Rafale या SU-57E नहीं... भारतीय वायुसेना को मिल सकती है देशी राफेल, दुश्मनों के छूट जाएंगे पसीने

Rafale Fighter Jet Deal: भारतीय वायुसेना (IAF) इस समय लड़ाकू विमानों की गंभीर कमी से जूझ रही है. सेना को पूरी क्षमता से काम करने के लिए 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में उसके पास केवल 31 स्क्वाड्रन ही बचे हैं.

Not Rafale or SU-57E Indian Air Force may indigenous Rafale enemies will be left tizzy
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Rafale Fighter Jet Deal: भारतीय वायुसेना (IAF) इस समय लड़ाकू विमानों की गंभीर कमी से जूझ रही है. सेना को पूरी क्षमता से काम करने के लिए 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में उसके पास केवल 31 स्क्वाड्रन ही बचे हैं. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह कमी वायुसेना की “कॉम्बैट पावर” यानी मारक क्षमता को सीधे प्रभावित कर रही है.

हालांकि बीते कुछ वर्षों में भारत ने कई विदेशी और स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को गति देने की कोशिश की है, लेकिन फाइटर जेट्स की नई खरीद लगातार देरी का शिकार हो रही है.

सरकार को भेजा गया राफेल का नया प्रस्ताव

भारतीय वायुसेना ने हाल ही में केंद्र सरकार को 114 राफेल मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद के लिए प्रस्ताव भेजा था. यह प्रस्ताव लगभग दो लाख करोड़ रुपये का बताया जा रहा है, जो भारत के रक्षा इतिहास की सबसे बड़ी सौदों में से एक हो सकता था.

लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस वायुसेना के पास भेज दिया है, ताकि इसे और विस्तार से तैयार किया जा सके. सरकार चाहती है कि इस डील में फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन से अधिकतम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) हासिल किया जाए और विमान के अधिकांश हिस्से भारत में तैयार हों.

“समय हाथ से निकल रहा है” 

रक्षा वेबसाइट idrw.org की एक रिपोर्ट में हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि अगर भारत अब भी राफेल डील पर निर्णय नहीं लेता, तो इस सौदे की आवश्यकता और औचित्य दोनों पर सवाल उठ सकते हैं.

उन्होंने कहा, “राफेल खरीदने का सबसे उपयुक्त समय अब खत्म होता जा रहा है. आने वाले वर्षों में जब देसी लड़ाकू विमान तेजस एमके-2 और एएमसीए (AMCA) प्रोग्राम आगे बढ़ेंगे, तो राफेल की जरूरत को न्यायोचित ठहराना मुश्किल होगा.”

तेजस MK-2 और AMCA से नई उम्मीद

भारत का स्वदेशी रक्षा कार्यक्रम अब तेजी से आगे बढ़ रहा है. तेजस एमके-2, देश का 4.5 पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर जेट, इस समय विकास के अंतिम चरण में है. इसका प्रोटोटाइप 2026 तक उड़ान भरने की उम्मीद है, जबकि पहली उड़ान 2027 में निर्धारित की गई है. वर्ष 2029-30 से इसका सीरियल प्रोडक्शन शुरू होने की संभावना है.

तेजस एमके-2 में अत्याधुनिक अवियोनिक्स सिस्टम, अडवांस AESA रडार, और बेहतर वेपन इंटीग्रेशन दिया जा रहा है, जिससे यह राफेल की श्रेणी का एक आधुनिक फाइटर बन सकेगा. इससे पहले भारत ने तेजस एमके-1 का उत्पादन भी शुरू कर दिया है और जल्द ही इसकी नई खेप वायुसेना को सौंपी जाएगी.

इसके अलावा, भारत की महत्वाकांक्षी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट परियोजना AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) पर भी तेजी से काम चल रहा है. AMCA का प्रोटोटाइप 2030 तक तैयार करने का लक्ष्य है और 2035 तक वायुसेना में शामिल करने की योजना है.

राफेल डील की स्थिति

भारत ने फ्रांस से अब तक दो बार राफेल विमान खरीदे हैं:

  • पहली डील (एयरफोर्स के लिए): 36 विमानों की डिलीवरी पूरी हो चुकी है.
  • दूसरी डील (नेवी के लिए): 26 नौसेना संस्करण के राफेल एम (Rafale-M) विमानों की प्रक्रिया चल रही है.

अब तीसरी डील (114 फाइटर जेट्स) पर चर्चा जारी है, लेकिन यह कई कारणों से अटकती नजर आ रही है. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, राफेल विमान बेहद सक्षम हैं, लेकिन इनकी कीमत अत्यधिक ऊंची है, और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर डसॉल्ट और भारत के बीच सहमति बनना कठिन हो रहा है.

डील में देरी क्यों खतरनाक है

यदि आज भी भारत फ्रांस के साथ यह डील साइन करता है, तो विमान की डिलीवरी में कम से कम तीन साल का समय लगेगा. लेकिन सरकार की मंजूरी, कीमत तय करने, उत्पादन साझेदारी और लाइसेंसिंग से जुड़े मसलों को सुलझाने में ही लंबा वक्त लग सकता है.

इस बीच, तेजस एमके-2 का उत्पादन भी लगभग उसी अवधि में शुरू हो जाएगा. इसलिए जब राफेल आने लगेंगे, तब तक भारतीय विमान भी वायुसेना में शामिल हो सकते हैं. यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि “राफेल डील में देरी” इसे रणनीतिक रूप से अप्रासंगिक बना सकती है.

रूस का ऑफर: SU-57E

फ्रांस के अलावा, रूस ने भी भारत को अपनी पांचवीं पीढ़ी की फाइटर जेट तकनीक देने की पेशकश की है. रूस का दावा है कि वह भारत को SU-57E स्टील्थ फाइटर जेट बेचने के लिए तैयार है और इसके लिए वह 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की गारंटी देगा.

इस ऑफर को लेकर भारत में गहन विचार चल रहा है, क्योंकि रूस लंबे समय से भारत का विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा है. हालांकि, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ बढ़ते सहयोग को देखते हुए भारत किसी भी दिशा में जल्दबाज़ी नहीं दिखाना चाहता.

सरकार और HAL पर बढ़ा दबाव

इन सभी परिस्थितियों के बीच, सरकार अब अपनी स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और प्राइवेट सेक्टर को साझेदारी में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं.

HAL अब तेजस, सुखोई और भविष्य के AMCA प्रोग्राम के लिए निजी कंपनियों के साथ एक नया सप्लाई इकोसिस्टम तैयार कर रहा है, ताकि फाइटर जेट्स का निर्माण भारत में तेज गति से हो सके. एक बार यह प्रणाली स्थापित हो गई तो भारत अपने फाइटर विमान न केवल खुद के लिए बना सकेगा, बल्कि निर्यात भी कर सकेगा.

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