'भारत न देता तो हमें वैक्सीन सूंघने को भी न मिलती', क्यों कहते हैं कई देश ऐसा? IIT मद्रास में जयशंकर ने बताया

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शुक्रवार को IIT मद्रास के छात्रों के साथ संवाद करते हुए भारत की वैश्विक भूमिका, लोकतंत्र की सोच, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों और कोविड काल के अनुभवों पर खुलकर विचार रखे.

Jaishankar in iit madras address remarks on coronavirus vaccine what others think
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विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शुक्रवार को IIT मद्रास के छात्रों के साथ संवाद करते हुए भारत की वैश्विक भूमिका, लोकतंत्र की सोच, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों और कोविड काल के अनुभवों पर खुलकर विचार रखे. अपने संबोधन में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति केवल कूटनीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, साझेदारी और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी हुई है. खासतौर पर वैक्सीन कूटनीति पर उनके अनुभवों ने छात्रों को गहराई से सोचने पर मजबूर किया.


जयशंकर ने कहा कि अपने पूरे राजनयिक करियर में उन्होंने वैक्सीन वितरण जैसा भावनात्मक असर कभी नहीं देखा. उनके अनुसार, कई देशों में लोग आज भी भारत से मिली वैक्सीन की पहली खेप को याद कर भावुक हो जाते हैं. उन्होंने बताया कि कोविड महामारी के दौरान कई विकसित देशों ने अपनी आबादी से कई गुना अधिक वैक्सीन का भंडारण कर लिया था, जबकि छोटे देशों को न्यूनतम खुराक भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही थी.भारत ने ऐसे कठिन समय में 1.4 अरब लोगों की जरूरतों का ध्यान रखते हुए भी छोटे और कमजोर देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराकर एकजुटता का उदाहरण पेश किया.

“भारत नहीं देता, तो वैक्सीन की उम्मीद भी नहीं होती”

विदेश मंत्री ने कहा कि लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और पैसिफिक के द्वीपीय देशों के लोग आज भी कहते हैं कि अगर भारत आगे न आता, तो उन्हें वैक्सीन मिलना तो दूर, उसकी कल्पना भी नहीं होती. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत दुनिया के सबसे सक्षम वैक्सीन उत्पादकों में से एक है, लेकिन इस सफलता के पीछे वैश्विक सप्लाई चेन की भूमिका को भी समझना जरूरी है.उनका संदेश साफ था. देश और दुनिया को अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जा सकता. घरेलू चुनौतियों के बीच भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग उतना ही आवश्यक है.

पड़ोसी पहले: भारत की नीति का आधार

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर बोलते हुए जयशंकर ने हालिया बांग्लादेश यात्रा का जिक्र किया और बताया कि भारत ने हमेशा अपने पड़ोसियों के साथ संवेदनशील और सहयोगी रुख अपनाया है. उन्होंने कहा कि कोविड काल में भारत के अधिकांश पड़ोसियों को पहली वैक्सीन खेप यहीं से मिली.श्रीलंका के आर्थिक संकट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारत ने वहां 4 अरब डॉलर की मदद दी, जबकि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सहायता की प्रक्रिया काफी धीमी थी.

भारत की प्रगति, पूरे क्षेत्र के लिए अवसर

जयशंकर ने जोर देकर कहा कि पड़ोसी देश यह समझते हैं कि भारत की तरक्की किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए अवसर लेकर आती है. “भारत की उन्नति एक उठती हुई लहर है, जिसमें बाकी देश भी आगे बढ़ते हैं,” उन्होंने कहा. यही संदेश वह बांग्लादेश और अन्य पड़ोसियों तक लेकर जाते हैं.

प्राचीन सभ्यता से आधुनिक लोकतंत्र तक

अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने भारत की ऐतिहासिक पहचान पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि दुनिया में बहुत कम ऐसी प्राचीन सभ्यताएं हैं, जो आज भी एक आधुनिक और सशक्त राष्ट्र के रूप में मौजूद हैं और भारत उनमें से एक है.लोकतंत्र को लेकर उन्होंने कहा कि भारत ने इसे अपनाकर लोकतंत्र को एक सार्वभौमिक विचार बना दिया. अगर भारत ऐसा न करता, तो यह अवधारणा कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह जाती.

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की असली भावना

जयशंकर ने कहा कि भारत की सोच कभी दुनिया को दुश्मन मानने की नहीं रही. ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ यही है कि पूरी दुनिया एक परिवार है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी जरूरी है, लेकिन अपने मूल्यों, संस्कृति और दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना ही भारत की ताकत है.विदेश मंत्री का यह संवाद केवल नीतियों की चर्चा नहीं था, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण भी था, जिसने छात्रों को यह सोचने पर मजबूर किया कि आने वाले समय में भारत दुनिया को किस दिशा में ले जा सकता है.

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