पाकिस्तान को मिला तुर्की का किलर ड्रोन, क्या भारत के एयर डिफेंस को भेद पाएगा Baykar K2? जानें ताकत

पाकिस्तान ने तुर्की के Baykar K2 लंबी दूरी वाले कामिकेज UAV को अपने ड्रोन बेड़े में शामिल किया है. इसकी रेंज करीब 2,000 किलोमीटर बताई जा रही है.

Turkish Baykar K2 drone acquired by Pakistan Indias air defense Capabilities
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

इस्लामाबाद: पाकिस्तान ने तुर्की के Baykar K2 लंबी दूरी वाले कामिकेज UAV को अपने ड्रोन बेड़े में शामिल किया है. इसकी रेंज करीब 2,000 किलोमीटर बताई जा रही है. इतनी दूरी की वजह से यह भारत के दिल्ली, मुंबई, गुजरात और राजस्थान के अलावा पहाड़ी इलाकों तक पहुंच सकता है. ईरान के पारंपरिक Shahed टाइप वन-वे अटैक ड्रोन के मुकाबले K2 ज्यादा भारी वॉरहेड ले जाने में सक्षम बताया जा रहा है. इसमें ऑटोनॉमस नेविगेशन और स्वार्म फंक्शन जैसी क्षमताएं भी हैं. इससे दक्षिण एशिया में लंबी दूरी के ड्रोन हमलों की रणनीति में बदलाव आ सकता है.

पाकिस्तान के इस ड्रोन खरीदने के पीछे यूक्रेन की रणनीति को भी एक वजह माना जा रहा है. यूक्रेन ने लंबी दूरी तक हमला करने वाले UAV का इस्तेमाल रूस के खिलाफ किया है. इसी तरह शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के खिलाफ भी हुआ है. ऐसे में भारत के लिए भी इस तरह के ड्रोन संभावित चुनौती बन सकते हैं.

पाकिस्तान के नए Baykar K2 से कितना खतरा?

पाकिस्तान ने इन ड्रोन के लिए किस तरह की ऑपरेशनल तैयारी की है, यह अभी साफ नहीं है. हालांकि, सीमित संख्या में K2 को शामिल करने से भी पाकिस्तान की ड्रोन क्षमता केवल निगरानी और छोटे हमलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लंबी दूरी के हमलों तक बढ़ सकती है.

इस ड्रोन के जरिए पाकिस्तान बिना मानव-संचालित लड़ाकू विमान को जोखिम में डाले एयरबेस, कमांड सेंटर, लॉजिस्टिक्स हब, रडार और दूसरे अहम ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है.

लंबी दूरी वाले कामिकेज UAV को बैलिस्टिक मिसाइलों के मुकाबले एक अलग विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है. इससे तुरंत तनाव बढ़ने का जोखिम कम रखते हुए लंबी दूरी पर हमला करने की क्षमता मिल सकती है.

पाकिस्तान के लिए K2 तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है, जब इसे उसके मौजूदा अनमैन्ड एयरक्राफ्ट बेड़े जैसे Bayraktar TB2 और AKINCI के साथ इस्तेमाल किया जाए. इससे निगरानी, टारगेट की पहचान, कम्युनिकेशन और हमले के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है.

क्या भारत के रडार को चकमा दे पाएगा Baykar K2?

भारत के सामने बड़ी चुनौती कम ऊंचाई और धीमी गति से उड़ने वाले ऐसे लक्ष्यों को बड़े इलाके में समय रहते पकड़ने की होगी. इसके लिए फाइटर जेट, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, गन सिस्टम, कम दूरी की मिसाइल और एयरबोर्न अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम को साथ इस्तेमाल करने की जरूरत होगी.

भारत पहले से मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क तैयार कर चुका है. आने वाले किसी भी संघर्ष में इस नेटवर्क की क्षमता की परीक्षा हो सकती है.

भारत के लिए पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी अहम है. पाकिस्तान के पास रणनीतिक गहराई सीमित है. दिए गए आकलन के मुताबिक, अगर शुरुआती लड़ाई में उसके एयरबेस और ड्रोन कमांड सेंटर को नुकसान पहुंचता है, तो ड्रोन लॉन्च करने की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण इसी संदर्भ में दिया जाता है.

तुर्की के साथ मिलकर क्षमता बढ़ा रहा पाकिस्तान

तुर्की के सहयोग से पाकिस्तान धीरे-धीरे बिना पायलट वाले युद्ध के लिए एक बड़ा ढांचा तैयार कर रहा है. इसमें चीन के प्लेटफॉर्म और सेंसर के साथ तुर्की की UAV तकनीक और पाकिस्तान में विकसित एयरोस्पेस तकनीक को जोड़ने की कोशिश है.

इससे पाकिस्तान की किसी एक विदेशी सप्लायर पर निर्भरता कम हो सकती है. साथ ही भविष्य में अपनी सैन्य तकनीक को आधुनिक बनाने के लिए उसे नए विकल्प मिल सकते हैं.

इसलिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ K2 की 2,000 किलोमीटर की रेंज नहीं है. असली चुनौती यह होगी कि क्या पाकिस्तान पर्याप्त संख्या में ड्रोन, मजबूत लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर टारगेटिंग नेटवर्क और आपसी तालमेल तैयार कर पाता है. अगर ऐसा होता है, तभी इतनी लंबी रेंज को लंबे समय तक इस्तेमाल की जा सकने वाली ऑपरेशनल क्षमता में बदला जा सकेगा.

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