सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें आयोग ने एक नागरिक समाज समूह को राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता समूह के अनुरोध पर 48 घंटों के भीतर पुनर्विचार करे.
CJI सूर्य कांत की बेंच ने अपने आदेश दिया था कि राजस्थान राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ताओं के उस अनुरोध पर पुनर्विचार करे, जिसमें उन्होंने आवेदन के साथ संलग्न सूची के अनुसार मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति मांगी है. उन्हें 48 घंटों के भीतर फैसला लेने दें. उनका पिछला आदेश रद्द किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि राज्य चुनाव आयोग अन्य संगठनों को मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चलाने से केवल इसलिए नहीं रोक सकता क्योंकि वह खुद भी ऐसी ही गतिविधियां आयोजित कर रहा है. हर किसी को मतदाता जागरूकता अभियान चलाने का अधिकार है.आपको इसका स्वागत करना चाहिए.
चार चरणों में हो रहे हैं पंचायती राज चुनाव
राजस्थान में अभी चार चरणों में पंचायती राज चुनाव हो रहे हैं. अंतिम चरण में 14 नवंबर को जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान होगा, जबकि सरपंच और पंच पदों के लिए चुनाव 16 नवंबर को होंगे. इन चुनावों में 41 जिला परिषदें, 457 पंचायत समितियां और 14,403 ग्राम पंचायतें शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने दायर की थी, जिनकी ओर से वकील प्रशांत भूषण पेश हुए. इसमें राजस्थान राज्य चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था.
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2004 से चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य मतदाताओं को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में जागरूक करना है. इसमें 'इनमें से कोई नहीं' (NOTA) चुनने का विकल्प भी शामिल है. साथ ही, इसका मकसद मतदाताओं को वोट के बदले पैसे या अन्य प्रलोभन लेने से रोकना भी है. उन्होंने कहा कि यह अभियान किसी उम्मीदवार का समर्थन या विरोध नहीं करता है, बल्कि इसमें छोटे समूह गांवों में जाकर लोगों के साथ बातचीत वाले सत्र (इंटरैक्टिव सेशन) आयोजित करते हैं. राज्य चुनाव आयोग ने इस अनुरोध का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने इस प्रस्ताव की जांच की है और उन्हें लगता है कि यह प्रस्तावित अभियान किसी और के इशारे पर चलाया जा रहा हो सकता है. आयोग ने यह भी कहा कि वे पहले से ही अपने स्तर पर मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं. जस्टिस बागची ने अनुमति न देने के इस तर्क को खारिज कर दिया.