क्या है न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन? जिसे भारत ने किया सपोर्ट; जानें इजरायल या फिलिस्तीन किसे होगा फायदा

New York Declaration India: संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को भारत ने एक अहम कूटनीतिक संकेत देते हुए उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जो दशकों पुराने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को द्वि-राष्ट्र समाधान के ज़रिए हल करने की पैरवी करता है.

New York Declaration Which India supported Know who will benefit Israel or Palestine
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New York Declaration India: संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को भारत ने एक अहम कूटनीतिक संकेत देते हुए उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जो दशकों पुराने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को द्वि-राष्ट्र समाधान के ज़रिए हल करने की पैरवी करता है. यह प्रस्ताव फ्रांस द्वारा पेश किया गया था और इसे 142 देशों का समर्थन मिला. भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट देकर स्पष्ट किया कि वह फिलिस्तीन पर अपनी पारंपरिक नीति के साथ खड़ा है, यानी शांति, संवाद और दो-राज्य समाधान.

वहीं, इजरायल, अमेरिका, हंगरी और अर्जेंटीना जैसे 10 देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. 12 देश मतदान से गैरहाजिर रहे. इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों में सभी खाड़ी राष्ट्र शामिल हैं.

क्या है न्यूयॉर्क घोषणापत्र?

जुलाई 2025 में हुए उच्च स्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत 'न्यूयॉर्क घोषणापत्र' एक 7-पन्नों का दस्तावेज है, जो गाजा में युद्ध समाप्त करने, द्वि-राष्ट्र समाधान लागू करने और क्षेत्र में स्थायी शांति लाने की बात करता है. इस सम्मेलन की सह-अध्यक्षता फ्रांस और सऊदी अरब ने की थी.

घोषणापत्र में इजरायली नेतृत्व से आग्रह किया गया है कि वह एक स्वतंत्र और व्यवहारिक फिलिस्तीनी राष्ट्र को लेकर स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिबद्धता जताए. साथ ही, इजरायल से फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा, कब्जा, बस्तियों के विस्तार और भूमि हड़पने जैसी गतिविधियों को तत्काल रोकने का भी आह्वान किया गया है.

इजरायल और अमेरिका की तीखी प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताव पर इजरायल और अमेरिका ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. इजरायली विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ओरेन मार्मोरस्टीन ने प्रस्ताव को खारिज करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा को एक “राजनीतिक सर्कस” करार दिया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रस्ताव में हमास को लेकर एक शब्द तक नहीं कहा गया, जबकि वह इस पूरे संघर्ष का प्रमुख कारक है.

अमेरिका ने भी इस प्रस्ताव को “हमास को तोहफा” बताया. अमेरिकी राजनयिक मॉर्गन ऑर्टागस ने इसे राजनीतिक स्टंट करार देते हुए कहा कि यह कदम समस्या सुलझाने से ज्यादा, बयानबाज़ी जैसा है.

भारत का समर्थन, नीति और संकेत दोनों

भारत ने हाल के महीनों में कुछ विवादास्पद प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाई थी, खासकर जब उनमें सीधे तौर पर इजरायल की आलोचना की गई थी. लेकिन इस बार भारत ने दो-टूक तरीके से फिलिस्तीन पर अपनी पुरानी और संतुलित नीति को दोहराया है, यानी शांतिपूर्ण समाधान, संवाद और दो-राष्ट्र की परिकल्पना.

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी “नीतिगत संतुलन” की छवि को बनाए रखता है. एक तरफ़ भारत इजरायल से रणनीतिक और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह फिलिस्तीन के अधिकारों को लेकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है.

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले जब इजरायल ने कतर पर हमला किया था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की थी और कतर के अमीर से भी चर्चा की थी.

कूटनीति में संतुलन की कोशिश

भारत का यह कदम बताता है कि वह मानवाधिकार, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून के मुद्दों पर कोई एकतरफा रुख नहीं अपनाना चाहता. द्वि-राष्ट्र समाधान, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन, दोनों को स्वतंत्र और सुरक्षित राज्य के रूप में मान्यता मिलती है, भारत की दीर्घकालीन नीति रही है. और यह मतदान उसी नीति की पुष्टि है.

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