Political Popcorn: कुर्सी के लिए खींचतान से राज्यसभा की दौड़ तक, 5 किस्सों में जानिए आज की सियासी हलचल

आज सियासत के गलियारों से ऐसे कई किस्से हैं, जहां छोटी-सी कुर्सी से लेकर बड़ी सियासी कुर्सी तक खूब उठापटक देखने को मिल रही है.

Political Popcorn catch up on todays political buzz in five stories
Political Popcorn

Political Popcorn: आज सियासत के गलियारों से ऐसे कई किस्से हैं, जहां छोटी-सी कुर्सी से लेकर बड़ी सियासी कुर्सी तक खूब उठापटक देखने को मिल रही है. कहीं बैठक में सिटिंग अरेंजमेंट ने बवाल खड़ा कर दिया, तो कहीं आखिरी वक्त पर अध्यक्ष पद का पूरा खेल पलट गया. उधर यूपी में राज्यसभा की कुर्सियों के लिए दिग्गजों की लंबी कतार लगी है. यानी दिल्ली से पंजाब और लखनऊ तक सियासत में कुर्सी का खेल जारी है.

1. दिल में जगह थी बहुत,लेकिन कमरे में एक कुर्सी कम पड़ गई!

'इंडी' गठबंधन की बैठक में सिटिंग अरेंजमेंट पर बवाल!

​दिल्ली के एक पॉश ठिकाने पर विपक्षी कुनबे को एकजुट करने के लिए बुलाई गई बैठक में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब मुख्य मंच से कुर्सियां ही नदारद मिलीं. कांग्रेस अध्यक्ष कार्यालय को दरकिनार कर दो 'ताकतवर' महासचिवों ने इवेंट मैनेजमेंट की कमान अपने हाथ में ली थी, लेकिन आलम यह रहा कि राहुल गांधी के ही एक बेहद खास और वरिष्ठ सहयोगी दल के नेता के लिए बैठने की जगह तक नहीं रखी गई. अलबत्ता जब वह कद्दावर नेता अपना सा मुंह बनाकर उल्टे पांव लौटने लगे तो खुद राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला और आनन-फानन में उन्हें अपने बगल में बैठाकर पानी पिलाया. सचमुच जब मंच से विदाई हुई तो पूर्व पार्टी सुप्रीमो ने दोनों महासचिवों को तलब कर ऐसा खरी-खोटी सुनाई कि आगे के तमाम आयोजनों से उनकी 'इवेंट मैनेजमेंट' की दुकान बंद करने के साफ संकेत दे दिए गए. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि जो सिपहसालार चंद कुर्सियों का संतुलन नहीं साध पा रहे, वो राष्ट्रीय स्तर पर सीटों का बंटवारा कैसे संभालेंगे? अब पार्टी गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि यह सिर्फ अव्यवस्था थी या जानबूझकर की गई कोई अंदरूनी साजिश?

2. पंजाब की 'हॉकी' सियासत!

दिल्ली के युवा तुर्क की पैरवी धरी रह गई, मैदान मार ले गए पूर्व कप्तान!

​पंजाब कांग्रेस के नए मुखिया की ताजपोशी के पीछे का सियासी ड्रामा किसी थ्रिलर से कम नहीं रहा. हरियाणा के एक बेहद रसूखदार युवा नेता ने दिल्ली दरबार में अपनी पूरी ताकत झोंककर सिंगला का नाम लगभग तय करवा ही लिया था. अलबत्ता, पूर्व अध्यक्ष राजा वड़िंग की ऐन मौके पर हुई एंट्री ने पूरा खेल ही पलट दिया. वड़िंग ने आलाकमान की मेज पर सूबे का खालिस जट्ट सिख चुनावी गणित और सिंगला साहब की कुछ 'पुरानी फाइलों' का कच्चा-चिट्ठा रख दिया. सचमुच जब हकीकत सामने आई तो आलाकमान ने पैरवीकार नेताजी से जवाब तलब कर लिया, जहां से सिर्फ सन्नाटा मिला और सिंगला का पत्ता साफ होकर पूर्व हॉकी कप्तान परगट सिंह के नाम पर अंतिम मुहर लग गई. राजनीतिक प्रेक्षक इसे दिल्ली लॉबी की सूबे की जमीनी हकीकत पर बड़ी हार मान रहे हैं. अब गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि हॉकी टर्फ पर ड्रिबलिंग करने वाले परगट सिंह क्या पंजाब कांग्रेस के अंदरूनी फांसों और गुटबाजी की गेंद को गोल पोस्ट तक पहुंचा पाएंगे?

3. घर में गूंजी किलकारी, इधर कुर्सी पर बैठ गए खिलाड़ी!

हेडलाइन: पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष परगट सिंह का दिलचस्प संयोग!

​पंजाब कांग्रेस की कमान संभालते ही पूर्व ओलंपियन परगट सिंह के सियासी सफर का एक बेहद रोचक और रूमानी किस्सा चर्चा के केंद्र में आ गया है. इसे महज इत्तेफाक कहें या कुदरत का तोहफा, लेकिन जब उनके पहले पोते 'तेग' का जन्म हुआ था, तब वह पहली बार विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे थे. अलबत्ता, अब जब घर के आंगन में दूसरे पोते के आने की खुशियां मनाई जा रही थीं, ठीक उसी वक्त दिल्ली दरबार ने उन्हें पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया 'सुपर बॉस' घोषित कर दिया. सचमुच सियासत में मेहनत अपनी जगह है,लेकिन ऐसी 'किस्मत की किक' विरले नेताओं को ही नसीब होती है. राजनीतिक प्रेक्षक मुस्कुराते हुए कह रहे हैं कि खेल के मैदान से विधानसभा और अब संगठन की ड्राइविंग सीट तक का सफर बेहद अनूठा रहा है. अब पंजाब के सियासी अखाड़े में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या पोते के भाग्य से मिली यह कमान 2027 के महामुकाबले में कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगा पाएगी?

4. पहाड़ तराश कर टीला बनाया,लेकिन नया ढेर कहां से आया?

'जीरो माउंटेन' दावा बनाम ग्राउंड पर नए डंपिंग साइट्स का खतरा!

​देश की राजधानी के माथे पर लगे कूड़े के बदबूदार टीकों को मिटाने के लिए एमसीडी और दिल्ली सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. ओखला, भलस्वा और गाजीपुर में विशालकाय ट्रॉमल मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच सरकार का दावा है कि 217 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कचरा प्रोसेस कर 100 एकड़ जमीन मुक्त करा ली गई है. अलबत्ता जमीनी हकीकत यह भी बयां कर रही है कि दिल्ली में रोजाना निकलने वाला 11 से 12 हजार टन ताजा कूड़ा इस कवायद को अंतहीन दौड़ बना रहा है. सचमुच ओखला में जहां अस्पताल की सात मंजिलें अब साफ दिखने लगी हैं, वहीं दूसरी तरफ भलस्वा और रोहिणी के सनोठ जैसे इलाकों में कचरे के नए जमावड़े स्थानीय बाशिंदों की चिंता बढ़ा रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक नोट कर रहे हैं कि अर्जुन के निशाने की तरह लैंडफिल खत्म करने के वादे पहले भी कई बार हवा हो चुके हैं. अब दिल्ली की जनता के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या 2026-27 की डेडलाइन वाकई इन पहाड़ों को खत्म कर दिल्ली को खुली हवा देगी, या यह केवल कचरे को एक कोने से उठाकर दूसरे कोने में सरकाने का प्रशासनिक तमाशा बनकर रह जाएगा?

5. यूपी में उच्च सदन की जंग!

कवियों से लेकर कद्दावरों तक की कतार!

​उत्तर प्रदेश से संसद के उच्च सदन जाने के लिए भगवा खेमे में हलचल चरम पर पहुंच गई है. सपा द्वारा एक बड़े उद्योगपति के बेटे को मैदान में उतारने के बाद, सत्ताधारी दल ने भी 25 सूरमाओं का एक लंबा पैनल तैयार कर आलाकमान की मेज पर रख दिया है. अलबत्ता, सबसे ज्यादा सुर्खियां पूर्व 'आप' नेता और मशहूर कवि कुमार विश्वास के नाम को लेकर हैं, जिनका डिप्टी सीएम से करीबी तालमेल किसी से छिपा नहीं है. सचमुच सूची में स्मृति ईरानी, हरदीप पुरी से लेकर संजीव बालियान तक के नाम क्षेत्रीय, जातीय और जेंडर संतुलन साधने के लिए शामिल किए गए हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी पर पूरी निर्भरता खत्म करने के लिए जाट चेहरों और राष्ट्रीय भूमिका वाले कद्दावरों के बीच संतुलन बैठाना बेहद पेचीदा काम है. अब लखनऊ से लेकर दिल्ली के दरबार तक यही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या केंद्रीय नेतृत्व किसी 'कविराज' को संसद का मंच सौंपेगा या संगठन के पुराने वफादारों की तपस्या पर ही मुहर लगाएगा?