भारत 24 के खास कार्यक्रम 'प्रवासी राजस्थान SUMMIT' में केंद्रीय केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री Arjun Ram Meghwal ने शिरकत की. मेघवाल ने संसद के मानसून सत्र में हुए हंगामे, न्यायपालिका में जजों की संख्या बढ़ाने, महिलाओं की भागीदारी, पेपर लीक और वंदे मातरम को लेकर उठे विवाद समेत कई मुद्दों पर खुलकर बात की. वहीं, राजस्थानियों की मेहनत, अपनी पारंपरिक वेशभूषा और राजस्थान के पसंदीदा व्यंजनों को लेकर भी उन्होंने दिलचस्प बातें साझा कीं.
सवाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं पर भी जाते हैं, देश से लेकर विदेश तक, वहां राजस्थानियों का जमावड़ा रहता है. पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण भारत, दुबई और मुंबई तक बड़ी संख्या में राजस्थानी नजर आते हैं. भारत के निर्माण में राजस्थान के लोगों के योगदान को आप कैसे देखते हैं?
अर्जुन राम मेघवाल का जवाब- आपने ठीक कहा कि राजस्थानी समाज के लोग देश और दुनिया के हर कोने में मिलेंगे. बड़े शहरों में तो मेजर इकोनॉमी का वह हिस्सेदार भी हैं. हमारे मंगल प्रभात लोढ़ा जी बैठे हैं. ये भी राजस्थानी हैं और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं. लेकिन मुंबई की जो इकोनॉमी है, उसके संचालन में भी इनका बड़ा योगदान है.
तो इस तरह के बहुत लोग हैं. हमारे धर्म कुलरिया जी बैठे हैं यहां. अब इंटीरियर डिजाइन का अगर सऊदी अरब में भी कोई काम होगा ना, तो बोला इनको ही बुलाओ. तो यह जो नाम कमाया है, वह राजस्थान के लोगों ने अपने हुनर से तो कमाई ही है, लेकिन राजस्थान के लोग परिश्रमी बहुत होते हैं.
परिश्रम एक बड़ा... अब जैसे आपके 'जेसी' बॉस हैं, इनको क्या मानते हो आप? इनका जन्म बीकानेर में हुआ. इनको राजस्थानी नहीं मानते? रहने वाले रायसी नगर के हैं, श्रीगंगानगर जिले के. तो इनका परिश्रम आपको कैसा लगता है? ऐसा ही परिश्रम हर राजस्थानी जब करता है तो वह एक्सीलेंट बन जाता है.
चाहे वह संगीत के क्षेत्र में हो, चाहे वह पत्रकारिता के क्षेत्र में हो, चाहे वो उद्योग के क्षेत्र में हो, चाहे वो सेवा के क्षेत्र में हो, चाहे वो ट्रेड के क्षेत्र में हो, चाहे वो समाज सेवा के क्षेत्र में हो, चाहे राजनीति के क्षेत्र में हो.
सवाल: राजनीति के क्षेत्र में आपका योगदान है, लेकिन राजनीति में रहते हुए मेघवाल जी, आपका पहनावा, आपकी ये पगड़ी राजस्थान की झलक देती है. आप कहीं पर भी हों, ऐसा लगता है कि आप राजस्थान से दिल्ली में रहते हुए भी उस कल्चर को अपने साथ, अपने सर का ताज बनाकर चलते हैं. आप प्रेरणा देते हैं बाकी सब लोगों को कि अपने कल्चर को, अपनी सभ्यता को अपने साथ कैसे लेकर चलना है?
अर्जुन राम मेघवाल का जवाब- अभी 'जेसी' बॉस कह रहे थे ना आपको अभी यहां कि एक जनप्रतिनिधि को कनेक्ट होना चाहिए. मैं जब बीकानेर संसदीय क्षेत्र की बात करता हूं तो मेरी जैसी ड्रेस पहनने वाले गांव में बहुत लोग हैं. मैं उन्हीं का ही तो प्रतिनिधि हूं. मुझे उन्हीं की जैसी भाषा बोलनी चाहिए, उन्हीं की जैसी वेशभूषा में रहना चाहिए. तभी तो समझेंगे कि यह मेरे प्रतिनिधि हैं.
नहीं तो अगर मेरी अलग ड्रेस, उनकी अलग ड्रेस, आपकी अलग ड्रेस, तो थोड़ा गैप आ जाता है ना. उस गैप को तोड़ने के लिए मैंने यह काम किया और इसलिए मेरी ये ड्रेस हर जगह ऐसी ही रहती है. मैं अगर विदेश में भी जाता हूं, किसी कॉन्फ्रेंस में, तो मेरी यही ड्रेस रहती है.
सवाल: अब आ जाते हैं थोड़ा सा राजनीति और बाकी चर्चाओं पर. अभी-अभी संसद का मानसून सत्र खत्म हुआ और मानसून सत्र में जबरदस्त हंगामा भी देखने को मिला. उस हंगामे पर आने से पहले आपको पहले तो आभार, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेस अमेंडमेंट बिल 2026 पारित हुआ, जिसके बाद जजों की संख्या बढ़ी. लेकिन मैं यह समझना चाहती हूं कि जो जजेस की संख्या बढ़ी और 92,000 से ज्यादा पेंडिंग केसेस हैं, इस बीच का बैलेंस कैसे बनेगा?
अर्जुन राम मेघवाल का जवाब- देखिए, 28 जनवरी 1950 को हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट ने काम करना शुरू किया. 26 जनवरी 1950 को हमारे देश में संविधान लागू हुआ और ठीक दो दिन बाद 28 जनवरी को पहले जब वह बैठे सुप्रीम कोर्ट तो आठ जज थे, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के साथ आठ.
आज मुझे बताते हुए हर्ष है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सहित 38 जज हैं सुप्रीम कोर्ट में. तो यह एक बढ़ते हुए भारत की ताकत है. जब 38 जज हैं तो हमें कई बार टेक्निकल इश्यू आते हैं. शबरीमाला का केस है तो उसको नौ जजों की बेंच को सुनना चाहिए, तो वो उसमें बिजी हो जाते हैं.
अब दो जजों की बेंच ने कोई फैसला दिया और लगता है कि इसमें कोई कॉन्स्टिट्यूशनल मैटर इनवॉल्व है तो परमानेंट एक कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच होनी चाहिए. यह जो संख्या बढ़ी है, यह इस तरह के काम करेगी ताकि मामले पेंडिंग नहीं रहेंगे.
और कई बार तीन जजों की बेंच भी डेजिग्नेटेड अगर कर दी जाती है तो दो जजों के जो फैसला है, वह उधर अपील में आ जाता है. अगर उनको लगता है कि हमें अपील करनी है तो ये कई तरह से ऐसे कारण थे. और जैसे आपने बताया कि मामले जो पेंडिंग हैं, वो 92 हजार के आसपास हैं. निश्चित रूप से उसमें कमी आएगी. कमी आने के दो कारण और भी रहेंगे. एक तो एडीआर को हमने बहुत तेजी से अपनाया है. एडीआर का मतलब है अल्टरनेट डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन मैकेनिज्म, जिसमें हमारा मीडिएशन आ गया, आर्बिट्रेशन आ गया, कंसिलिएशन आ गया. इसको तेजी से अपनाया है.
दूसरा बड़ा कारण है कि हमने टेक्नोलॉजी को भी तेजी से अपनाया है. टेक्नोलॉजी ड्रिवन सिस्टम होने से जल्दी चीजों को समझने में भी आसानी होती है और निर्णय तक पहुंचने में भी बहुत सरलता रहती है. तो मुझे ऐसा लगता है कि आने वाले समय में आपने ठीक सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट में जो जजों की संख्या बढ़ी है, उससे जो पेंडिंग मामले हैं, उनमें कमी आएगी.
एक दूसरा मानसून सत्र में एक बहुत बड़ा हमने सुधार किया. वह भी मैं आपके माध्यम से दर्शकों की जानकारी में लाता हूं. वो है द ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म बिल 2026. हमारे देश में जितने भी ट्रिब्यूनल हैं, अब जैसे बैंक ने सपोज करो एनपीए गलत घोषित कर दिया. कहां जाएगा? डीआरटी में, डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल. अब उसने भी कोई फैसला सही नहीं दिया तो कहां जाएगा? डीआरटी.
अगर कोई पीएमएलए का केस है तो वह भी ट्रिब्यूनल में जाएगा. अगर कोई जीएसटी का मामला है तो वह भी ट्रिब्यूनल में जाएगा. ये लोढ़ा साहब बैठे हैं, ये ट्रिब्यूनल के बड़े जानकार हैं.
तो ये पहली बार ट्रिब्यूनल रिफॉर्म बिल आया और उसके सिलेक्शन प्रोसेस में एक नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन बनाने की बात आई. यह सबसे बड़ा सुधार है ट्रिब्यूनल के क्षेत्र में.
सवाल: न्यायपालिका में आपने हमेशा से महिलाओं की भागीदारी और प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि वुमेन रिप्रेजेंटेशन बढ़ना चाहिए. अब न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी अगर मैं बात करूं तो सुप्रीम कोर्ट में 33 में से एक जज और हाई कोर्ट में लगभग 14% के आसपास हैं, तो इस नंबर को और ज्यादा हम बढ़ाएं, इसके लिए कैसी कोशिशें होंगी?
अर्जुन राम मेघवाल का जवाब- निश्चित रूप से देखिए, लोकसभा और राज्यसभा में भी ऐसे कुछ सवाल आए और जब मैं सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल की चर्चा कर रहा था, तब भी यह विषय आया.
देखिए, महिलाओं की संख्या बढ़नी चाहिए. इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन आप जानते ही हैं कि कॉलेजियम सिस्टम के द्वारा नाम जो हैं, प्रस्तावित होते हैं. हाई कोर्ट प्रस्तावित करता है. फिर हाई कोर्ट में जज बनते हैं. फिर सीनियरिटी होती है. फिर सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम होता है. सरकार भी कंसल्टेशन प्रोसेस में रहती है.
इसमें कोई शक नहीं है. आप देखिए थोड़े दिनों पहले तक हमारे देश में चार ऐसे हाई कोर्ट, जिसमें महिलाएं चीफ जस्टिस... एक अभी रिटायर हुए तो तीन तो अभी भी हैं. दो सुप्रीम कोर्ट में हैं. लेकिन संख्या बढ़नी चाहिए, ये बात आपकी सही है.
और मैं आपको बताता हूं कि और हर्ष भी हो रहा है कि जो डिस्ट्रिक्ट जुडिशरी में जो एंट्री लेवल पे जो जज बन रहे हैं, जूनियर जज, उसमें सिलेक्शन जो है वो 50% से ज्यादा महिलाओं का होने लग गया. हम कई जगह गए हैं, जिसमें लोग कहते हैं कि ये तो 72% महिला यहां की वो एग्जामिनेशन से आती है. लेकिन ये अच्छी, अच्छी, अच्छी बात है ना. और वही आगे चलकर के फिर हाई कोर्ट में पहुंचेंगे.
सवाल- अब आ जाते हैं जरा मानसून सत्र पर. मानसून सत्र में मेघवाल जी इतना हंगामा क्यों हुआ? आप लोग कहते रहे कि विपक्ष सदन नहीं चलने देना चाहता. तो विपक्ष ये कहता रहा कि क्या सदन को चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ विपक्ष की होनी चाहिए और सरकार बिना चर्चा के बिल पारित करती है? तो यह समन्वय क्यों नहीं बन पा रहा आखिर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में?
अर्जुन राम मेघवाल का जवाब- देखिए, इसमें क्या है? जब सत्र शुरू होता है तो एक दिन पहले एक मीटिंग होती है. ऑल पार्टी के जो फ्लोर लीडर हैं, वो आते हैं. हमने उनसे पूछा जब 20 जुलाई को सत्र शुरू हुआ, 19 तारीख को बैठक थी जुलाई को. हमने उनको पूछा, भाई आपका सबसे बड़ा मुद्दा कौन सा है?
तो उन्होंने कहा पेपर लीक. आप पेपर लीक पर चर्चा शुरू करा दीजिए, हम उसको चलने देंगे. उनकी तरफ से प्रस्ताव था, विपक्ष की तरफ से. लेकिन दो दिन तो हम नहीं चलने देंगे. चलो दो दिन हमने वेट किया. फिर हमें इसका कड़ा कानून भी लाए. चर्चा भी हुई, लोकसभा में भी हुई, राज्यसभा में हुई.
जैसे ही चर्चा पूरी हुई तो दूसरा मुद्दा ले आए कि इस पर चर्चा करो, नहीं तो हम हाउस नहीं चलने देंगे. तो यह तो हठधर्मिता थी ना विपक्ष की. यह तो हठधर्मिता... वह गोल पोस्ट बदलते रहे.
और उनके मन में आजकल राहुल गांधी जी के मन में अहंकार बहुत आ गया कि मैं जो बोल रहा हूं वही सही है. स्पीकर साहब कहने लगे, भाई आप यहां संसद में बोल रहे हो. तो संसद में तो नियमों से ही बोलना पड़ेगा. जो लोकसभा ने नियम बनाए, कभी हमने तो बनाए नहीं. वो पहले के ही बने हुए हैं.
उन्होंने कहा नहीं-नहीं, मैं नियमों से, मैं जो बोलूंगा मैं बोलूंगा. उन्होंने कहा नहीं, ऐसा नहीं है. जो सब्जेक्ट डिस्कशन में चल रहा है, उसी सब्जेक्ट पर आपको बात करनी पड़ेगी. आप सब्जेक्ट से बाहर जा रहे हैं. तो हंगामा क्यों हुआ? और वो हंगामा लगातार चलता रहा.
तो हमें तो लेजिस्लेटिव बिजनेस तो करना ही पड़ता है. और उनके जमाने में क्या हंगामे में बिल पास नहीं हुए? अब ये सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला ऑर्डिनेंस था. संविधान में लिखा हुआ है कि इस अवधि तक आपको उसको बिल को पास करना पड़ेगा. तो संविधान में जो दायित्व दिया वर्तमान सरकार को, वो काम हमने पूरा किया, बिलों को पास करके.
लेकिन राहुल गांधी तो हाथ में संविधान की प्रति लेकर चलते हैं. लिखा क्या है? वो पढ़ते नहीं हैं. अब बताओ, ऑर्डिनेंस है. उसको तो बिल पास करना ही पड़ता है ना. लिखा हुआ है संविधान में. वो खाली अंदर क्या लिखा है, वो उसको नहीं पढ़ते.
सवाल: हम लेकिन इस बार के मानसून सत्र से सरकार भी शायद इस प्लानिंग में थी. बाकी आप बेहतर बता पाएंगे मेघवाल जी कि एक तो डीलिमिटेशन वुमेन रिजर्वेशन के साथ और दूसरा एफसीआरए. दो इंपॉर्टेंट बिल भी पास होने चाहिए. लेकिन इतना हंगामा और हंगामे के चलते दो इंपॉर्टेंट इशूज छूट गए.
अर्जुन राम मेघवाल- देखिए, अब ये आगे क्या इंटरसेशन के, देखिए दोनों के बारे में मैं बताता हूं. एफसीआरए के लिए तो उन्होंने ही कहा था कि कमेटी बनाओ, बड़ी कमेटी बनाओ. जेपीसी की डिमांड किसकी थी? विपक्ष की. जेपीसी की घोषणा हो गई और ये बिल जेपीसी में चला गया. ठीक है? वहां डिटेल में चर्चा हो जाएगी.
दूसरा विषय डीलिमिटेशन का. आप देखिए. अब यह किस तरह की बातें करते हैं, मेरे तो समझ में नहीं आता कि संविधान के अंदर ही, जो आपने पहले कहा ना कि वह संविधान की किताब हाथ में लेकर ही चलते हैं. संविधान के अंदर ही लिखा हुआ है कि 2026 तक यह सीटें फ्रीज रहेंगी. फिर डीलिमिटेशन आएगा. ये लिखा हुआ है.
अब ये कह रहे हैं, आप डीलिमिटेशन लाओ ही मत. ऐसा होता है क्या? 2023 में जब हमने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास किया था, तब उसमें दो शर्तें थीं, डीलिमिटेशन और सेंसस. उसके सुधार के लिए हम बिल लाए थे. नारी शक्ति वंदन भी महिलाओं को लोकसभा में और राज्यों की विधानसभा में 33% रिप्रेजेंटेशन मिल जाए, इसके लिए लेके आए थे. 2029 का जब चुनाव हो तो लोकसभा में 33% महिलाओं के लिए सीटें रिजर्व हो जाएं. इसके लिए लाए थे.
इसका भी इन्होंने विरोध किया. अब क्या कह रहे हैं? 543 जो सीटें हैं, उसमें दे दो रिजर्वेशन. अरे भाई, संविधान में लिखा हुआ है. आप ये चीज उनके समझ में नहीं आ रही क्या?
ये लिखा हुआ है कि 2026 के बाद डीलिमिटेशन आएगा. हम तो संविधान में जो लिखा हुआ है, उसके अनुसार ही कार्रवाई कर रहे हैं.