Yasin Malik Case: जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के पूर्व अलगाववादी नेता यासीन मलिक को 1990 में भारतीय वायुसेना के अधिकारियों और जवानों की हत्या से जुड़े मामले में बड़ा झटका लगा है. श्रीनगर के सननत नगर में हुए इस हमले में वायुसेना के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी, जिसमें कई सैनिक शहीद हुए और 22 अन्य घायल हुए थे. अब, तीन दशक से अधिक पुराने इस मामले में कोर्ट में गवाही देने आए दो महत्वपूर्ण चश्मदीदों ने मलिक को घटना स्थल पर मौजूद मुख्य हमलावर के रूप में पहचान लिया है.
जम्मू की टाडा कोर्ट में 22 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई ऐतिहासिक साबित हुई. दोनों गवाहों ने अदालत में खुलकर कहा कि फायरिंग करने वालों में सबसे आगे वही शख्स था, यासीन मलिक. एक चश्मदीद ने अदालत में मलिक की ओर देखते हुए कहा कि चेहरे में उम्र के कारण मामूली बदलाव जरूर हुए हैं, “लेकिन दाढ़ी की शैली हटा दें तो उन्हें पहचानने में बिल्कुल भी दिक्कत नहीं हुई.” दूसरी गवाही और भी प्रभावशाली थी, जिसमें बताया गया कि हमलावर समूह में मौजूद कई लोग खुलेआम हथियार लहरा रहे थे और जवानों को लक्ष्य बनाकर गोलियां चला रहे थे.
मलिक के तीन साथियों की भी पहचान हुई
गवाहों ने सिर्फ मलिक को ही नहीं, उसके साथ कथित रूप से मौजूद शौकत बख्शी, नाना जी, और जावेद मीर को भी घटना में शामिल बताया. एक गवाह ने घटना को याद करते हुए कहा कि हमले के दौरान नाना जी ने बंदूक उसकी ओर तान दी थी और गोली चलाने की स्थिति में था. इस वाक्य ने कोर्टरूम में मौजूद सभी लोगों को झकझोर दिया, क्योंकि यह बयान हमले की भयावहता का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
एयरफोर्स स्टाफर ने भी दी निर्णायक गवाही
घटना का सबसे अहम पहलू यह है कि गवाही देने वालों में एक भारतीय वायुसेना का स्टाफर भी शामिल था, जो उस समय मौके पर मौजूद था. उसकी गवाही ने मामले में नए आयाम जोड़ दिए और अभियोजन पक्ष के दावे को मजबूत आधार दिया. अब कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 29 नवंबर 2025 को करेगी, जहां गवाहों के बयानों और सबूतों पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
“न्याय में देरी, पर इनकार असंभव”
टाडा कोर्ट की कार्यवाही के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं. भाजपा के आईटी विभाग प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि इस गवाही ने तीन दशकों से लंबित न्याय प्रक्रिया को नई दिशा दी है.
उनके शब्दों में, “यह देश के वायु योद्धाओं के परिवारों के लिए बड़ी उम्मीद की किरण है. जिन लोगों ने जवानों को निशाना बनाया, उन्हें अब जवाबदेह ठहराने का रास्ता और स्पष्ट हुआ है.” उन्होंने यह भी कहा कि भले ही न्याय की प्रक्रिया लंबी रही हो, लेकिन ऐसी गवाही साबित करती है कि न्याय देर से मिले, पर उससे बचना संभव नहीं है.
तीन दशक पुराने मामले की गंभीरता
1990 का यह हमला कश्मीर में उग्रवाद के चरम दौर में हुआ था. उस समय एयरफोर्स के कर्मचारी प्रतिदिन की तरह अपने परिवहन वाहन में थे, जब उन पर हथियारबंद आतंकियों ने नजदीक से फायरिंग की.
यह घटना उस दौर की सबसे गंभीर आतंकी घटनाओं में से एक मानी जाती है, जिसकी जांच और ट्रायल कई कारणों से वर्षों तक अटका रहा. अब, जब कोर्ट में प्रत्यक्ष गवाहों ने मुख्य आरोपी की पहचान कर ली है, मामले का रुख तेजी से बदलने की संभावना है.
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