1.पायलट का 'डबल इंजन' फॉर्मूला..एक पार्टी, दो-दो यात्राएं!
पंजाब यूथ कांग्रेस निकालेगी अपनी अलग यात्रा..राहुल और प्रियंका की मौजूदगी पर प्रभारी सचिन पायलट ने भरी हामी !
पंजाब कांग्रेस के भीतर समानांतर शक्ति प्रदर्शन की एक नई बिसात बिछ गई है. प्रदेश कांग्रेस की पारंपरिक यात्रा से अलग अब यूथ कांग्रेस अपनी स्वतंत्र यात्रा निकालने की तैयारी में है. अलबत्ता गुटबाजी का टैग न लगे इसलिए प्रभारी महासचिव सचिन पायलट से मुलाकात कर यह पक्का करा लिया गया है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों ही यात्राओं में बराबर हाजिरी लगाएंगे. सचमुच जब एक ही दल के दो पंख अपनी-अपनी उड़ान की अलग दिशा तय करने लगें, तो पायलट की सूझबूझ की असली परीक्षा होती है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पंजाब में युवाओं की अपनी अलग जमीन तलाशने और आलाकमान को अपनी ताकत दिखाने की होशियार रणनीति मान रहे हैं. दोनों यात्राएं साथ चलकर भी अलग रहेंगी या आगे चलकर टकराएंगी, यह सूबे के कार्यकर्ताओं के सामने प्रश्न बना हुआ है. फिलहाल, कार्यकर्ताओं को समझ नहीं आ रहा कि वे किस यात्रा के लिए जूते घिसें और किसके लिए नारे लगाएं ?
2.एक तरफ 'साइकिल' का इशारा, दूसरी तरफ हाथ दिखा रहा लाल झंडी!
सपा का एक धड़ा ओवैसी से गठबंधन का पैरोकार.. कांग्रेस ने लगाया वीटो !
समाजवादी पार्टी के भीतर यह खिचड़ी पक रही है कि कुछ सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से हाथ मिला लिया जाए. सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने तो यहां तक कह दिया कि ओवैसी पहले अपना प्रस्ताव भेजें, फिर गठबंधन के साथियों से इस पर चर्चा होगी. अलबत्ता कांग्रेस ने इस विचार पर सिरे से ऐतराज जताते हुए साफ 'ना' कह दी है. सचमुच यूपी में मुस्लिम मतों के बंटवारे को रोकने की फिक्र में सपा नए रास्ते तलाश रही है,लेकिन कांग्रेस को इसमें अपनी जमीन खिसकने का डर सता रहा है. अखिलेश यादव की मंशा अभी इस मसले पर पूरी तरह साफ नहीं है, जिससे संशय और गहरा गया है. राजनीतिक प्रेक्षक इस बात को रेखांकित कर रहे हैं कि क्या गठबंधन धर्म के फेर में सपा अपनी इस चाहत को दबा लेगी? ओवैसी के साथ आने से गठबंधन को फायदा होगा या ध्रुवीकरण का नया खेल शुरू होगा, यह सबसे बड़ा प्रश्न है. सियासी शौकीनों की नजर अब 'साइकिल' के अगले मोड़ पर है !
3.बयान निकला जुबान से, अब सामना होगा पूर्व सैनिकों के कड़े इम्तिहान से!
अजीत डोभाल पर बयान देकर घिरे राहुल गांधी.. पूर्व सैन्य संगठनों ने दी दिल्ली में बड़े प्रदर्शन की चेतावनी !
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पर राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी ने अब सैन्य और राजनीतिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. कई पूर्व सैन्य संगठनों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे देश की सुरक्षा कमान संभालने वाले पद का अपमान बताया है. संगठनों ने अल्टीमेटम दिया है कि राहुल गांधी या तो अपने बयान पर सार्वजनिक माफी मांगें, अन्यथा उनके खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया जाएगा. अलबत्ता कांग्रेस इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति बताकर बचाव की मुद्रा में है. सचमुच सुरक्षा और सेना से जुड़े संवेदनशील पदों पर बयानबाजी हमेशा से विपक्ष के लिए दोधारी तलवार साबित होती रही है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे आगामी दिनों में सत्ता पक्ष द्वारा एक बड़े राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श में तब्दील करने की संभावना के तौर पर देख रहे हैं. क्या कांग्रेस इस दबाव के आगे झुकेगी या अपने बयान पर अडिग रहेगी, यह सियासी गलियारे का यक्ष प्रश्न है !
4.हिमाचल में चुनावी उल्टी गिनती शुरू !
'सर्वाइवर' छवि के दम पर सत्ता दोहराने की कवायद !
देवभूमि हिमाचल में अगले साल के अंत में चुनाव होने हैं, जहां हर पांच साल में राज बदलने का पुराना रिवाज रहा है. अलबत्ता कांग्रेस इस बार बेहद भरोसे में दिख रही है क्योंकि पार्टी अपने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को एक पक्का 'पॉलिटिकल सर्वाइवर' मानती है. सचमुच पहले दिन से वीरभद्र परिवार के दबाव को झेलना हो, दस हजार करोड़ की भीषण प्राकृतिक आपदा से राज्य को उबारना हो, या फिर छह बागियों की बगावत के बाद उपचुनाव जीतकर पूर्ण बहुमत बचाना सुक्खू हर इम्तिहान से पार पाते रहे हैं. खाली खजाने और कर्मचारियों के वेतन संकट के बीच हाल ही में बिना कोई पैसा लगाए किशाऊ बांध परियोजना से हिमाचल के लिए बड़ा फायदा सुरक्षित कराना भी उनकी कुशल रणनीति का सबूत माना जा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक देख रहे हैं कि सुक्खू ने अभी से दूरदराज के इलाकों, वंचितों और दलितों पर फोकस कर चुनावी बिसात बिछा दी है, लेकिन पहाड़ में सत्ता न दोहराने के पारंपरिक जिंक्स को क्या उनका यह 'सर्वाइवर' मिजाज तोड़ पाएगा, यह सबसे बड़ा प्रश्न है ? अलबत्ता यह एक कड़वा राजनीतिक सच है कि भाजपा जब सत्ता बनाती है तो उसके वापसी के अवसर मजबूत माने जाते हैं, जबकि कांग्रेस के लिए 'रिपीट' का इतिहास खासा चुनौतीपूर्ण रहा है !
5.बांकीपुर फतह के बाद अब 'उच्च सदन' का इम्तिहान !
क्या शिक्षक-ग्रेजुएट वोटर भी भरेंगे पीके की उड़ान?
बांकीपुर सीट पर उपचुनाव जीतकर सूबे के 'वन मैन अपोजिशन' बने प्रशांत किशोर का शुरुआती जश्न अब थम चुका है, क्योंकि उनके सामने अब असली अग्निपरीक्षा आ खड़ी हुई है. अलबत्ता पीके की जनसुराज पार्टी ने बिहार विधान परिषद की चार स्नातक और चार शिक्षक कोटे की सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारकर पूरे भौगोलिक फलक सारण, तिरहुत, दरभंगा, कोशी और पटना को मथना शुरू कर दिया है. सचमुच सारण शिक्षक सीट जहां छह साल पहले आफाक अहमद के सहारे उनका खाता खुला था, इस बार प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है वहीं तिरहुत में पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे गौतम विनायक के पाला बदलकर राजद में जाने से समीकरण उलझ गए हैं. रोचक मोड़ पटना स्नातक सीट पर आया है, जहां जदयू के बाहुबली विधायक अनंत सिंह अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार को पटखनी देने के लिए पीके के संभावित प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह की पीठ थपथपा रहे हैं,राजनीतिक प्रेक्षक देख रहे हैं कि अगड़ा, पिछड़ा, मुस्लिम और आधी आबादी के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले पर खेल रहे पीके क्या एनडीए और महागठबंधन दोनों के वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे, या फिर शिक्षित वोटरों की यह चौखट उनके चुनावी दांव के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी हो जाएगी ?
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