आसिम मुनीर को ईरान ने दिखाया ठेंगा, मोहसिन रेजाई ने मिलने से किया इनकार, उतर गई सारी हेकड़ी

Asim Munir Iran Visit: अमेरिका-ईरान के बीच सुलह कराने तेहरान पहुंचे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को बड़ा झटका लगने की खबर है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहसिन रेजाई ने उनसे मुलाकात करने से इनकार कर दिया, वहीं संवर्धित यूरेनियम को लेकर ईरान ने अपना सख्त रुख भी साफ कर दिया.

asim-munir-iran-visit-faces-setback-over-uranium-dispute
Image Source: Internet

Asim Munir Iran Visit:  पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को बड़ा झटका लगने की खबर सामने आई है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने के उद्देश्य से तेहरान पहुंचे पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को कथित तौर पर ईरान के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की नाराजगी का सामना करना पड़ा. रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने उनसे मुलाकात करने से इनकार कर दिया. इसके साथ ही ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजने की किसी भी संभावना को खारिज करते हुए अपना रुख स्पष्ट कर दिया है.

अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों को झटका

ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव को समाप्त कराने के लिए पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है. इसी सिलसिले में असीम मुनीर तेहरान पहुंचे थे. हालांकि, ईरानी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस यात्रा के दौरान उन्हें अपेक्षित कूटनीतिक समर्थन नहीं मिला. ‘तबनाक’ और ‘फार्स’ की रिपोर्टों के मुताबिक, मुनीर का दौरा पहले टलने की स्थिति में था, लेकिन बाद में इसे अंतिम रूप दिया गया. बताया गया कि ईरान के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को पाकिस्तान की भूमिका पर संदेह है और वे इस्लामाबाद की मध्यस्थता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. हालांकि, मुलाकात से इनकार किए जाने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है.

पाकिस्तान की मध्यस्थता पर ईरान को क्यों है संदेह?

पाकिस्तान की कोशिश है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता खुले और संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में कोई सहमति बन सके. लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के कुछ अधिकारियों को आशंका है कि इस्लामाबाद अमेरिकी हितों के अनुरूप काम कर सकता है. इसी वजह से शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं. यदि तेहरान का अविश्वास बढ़ता है, तो दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित करने की पाकिस्तान की कोशिशें मुश्किल में पड़ सकती हैं. फिलहाल, इस मामले में ईरान की ओर से सामने आए दावों और आधिकारिक बयानों के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है.

यूरेनियम पर ईरान का दोटूक संदेश

असीम मुनीर के दौरे के बीच ईरान की ओर से संवर्धित यूरेनियम को लेकर भी सख्त संदेश सामने आया है. रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने स्पष्ट किया कि ईरान अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का एक ग्राम भी देश से बाहर भेजने के लिए तैयार नहीं है. यह मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी विवाद का अहम हिस्सा है. तेहरान का यह रुख बताता है कि परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सवालों पर किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा. हालांकि, इस बयान के संदर्भ और आधिकारिक पुष्टि को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों की अलग से जांच जरूरी है.

ईरान की सात शर्तों से बढ़ सकती है बातचीत की मुश्किल

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ को लेकर आई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिका को संघर्ष का समाधान निकालने से पहले ईरान की सात प्रमुख शर्तें स्वीकार करनी होंगी. यदि यह रुख आधिकारिक वार्ता में भी कायम रहता है, तो दोनों पक्षों के बीच समझौते की राह और कठिन हो सकती है. दूसरी ओर, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की सार्वजनिक कूटनीतिक सक्रियता में कमी आने की बात भी कुछ रिपोर्टों में कही गई है. इन घटनाक्रमों के आधार पर ईरान की नेतृत्व व्यवस्था में सख्त रुख को अधिक समर्थन मिलने की आशंका जताई जा रही है, लेकिन इसे अभी एक आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

तेल की कीमतों पर भी पड़ रहा है संघर्ष का असर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है. होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ने से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने का डर बना हुआ है. रिपोर्टों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने का उल्लेख किया गया है. तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पाकिस्तान जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है. महंगे कच्चे तेल से ईंधन, परिवहन और अन्य जरूरी वस्तुओं की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है. ऐसे माहौल में पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को बाजार का भरोसा बहाल करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है, हालांकि इसका वास्तविक उद्देश्य स्वतंत्र रूप से स्पष्ट नहीं है.

क्या कमजोर पड़ सकती है शांति वार्ता की उम्मीद?

ईरान के सख्त बयानों, पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर उठते सवालों और अमेरिका के साथ जारी तनाव ने कूटनीतिक समाधान की राह को अनिश्चित बना दिया है. संघर्ष के विश्लेषण में यह आशंका भी जताई जा रही है कि ईरान के भीतर सख्त रुख रखने वाले नेताओं का प्रभाव बढ़ सकता है. यदि ऐसा होता है, तो बातचीत के जरिए समझौता करने की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि शांति वार्ता पूरी तरह विफल हो जाएगी. आने वाले दिनों में तेहरान, वॉशिंगटन और इस्लामाबाद की ओर से उठाए जाने वाले कदम तय करेंगे कि संघर्ष को कम करने के प्रयास आगे बढ़ते हैं या पश्चिम एशिया में तनाव और गहराता है.

ये भी पढ़ें- मक्का की मस्जिद में बांग्लादेशी कपल ने की ऐसी हरकत, सऊदी में मिली सजा-ए-मौत... जानें पूरा मामला