यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी मंशा को बार-बार सार्वजनिक रूप से दोहरा चुके हैं, जिसका डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों ने कड़ा विरोध किया है.

अमेरिकी सेना के इस कदम को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है और इससे अमेरिका तथा यूरोप, खासतौर पर डेनमार्क के रिश्तों में और तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. हालांकि, अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि यह तैनाती कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि पहले से चली आ रही सुरक्षा योजनाओं का हिस्सा है.

पिटुफिक स्पेस बेस पर तैनात होंगे विमान

नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (NORAD) ने जानकारी दी है कि उसके लड़ाकू विमान जल्द ही ग्रीनलैंड स्थित पिटुफिक स्पेस बेस पर पहुंचेंगे. NORAD के मुताबिक, यह तैनाती आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की हवाई सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से की जा रही है.

इन विमानों का संचालन अमेरिका और कनाडा में मौजूद सैन्य ठिकानों से किया जाएगा. NORAD ने स्पष्ट किया है कि यह कदम क्षेत्रीय रक्षा योजनाओं के अनुरूप है और इसका मकसद उत्तरी क्षेत्र में संभावित खतरों पर नजर बनाए रखना है.

डेनमार्क और ग्रीनलैंड को दी गई जानकारी

अमेरिकी सेना ने इस बात पर जोर दिया है कि लड़ाकू विमानों की तैनाती से पहले डेनमार्क सरकार को पूरी जानकारी दे दी गई थी. इसके अलावा ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार को भी इस फैसले से अवगत कराया गया था. NORAD का कहना है कि यह तैनाती डेनमार्क के साथ समन्वय में की जा रही है.

हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं किया गया है कि अमेरिकी लड़ाकू विमान किस तारीख को ग्रीनलैंड पहुंचेंगे. सैन्य अधिकारियों के अनुसार, तैनाती की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी.

ट्रंप के बयानों से बढ़ा विवाद

ग्रीनलैंड को लेकर विवाद उस समय और गहराया जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा किया कि ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बन जाना चाहिए. इस बयान के बाद यूरोपीय देशों ने कड़ा विरोध जताया. डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड उसकी संप्रभुता के अंतर्गत आता है और उस पर किसी तरह का समझौता संभव नहीं है.

यूरोपीय विरोध से नाराज ट्रंप ने डेनमार्क समेत कई देशों पर आर्थिक दबाव बनाने की धमकी दी है. उन्होंने कहा है कि अगर ग्रीनलैंड के मुद्दे पर विरोध जारी रहा तो डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है.

रणनीतिक रूप से क्यों अहम है ग्रीनलैंड?

ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बेहद रणनीतिक महत्व रखता है. उत्तरी ध्रुव के पास स्थित होने की वजह से यह क्षेत्र वैश्विक सुरक्षा, मिसाइल चेतावनी प्रणाली और हवाई निगरानी के लिहाज से अहम माना जाता है.

ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी आधिकारिक तौर पर डेनमार्क के पास है, लेकिन अमेरिका और डेनमार्क के बीच दशकों से रक्षा सहयोग चला आ रहा है. ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना का सैन्य अड्डा कई वर्षों से मौजूद है, जो अमेरिका की आर्कटिक रणनीति का अहम हिस्सा रहा है.

NORAD की लंबे समय से मौजूदगी

अमेरिका और कनाडा की संयुक्त हवाई रक्षा कमांड NORAD पिछले कई दशकों से ग्रीनलैंड और उसके आसपास के क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा गतिविधियां संचालित कर रही है. NORAD का मुख्य उद्देश्य उत्तरी अमेरिका की हवाई और अंतरिक्ष सुरक्षा सुनिश्चित करना है.

अमेरिकी लड़ाकू विमानों की मौजूदा तैनाती को इन्हीं लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा गतिविधियों की निरंतरता बताया जा रहा है. हालांकि, मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए इस कदम को केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है.

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