Russian Oil Ban: वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय भारी अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते खतरे और कच्चे तेल की सप्लाई में आ रही बाधाओं के बीच अब दुनिया के सामने एक और बड़ा ऑयल शॉक खड़ा होता दिख रहा है. अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल की खरीद पर दी गई अस्थायी राहत को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस फैसले का असर आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और देश की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे सकता है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने 16 मई तक लागू उस विशेष छूट को समाप्त कर दिया है, जिसके तहत समुद्र में पहले से लदे रूसी तेल टैंकरों से खरीद की अनुमति दी गई थी. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहले से ही कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
क्या थी रूसी तेल पर दी गई अमेरिकी राहत?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति प्रभावित होने लगी थी. कई देशों को आशंका थी कि यदि तेल की उपलब्धता कम हुई तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बेकाबू हो सकती हैं. इसी स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका ने मार्च महीने में एक अस्थायी छूट जारी की थी.
इस व्यवस्था के तहत उन रूसी तेल टैंकरों से खरीद की अनुमति दी गई थी, जिनमें पहले से तेल लोड हो चुका था. बाद में कई देशों के आग्रह पर इस राहत को बढ़ाकर 16 मई तक कर दिया गया था. इसका सबसे अधिक फायदा भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों को मिला, जो कम कीमत पर उपलब्ध रूसी तेल के जरिए अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहे थे.
भारत ने अमेरिका से बढ़ाने की मांग की थी राहत
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ी भी बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अमेरिकी प्रशासन से इस राहत को आगे भी जारी रखने की अपील की थी.
भारतीय अधिकारियों ने तर्क दिया था कि वैश्विक बाजार में जारी अस्थिरता का असर सीधे 140 करोड़ से ज्यादा लोगों पर पड़ेगा. ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी, जिससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक हर चीज महंगी हो सकती है. इसके अलावा घरेलू गैस और औद्योगिक ईंधन की लागत बढ़ने से महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई गई थी.
रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था रूसी तेल का आयात
अस्थायी छूट मिलने के बाद भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में काफी तेजी दिखाई थी. कमोडिटी ट्रैकिंग फर्म ‘केपलर’ के आंकड़ों के अनुसार, मई के शुरुआती हफ्तों में भारत ने रूस से करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है.
भारत ने खासतौर पर रूस के ‘यूराल्स ग्रेड’ कच्चे तेल को बड़े पैमाने पर खरीदा, क्योंकि यह अन्य अंतरराष्ट्रीय विकल्पों की तुलना में सस्ता पड़ रहा था. इससे भारत को अपने आयात बिल को कुछ हद तक नियंत्रित रखने में मदद मिली थी.
अब क्यों बढ़ सकती है भारत की परेशानी?
अमेरिका की ओर से राहत खत्म होने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सस्ते विकल्पों की कमी है. दूसरी ओर खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले ही 109 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं. पिछले दो महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
यदि रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो भारत को ज्यादा महंगे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है. इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा और वित्तीय घाटे पर दबाव आएगा. इसके अलावा तेल कंपनियों की लागत बढ़ने पर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में भी और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
आम लोगों पर क्या होगा असर?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा बना रहता है और रूस से सप्लाई सीमित होती है, तो इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर तेजी से दिखाई देगा. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाद्य वस्तुओं, सब्जियों, दूध और रोजमर्रा के सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं. उद्योगों की लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा होगा और महंगाई का दबाव लगातार बना रह सकता है.
इसके साथ ही एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है. सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती यह होगी कि वह बढ़ती वैश्विक कीमतों के बीच घरेलू बाजार को कैसे संतुलित रखे.
वैश्विक बाजार पर भी दिख सकता है असर
रूसी तेल पर अमेरिकी सख्ती का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा. एशिया और यूरोप के कई देश ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई रणनीति बनाने में जुट सकते हैं. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और बिगड़ती है, तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.
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