History Of China: चार दशक पहले चीन का नाम दुनिया के सबसे गरीब देशों में लिया जाता था. वहाँ के लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे थे, और प्रति व्यक्ति आय जाम्बिया और सूडान जैसी जगहों के बराबर थी. 1978 में कोई कहता कि यह देश अगले 40 साल में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनेगा, तो लोग शायद हंस पड़ते. माओ त्से तुंग के ग्रेट लीप फॉरवर्ड जैसे प्रयोगों ने तो हालत और खराब कर दी थी, लाखों लोग अकाल में मरे, और अर्थव्यवस्था ठप पड़ गई.
वहां खेती ही मुख्य जीवनयापन का साधन थी, और उद्योग सिर्फ सरकारी आदेशों से चलते थे. देश दुनिया से कट गया था, विदेशी कंपनियों का प्रवेश नामुमकिन था, और चीनी सामान बाहर नहीं जा सकता था. चारों ओर सिर्फ गरीबी और निराशा का अंधेरा था. लेकिन फिर आए देंग श्याओपिंग, एक ऐसा नेता जिसने चीन की किस्मत बदलने का साहसिक कदम उठाया.
“बिल्ली बस चूहा पकड़ पाए, बस वही अच्छी बिल्ली है”
1978 में कमान संभालते ही देंग श्याओपिंग ने अपनी दूरदर्शी सोच से देश की दिशा बदल दी. उन्होंने कहा, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बिल्ली काली है या सफेद, अगर वह चूहे पकड़ सकती है तो वह एक अच्छी बिल्ली है."
इस छोटे से बयान में समाहित था चीन की नई नीति का सार, अब देश को सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा से नहीं, बल्कि परिणामों से मतलब होगा. बाजार खोले जाएंगे, प्राइवेट कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा, और अगर इससे गरीबी कम होती है, तो वही सही तरीका होगा.
खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक, चीन का नया युग
देंग ने सबसे पहले कृषि सुधार किए. किसानों को अधिकार मिला कि सरकारी अनाज देने के बाद बचे हुए अनाज को वे बाजार में बेच सकते हैं. इसे ‘हाउसहोल्ड रिस्पॉन्सिबिलिटी सिस्टम’ कहा गया. नतीजा चौंकाने वाला था, अनाज उत्पादन बढ़ा और लाखों लोग भुखमरी से बाहर आए.
फिर शुरू हुआ सस्ता श्रम और फैक्ट्री रणनीति. दक्षिणी तट पर स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZs) बनाए गए, जैसे कि शेनझेन. छोटे मछुआरों का गांव जल्द ही विदेशी निवेश और उद्योग का केंद्र बन गया.
90 के दशक तक चीन बन गया दुनिया की फैक्ट्री. टेक्सटाइल, जूते, खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स, सब चीन से बनकर पूरी दुनिया में पहुंचे. 2001 में WTO में शामिल होकर चीन ने वैश्विक व्यापार के दरवाजे खोल दिए.
शहरीकरण और तकनीक की नई दुनिया
गांवों से शहरों में लाखों लोग आए. शहरीकरण unprecedented था, शहर विकसित हुए, रियल एस्टेट की कीमतें आसमान छूने लगीं. लेकिन तेज़ विकास के साथ पर्यावरणीय नुकसान और अमीर-गरीब की खाई बढ़ी. फिर भी देंग श्याओपिंग का संकल्प अडिग रहा.
आज, चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका वैश्विक GDP में लगभग 18% योगदान है. शेनझेन अब सिलिकॉन वैली के मुकाबले चमकता है. Huawei, Alibaba और Tencent जैसी कंपनियां अब दुनिया के दिग्गजों से मुकाबला कर रही हैं. चीन का फोकस अब सिर्फ Made in China नहीं, बल्कि Invented in China बन चुका है.
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