Political Popcorn में इस बार सियासत के गलियारों से निकलीं पांच ऐसी चर्चाएं हैं, जिनमें कहीं चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों की रणनीति और सियासी टकराव नजर आ रहा है, तो कहीं राज्यसभा टिकट को लेकर कांग्रेस-सपा के बीच कथित अंदरूनी खींचतान सुर्खियों में है. कांग्रेस की CWC बैठक में बिहार के एक चर्चित नेता की संभावित वापसी को लेकर चली सियासी कवायद और उस पर पार्टी के भीतर सामने आए मतभेद भी चर्चा का विषय हैं. वहीं लखनऊ में राज्यसभा नामांकन के दौरान एक गुलदस्ते ने सपा की ‘शेयरिंग’ सियासत पर चुटकी लेने का मौका दे दिया.
उधर, दिल्ली के सत्ता गलियारों से एक बीजेपी शासित राज्य में केंद्र में प्रतिनियुक्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को मुख्य सचिव की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं. यानी आज Political Popcorn में चुनावी रणनीति से लेकर टिकट की सियासत, संगठन के अंदरूनी समीकरण, दिलचस्प राजनीतिक किस्से और नौकरशाही के संभावित फेरबदल तक, सियासत के कई रंग पढ़ने को मिलेंगे.
1. जब हार का ठीकरा आयोग के सिर पर सजे!
हर चुनावी शिकस्त के बाद संस्थाओं पर अंगुली उठाना पुरानी आदत?
देश की विपक्षी पार्टियों ने रणनीति बनाते हुए चुनाव आयोग की मतदाता सूची SIR प्रक्रिया के खिलाफ मोर्चा खोलने की पूरी तैयारी कर ली है. अलबत्ता विपक्ष इसे लोकतंत्र की संजीवनी बता रहा है लेकिन सत्ता पक्ष का सीधा पलटवार है कि हर चुनावी शिकस्त के बाद संस्थाओं पर उंगली उठाना पुरानी आदत है. सचमुच जब 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसद आयोग के दरवाजे दस्तक देंगे तब यह यक्ष प्रश्न फिर तैरेगा कि सड़कों का यह शोर पोलिंग बूथ तक कितने वोटों में तब्दील हो पाएगा. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि यह आंदोलन एकता दिखाने का दांव कम और शक्ति-प्रदर्शन की कवायद ज्यादा है !
2. हरी झंडी अपनी, ट्रेन छूटी तो बोले-ड्राइवर कौन था?
राज्यसभा टिकट पर जयपुर के मेरियट होटल की गुप्त बैठक बनी चर्चा!
गुलाबी नगरी जयपुर का होटल मेरियट इन दिनों राष्ट्रीय सियासत के सबसे बड़े गॉसिप का केंद्र बन गया है. चर्चा है कि कांग्रेस के एक बेहद ‘ताकतवर’ महासचिव और एक सांसद महोदय की मौजूदगी में परिमल नथवानी के सुपुत्र धनराज नथवानी की उम्मीदवारी पर लंबी मंत्रणा हुई. सपा ने पहले कांग्रेस की सहमति का पेंच फंसाया, तो सांसद जी ने सीधे डिंपल यादव से महासचिव साहब की बात कराकर 'ऑल क्लियर' का सिग्नल दिलवा दिया. अलबत्ता असली रायता तब फैला जब दिल्ली में अखिलेश यादव की सीधी बात राहुल गांधी से हुई और शीर्ष नेतृत्व ने अनभिज्ञता जताते हुए माथा पकड़ लिया. अब अखिलेश जी ने भी मुस्कुराते हुए कह दिया कि ‘तीर कमान से छूट चुका है’ और यह दास्तान कांग्रेस के एक ‘सुप्रीम’ वकील साहब तक भी पहुंचा दी. सचमुच जब संगठन के भीतर ही एक हाथ को पता न हो कि दूसरा हाथ क्या दस्तखत कर रहा है, तो निष्ठा पर सवाल उठना लाजिमी है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि बंद कमरों के सौदे जब खुले चौराहों पर आते हैं, तो ऐसी ही फजीहत होती है. अब पार्टी के भीतर यह यक्ष प्रश्न सुलग रहा है कि महासचिव साहब की यह 'वीटो पावर' अपनी थी या किसी अदृश्य शक्ति की?
3. 'चाचा' की वापसी का सपना और 'राजा साहब' की गुगली !
CWC में राजा साहब का सियासी दांव.. 'ताकतवर' महासचिव बैकफुट पर!
देश की सबसे पुरानी पार्टी की शीर्ष कार्यसमिति की बैठक में पिछले दिनों जो कुछ घटा, उसकी इनसाइड स्टोरी अब छन-छन कर बाहर आ रही है. संगठन के वही 'ताकतवर' महासचिव पर्दे के पीछे से बिहार के सबसे चर्चित राजनेता की विपक्षी खेमे में घर-वापसी की जमीन तैयार करने में जुटे थे. अलबत्ता, मध्य प्रदेश के एक बेहद कद्दावर नेता को इस गुप्त खिचड़ी की भनक पहले ही लग गई और उन्होंने भरी बैठक में जानबूझकर राग छेड़ दिया. दांव ऐसा सटीक बैठा कि पूर्व पार्टी अध्यक्ष ने बिना लाग-लपेट दो टूक कह दिया-"शुक्र है वो सही समय पर चले गए!" वर्तमान पार्टी अध्यक्ष ने भी तुरंत इस रुख पर मुहर लगा दी और महासचिव साहब का सारा होमवर्क धरा का धरा रह गया. सचमुच, सियासत में टाइमिंग ही सब कुछ होती है और 'राजा साहब' ने साबित कर दिया कि शतरंज के मोहरे कैसे उलटे जाते हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि इस एक झटके से पाटलिपुत्र के उस अनुभवी सिपहसालार के लिए दिल्ली के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए. अब संगठन के गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि बार-बार गच्चा खाने के बाद भी कुछ खास रणनीतिकारों को बार-बार पाला बदलने वाले पुराने 'मित्रों' पर इतना बेपनाह ऐतबार क्यों हो जाता है?
4. गुलदस्ता एक, दावेदार अनेक.. सपा की 'शेयरिंग' सियासत!
मेहनत करे कोई और खुशबू लूटे कोई और!
लखनऊ विधानसभा में राज्यसभा नामांकन के दौरान समाजवाद का एक बिल्कुल नया और बेहद किफायती रूप देखने को मिला. हुआ यूं कि सपा विधायक अतुल प्रधान अपने नेता अखिलेश यादव के स्वागत के लिए एक शानदार गुलदस्ता सजाकर लाए थे. अलबत्ता पास खड़े आशु मलिक और कुछ पूर्व सांसदों के हाथ खाली थे, तो उन्होंने 'आपसी सहयोग' दिखाते हुए अतुल प्रधान के गुलदस्ते से ही एक-एक डंडी खींचकर अखिलेश जी को थमाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते पूरा बुके गंजा हो गया, जिस पर खुद अखिलेश भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए और तंज कसा-"अरे अतुल प्रधान का गुलदस्ता ही खत्म कर दिया? ऐसे बुके मत खत्म किया करो यार!" सचमुच, भारतीय राजनीति में बिना लागत के क्रेडिट लेने की यह कला अपने आप में अद्भुत मिसाल है. राजनीतिक प्रेक्षक इस नजारे को देखकर मुस्कुरा रहे हैं कि जब नेता एक बुके शेयर करने में इतनी फुर्ती दिखाते हैं तो पावर शेयरिंग में क्या गुल खिलाते होंगे. अब सपा के गलियारों में यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि अगली बार अतुल प्रधान नेताजी के स्वागत में फूल लाएंगे भी या सिर्फ हाथ जोड़कर ही काम चलाएंगे!
5. दिल्ली से टेक-ऑफ, राजधानी में लैंडिंग!
एक बीजेपी शासित राज्य को जल्द मिलेगा नया मुख्य सचिव?
देश की नौकरशाही के सबसे ताकतवर गलियारे यानी दिल्ली के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में एक दिलचस्प हलचल तेज हो गई है. चर्चा जोरों पर है कि केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक बेहद होनहार, कर्मठ और 'विश्वस्त' वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को जल्द ही एक बीजेपी शासित राज्य की कमान सौंपने की तैयारी है. अलबत्ता संबंधित राज्य के सचिवालय में पहले से जमे कई वरिष्ठ साहबान इस 'पैराशूट लैंडिंग' की आहट भर से असहज होने लगे हैं. सचमुच जब भी केंद्र से किसी सीनियर अफसर को सीधे मुख्य सचिव की कुर्सी पर बैठाया जाता है तो राज्य कैडर के कई दावेदारों की वर्षों पुरानी उम्मीदों पर पानी फिरना स्वाभाविक होता है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे सीधे-सीधे सत्ता शीर्ष की उस कार्यशैली से जोड़कर देख रहे हैं, जहां राज्य के शासन और योजनाओं की रफ्तार बढ़ाने के लिए 'परखकर भेजे गए' अफसरों पर ज्यादा भरोसा जताया जाता है. अब सचिवालय के गलियारों से लेकर पॉश क्लबों तक यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि दिल्ली से आने वाले साहब सिर्फ प्रशासनिक फाइलों की धूल झाड़ेंगे या स्थानीय समीकरणों और पुरानी लॉबी के बीच तालमेल बैठाते-बैठाते खुद ही उलझ कर रह जाएंगे?
ये भी पढ़ें: BrahMos Export: दुनियाभर में बढ़ी भारत के ब्रह्मोस की डिमांड, कौन-कौन से देश खरीद रहे यह मिसाइल?