1.सीटों का मोलभाव छोड़ो, पहले जीतने का मंत्र पढ़ो !
इंडिया गठबंधन में सीट-बंटवारे से पहले जीत की प्राथमिकता पर जोर..अखिलेश के बयान को द्रमुक का समर्थन !
आगामी चुनावी राज्यों को लेकर विपक्षी गठबंधन के भीतर सीट-शेयरिंग का तनाव कम करने के लिए नए सुर सुनाई देने लगे हैं. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के इस आह्वान का द्रमुक ने खुला समर्थन किया कि सीटों की संख्या पर अड़ने के बजाय मिलकर हराना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. अलबत्ता अंदरखाने छोटे क्षेत्रीय दल अपनी सीटें गंवाने को तैयार नहीं दिखते. सचमुच त्याग की बातें मंचों पर जितनी सुहावनी लगती हैं, बंद कमरों की बैठकों में उतनी ही कड़वी साबित होती हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे गठबंधन को बिखरने से बचाने की कवायद मान रहे हैं, वहीं सत्ता पक्ष इसे विपक्ष के अंतर्कलह पर पर्दा डालने की कोशिश बता रहा है. यक्ष प्रश्न यही है कि टिकट वितरण के समय यह त्याग की भावना कितनी देर टिक सकेगी ?
2.एकला चलो' का राग और बिखरी विपक्षी बारात !
मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची के मुद्दे पर विपक्ष की साझा मुहिम में दिखे मतभेद !
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर को रुकवाने के लिए विपक्ष ने साझा आंदोलन का खाका तो खींचा था, लेकिन तीन दिन में ही सुर अलग-अलग सुनाई देने लगे हैं. दिल्ली के जंतर-मंतर पर वामपंथी दल और 'आप' एक साथ दिखे, तो एनएसयूआई के छात्र नेता अलग रास्ता नापते हुए इंडिया गेट पहुंच गए. अलबत्ता मुंबई में उद्धव ठाकरे अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की मनसे के साथ मंच साझा करते नजर आए. सचमुच निर्वाचन सदन के घेराव से पहले ही हर खेमा अपनी अलग ढपली और अपना अलग राग बजा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे साझा मंच की आंतरिक खींचतान और अविश्वास की छाया के रूप में देख रहे हैं. सत्ता पक्ष इस पर चुटकी लेते हुए कह रहा है कि जो दल एक सड़क पर साथ नहीं चल सकते, वे विकल्प क्या देंगे. यक्ष प्रश्न यही है कि क्या छह अक्टूबर के प्रस्तावित घेराव में पूरा विपक्षी कुनबा एक फ्रेम में मुस्कुराता दिखेगा या बिखराव ही सुर्खियां बटोरेगा !
3.बुआ का बदला मूड और भतीजे की ताजपोशी !
आकाश आनंद की बसपा में वापसी..'मायावी' फैसलों का दौर एक बार फिर चर्चा में !
उत्तर प्रदेश की सियासत में 'मायावी' फैसलों का दौर एक बार फिर चर्चा में है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने पुराने सख्त फैसले को पलटते हुए भतीजे आकाश आनंद को दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त कर दिया है. कुछ अरसा पहले परिपक्वता की कमी का हवाला देकर जिन्हें किनारे किया गया था, उनकी वापसी ने लखनऊ से दिल्ली तक हलचल मचा दी है. अलबत्ता बसपा समर्थकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कैडर और युवा समर्थकों में नई ऊर्जा भरने के लिए यह जरूरी कदम था. सचमुच राजनीति में दरवाजे कभी हमेशा के लिए बंद नहीं होते, खासकर जब बात अपने ही कुनबे की हो. राजनीतिक प्रेक्षक इसे दलित-युवा वोटों को एकजुट रखने और संगठन में दूसरी कतार तैयार करने की रणनीति मान रहे हैं. यक्ष प्रश्न यही है कि क्या आकाश आनंद इस नई पारी में पार्टी को पुरानी चुनावी चमक वापस दिला पाएंगे या यह भी एक अल्पकालिक प्रयोग साबित होगा !
4.शैलजा की चिट्ठी, हरदा की पदयात्रा और दिल्ली का दरबार !
हरीश रावत की जनसंवाद यात्रा पर कुमारी शैलजा की आपत्ति के बाद दिल्ली में केसी वेणुगोपाल से मैराथन बैठक !
उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का पारा जसपुर से हल्द्वानी तक चढ़ चुका है. प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की 'धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा' को संगठन से अलग बताते हुए पत्र लिखकर रोकने को कहा. अलबत्ता, 'हरदा' ने यात्रा जारी रखते हुए सीधे दिल्ली पहुंचकर संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और प्रियंका गांधी से देर शाम मुलाकात कर ली. समर्थकों का दावा है कि हाईकमान से हरी झंडी मिल चुकी है, जबकि संगठन का खेमा इसे समानांतर राजनीति मान रहा है. सचमुच, कांग्रेस की राजनीति में यात्राएं जितनी जनता से जुड़ने के लिए होती हैं, उतनी ही अपने ही सूबे के विरोधियों को कद दिखाने के लिए भी. राजनीतिक प्रेक्षक इसे उत्तराखंड के आगामी चुनावी चक्रव्यूह से पहले वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं. यक्ष प्रश्न यही है कि क्या दिल्ली दरबार की इस सुलह-सफाई के बाद देवभूमि कांग्रेस का अंदरूनी पेच सुलझेगा या और उलझेगा ?
5.कुर्सियों का 'री-शफल' और शपथ ग्रहण की घबराहट !
विशेष सत्र के फौरन बाद इसी महीने मोदी मंत्रिपरिषद में बड़े फेरबदल की संभावना ?
रायसीना हिल्स से लेकर लुटियंस जोन तक मंत्रियों और सांसदों के दिल की धड़कनें अचानक तेज हो गई हैं. सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि विशेष संसद सत्र के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी मंत्रिपरिषद में बड़ा फेरबदल और विस्तार कर सकते हैं. कई मंत्रियों के पर कतरे जाने और संगठन से कुछ कद्दावर व नए चेहरों को लालबत्ती मिलने की अटकलें जोरों पर हैं. अलबत्ता सरकार की तरफ से इसे केवल प्रशासनिक दक्षता और चुनावी राज्यों के सामाजिक प्रतिनिधित्व को दुरुस्त करने की नियमित कवायद बताया जा रहा है. सचमुच जब भी कैबिनेट फेरबदल की हवा चलती है, दिल्ली के बंगलों में बधाई देने और पैरवी करने वालों की आवाजाही चुपके-चुपके बढ़ जाती है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे 2027 के आगामी विधानसभा चुनावों और नए क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की अंतिम बड़ी बिसात मान रहे हैं. यक्ष प्रश्न यह बना हुआ है कि किस-किस मंत्री की परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड उन्हें कुर्सी पर बनाए रखेगी और किसे संगठन का रास्ता नापना पड़ेगा !
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