तेल बाजार में उथल-पुथल के बीच सरकार का बड़ा फैसला, पेट्रोल-डीजल पर घटाई एक्सपोर्ट ड्यूटी

वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत सरकार ने एक अहम आर्थिक फैसला लिया है. केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर निर्यात शुल्क में संशोधन करते हुए नई दरें लागू करने की घोषणा की है.

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वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत सरकार ने एक अहम आर्थिक फैसला लिया है. केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर निर्यात शुल्क में संशोधन करते हुए नई दरें लागू करने की घोषणा की है. यह कदम ऐसे समय पर आया है जब दुनिया भर में तेल संकट की स्थिति बनी हुई है और देशों की ऊर्जा नीतियां लगातार बदल रही हैं.

1 जून से लागू होंगी नई दरें

सरकार की ओर से शनिवार (30 मई) को जारी जानकारी के अनुसार, संशोधित एक्सपोर्ट ड्यूटी 1 जून से प्रभावी होगी. नए फैसले के तहत पेट्रोल, डीजल और एटीएफ पर अलग-अलग दरें तय की गई हैं. पेट्रोल पर अब 1.5 रुपये प्रति लीटर निर्यात शुल्क लगेगा, जबकि डीजल पर यह दर 13.5 रुपये प्रति लीटर निर्धारित की गई है. वहीं एविएशन टरबाइन फ्यूल पर 9.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लागू किया गया है.

हर पखवाड़े होती है समीक्षा प्रक्रिया

सरकारी नीति के अनुसार पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाली निर्यात ड्यूटी की समीक्षा हर 15 दिनों में की जाती है. इस समीक्षा में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की औसत कीमतों को आधार बनाया जाता है. इसी आधार पर सरकार यह तय करती है कि निर्यात शुल्क में बदलाव किया जाए या नहीं. इस प्रणाली का उद्देश्य वैश्विक बाजार के अनुरूप घरेलू ऊर्जा नीति को संतुलित बनाए रखना है.

घरेलू कीमतों पर नहीं पड़ेगा असर

सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस बदलाव का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा. देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है और पहले से लागू टैक्स संरचना यथावत बनी रहेगी. निर्यात शुल्क केवल उन पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होता है जो देश से बाहर भेजे जाते हैं, इसलिए इसका असर घरेलू बाजार पर सीमित रहता है.

एक्सपोर्ट ड्यूटी की भूमिका और उद्देश्य

निर्यात शुल्क एक प्रकार का अप्रत्यक्ष कर होता है जिसे सरकार किसी वस्तु के देश से बाहर जाने पर लगाती है. इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखना और अत्यधिक निर्यात को नियंत्रित करना होता है. मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में जब कई क्षेत्रों में ऊर्जा संकट जैसी स्थिति बनी हुई है, ऐसे में यह नीति देश के भीतर ईंधन की स्थिर उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद करती है.

पिछली नीति और बदलाव का संदर्भ

पेट्रोलियम उत्पादों पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) और रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस (RIC) के रूप में निर्यात शुल्क पहली बार 27 मार्च 2026 को लागू किया गया था. उस समय सरकार ने इसे घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते दबाव को संतुलित करने के उद्देश्य से लागू किया था. बाद में 16 मई 2026 से इसमें संशोधन किया गया था और अब 1 जून 2026 से नई दरें प्रभावी होंगी.

अंतरराष्ट्रीय बाजार पर नजर बनाए रखेगी सरकार

अधिकारियों के अनुसार सरकार हर पखवाड़े अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की स्थिति की समीक्षा करती रहेगी और जरूरत के अनुसार आगे भी बदलाव किए जा सकते हैं. यह पूरी व्यवस्था लचीली नीति के तहत काम करती है, ताकि वैश्विक ऊर्जा संकट की किसी भी स्थिति में भारत अपनी आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता बनाए रख सके

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