प्रेशर या फिर मनमानी? क्या सच में डिलीवरी बॉयज पर होता है दबाव; Zomato CEO ने खोली पोल

नए साल से ठीक पहले देश में गिग वर्कर्स की हड़ताल और तेज डिलीवरी को लेकर बहस अपने चरम पर थी. इसी बीच Zomato और Blinkit ने एक ही दिन में रिकॉर्ड संख्या में ऑर्डर पूरे कर सबको चौंका दिया.

Deepinder Goyal zomato ceo explains 10 minute delivery system
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नए साल से ठीक पहले देश में गिग वर्कर्स की हड़ताल और तेज डिलीवरी को लेकर बहस अपने चरम पर थी. इसी बीच Zomato और Blinkit ने एक ही दिन में रिकॉर्ड संख्या में ऑर्डर पूरे कर सबको चौंका दिया. 10 मिनट की डिलीवरी को लेकर सुरक्षा, शोषण और दबाव जैसे सवाल एक बार फिर उठने लगे. इन आरोपों के बीच अब जोमैटो के सीईओ दीपिंदर गोयल सामने आए हैं और उन्होंने पूरे मॉडल को लेकर कंपनी का पक्ष विस्तार से रखा है.

दीपिंदर गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर स्पष्ट किया कि तेज डिलीवरी का मतलब यह नहीं है कि डिलीवरी पार्टनर्स को जोखिम उठाने या तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने के लिए मजबूर किया जाता है. उनके मुताबिक, यह पूरी तरह से मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट टेक्नोलॉजी और सिस्टम डिजाइन का नतीजा है.

आखिर 10 मिनट की डिलीवरी संभव कैसे होती है?

जोमैटो के सीईओ के अनुसार, क्विक डिलीवरी का आधार शहरों में फैले छोटे-छोटे माइक्रो स्टोर्स हैं, जो ग्राहकों के घरों के बेहद करीब बनाए गए हैं. ऑर्डर मिलते ही औसतन 2 से 3 मिनट में सामान पैक हो जाता है. इसके बाद डिलीवरी पार्टनर को आमतौर पर 2 किलोमीटर से भी कम दूरी तय करनी होती है.गोयल ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में डिलीवरी पार्टनर की औसत स्पीड करीब 15 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है, जो शहरी ट्रैफिक के हिसाब से सामान्य और सुरक्षित मानी जाती है. यानी रफ्तार इंसान की नहीं, सिस्टम की है.

क्या डिलीवरी पार्टनर्स पर समय का दबाव बनाया जाता है?

कंपनी पर लगने वाले सबसे बड़े आरोपों में से एक यह है कि डिलीवरी पार्टनर्स पर समय सीमा का जबरदस्त दबाव होता है. इस पर गोयल ने साफ कहा कि डिलीवरी पार्टनर्स को ऐप में यह जानकारी ही नहीं दिखाई जाती कि ग्राहक को कितने मिनट में डिलीवरी का वादा किया गया है.उनके मुताबिक, पार्टनर्स के सामने कोई काउंटडाउन टाइमर नहीं होता और देरी होने पर न तो उन्हें जुर्माना लगाया जाता है और न ही सजा दी जाती है. कंपनी यह मानती है कि ट्रैफिक, मौसम या अन्य परिस्थितियों की वजह से देरी होना स्वाभाविक है.

इंश्योरेंस और मेडिकल सुरक्षा पर क्या बोली कंपनी?

गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों पर जोमैटो सीईओ ने दावा किया कि सभी डिलीवरी पार्टनर्स को मेडिकल और लाइफ इंश्योरेंस कवर दिया जाता है. किसी भी दुर्घटना या स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या की स्थिति में यह सुरक्षा लागू होती है.गोयल ने यह भी कहा कि यह धारणा गलत है कि गिग वर्कर्स को किसी तरह की सामाजिक या स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं मिलती.

हड़ताल के बीच भी बना रिकॉर्ड

31 दिसंबर को गिग वर्कर्स की हड़ताल की खबरों के बीच Zomato और Blinkit ने एक ही दिन में 75 लाख से अधिक ऑर्डर पूरे किए. करीब 4.5 लाख डिलीवरी पार्टनर्स ने 63 लाख से ज्यादा ग्राहकों तक सेवाएं पहुंचाईं.गोयल का कहना है कि अगर यह सिस्टम वाकई शोषणकारी होता, तो इतनी बड़ी संख्या में लोग अपनी इच्छा से इसमें काम नहीं करते.

गिग वर्क को लेकर कंपनी का नजरिया

जोमैटो का मानना है कि गिग वर्क को स्थायी करियर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह एक अस्थायी रोजगार मॉडल है, जिसे लोग कुछ समय के लिए अपनाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं. कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 65 प्रतिशत डिलीवरी पार्टनर्स इस काम से बाहर हो जाते हैं, जो इस मॉडल के “गिग” स्वरूप को दर्शाता है.

गिग इकॉनमी पर जारी बहस

एक तरफ गिग यूनियनों का आरोप है कि काम का दबाव बढ़ रहा है और कमाई घट रही है, वहीं दूसरी तरफ कंपनियां इसे भारत में रोजगार का बड़ा जरिया बता रही हैं. दीपिंदर गोयल भी मानते हैं कि यह सिस्टम पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन इसे बेहतर बनाने के लिए लगातार बदलाव किए जा रहे हैं.10 मिनट की डिलीवरी को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है. हालांकि, कंपनी का दावा यही है कि यह इंसानों की रफ्तार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और सिस्टम की तेजी है. शायद इसकी सच्चाई जानने का सबसे आसान तरीका यही है कि अगली बार डिलीवरी मिलने पर आप खुद अपने डिलीवरी पार्टनर से बातचीत करें.

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