Ethiopia Volcano Eruption: उत्तरी इथियोपिया की धरती ने रविवार को वह दृश्य दिखाया, जिसे वैज्ञानिकों ने इतिहास की किताबों में ही पढ़ा था. हेली गुब्बी ज्वालामुखी, जो लगभग 12,000 वर्षों से शांत बैठा था, अचानक अत्यंत शक्तिशाली विस्फोट के साथ फट पड़ा.
धमाके के बाद उठी राख और धुआं 100-120 किमी/घंटा की रफ्तार से हवा में बहता हुआ लाल सागर पार कर यमन, ओमान, भारत और फिर चीन की ओर बढ़ता चला गया. भारत में इसकी राख गुजरात, राजस्थान, दिल्ली के आसमान तक पहुंचकर मौसम और हवाई उड़ानों को प्रभावित कर गई.
इतनी लंबी नींद के बाद अचानक विस्फोट क्यों?
वैज्ञानिकों के लिए यह विस्फोट एक रहस्य की तरह है, क्योंकि हेली गुब्बी का होलोसीन काल में किसी सक्रियता का रिकॉर्ड ही नहीं है. इसका मतलब यह कि यह ज्वालामुखी अंतिम हिमयुग के बाद से करीब बारह हजार साल शांत था.
इतने लंबे समय बाद अचानक सक्रिय होना संकेत देता है कि धरती की गहराइयों में कोई बड़ा भू-वैज्ञानिक बदलाव हुआ है. राख का ऊँचा गुबार यह भी बताता है कि संभव है कि पिछले हजारों वर्षों में इसके छोटे विस्फोट हुए हों, जिनका कोई दस्तावेज नहीं मिला.
कहाँ स्थित है यह ‘धरती का नर्क’?
हेली गुब्बी इथियोपिया के अफार क्षेत्र में स्थित एक शील्ड ज्वालामुखी है, एर्ता अले श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा. अफार क्षेत्र को दुनिया का सबसे गर्म इलाकों में गिना जाता है, जहाँ तापमान 50°C तक पहुंच जाता है. यह वही जगह है जहाँ पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट वैली की प्लेटें लगातार एक-दूसरे से दूर हो रही हैं, यानी धरती यहाँ मिनट दर मिनट रूप बदल रही है. इसी अस्थिर भूगर्भीय गतिविधि ने शायद हजारों साल पुराने इस दैत्य को फिर से जगा दिया.
अभी खतरा खत्म नहीं हुआ
धमाका भले ही थम गया हो, पर खतरा अभी खत्म नहीं माना जा रहा. ज्वालामुखी के क्रेटर से अब भी लगातार सल्फर डाइऑक्साइड गैस निकल रही है, जो इस बात का संकेत है कि भीतर मैग्मा अभी शांत नहीं बैठा है. गैसों की यह गतिविधि बताती है कि आने वाले समय में एक और विस्फोट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक लगातार उपग्रहों के जरिए क्षेत्र की निगरानी कर रहे हैं.
विमानों के इंजनों के लिए सबसे बड़ा खतरा
ज्वालामुखी की राख तकनीकी रूप से बेहद खतरनाक होती है. इसमें मौजूद सूक्ष्म कांच और खनिज कण विमानों के इंजन में जाकर पिघल सकते हैं, सेंसर सिस्टम बंद कर सकते हैं और विंडशील्ड को अपारदर्शी बना देते हैं. यही वजह है कि इंटरनेशनल एविएशन प्रोटोकॉल के तहत कई उड़ानों का मार्ग बदलना पड़ा. राख के बादलों की ऊँचाई 15,000 से 45,000 फुट तक थी, वही क्षेत्र जहाँ अधिकांश लंबी दूरी की उड़ानें संचालित होती हैं.
विस्फोट के दौरान धरती क्या उगलती है?
ज्वालामुखी के फटने पर पृथ्वी अंदर छिपी ऊर्जा तीन रूपों में बाहर निकालती है, लावा, गैसें और चट्टानों के बारीक, बड़े टुकड़े. मैग्मा जब सतह पर बहता है तो वह लावा बन जाता है. गैसों में मुख्य रूप से पानी की भाप, कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल होती हैं.
इनके साथ बेहद बारीक राख, पत्थरों के कण और यहाँ तक कि पिघली चट्टान से बने ज्वालामुखीय बम भी निकलते हैं. यही राख हवा के साथ हजारों किलोमीटर तक जाती है और महाद्वीपों को प्रभावित करती है, जैसा अभी हो रहा है.
एक विस्फोट जिसने दुनिया को जोड़ दिया
हेली गुब्बी का यह विस्फोट विज्ञान के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं. यह याद दिलाता है कि धरती आज भी जीवित, गतिशील और अनिश्चित है. एक ज्वालामुखी, जो 12,000 साल से सोया हुआ था, अचानक जागा और उसकी राख अफ्रीका से एशिया तक फैल गई. यह घटना न सिर्फ भूगर्भ विज्ञान की समझ को चुनौती दे रही है, बल्कि यह भी बता रही है कि प्रकृति का हर अध्याय अभी पूरा नहीं लिखा गया.
यह भी पढ़ें- 20GB RAM और टॉप क्लास कैमरा के साथ Huawei Mate 80 Series हुई लॉन्च, जानिए फीचर्स और कीमत