SpaceX Starship ने रचा इतिहास, पहली बार ऑर्बिट में पहुंचा रॉकेट; 26 Starlink V3 सैटेलाइट भी तैनात

अंतरिक्ष की दुनिया में स्पेसएक्स ने एक बार फिर बड़ी छलांग लगाई है. एलन मस्क की कंपनी का विशाल स्टारशिप मिशन पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने में सफल रहा. मिशन की खास बात यह रही कि स्टारशिप ने 26 नई पीढ़ी के स्टारलिंक V3 सैटेलाइट भी कक्षा में तैनात किए.

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अंतरिक्ष की दुनिया में स्पेसएक्स ने एक बार फिर बड़ी छलांग लगाई है. एलन मस्क की कंपनी का विशाल स्टारशिप मिशन पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने में सफल रहा. मिशन की खास बात यह रही कि स्टारशिप ने 26 नई पीढ़ी के स्टारलिंक V3 सैटेलाइट भी कक्षा में तैनात किए. इस सफलता को भविष्य में चंद्रमा और मंगल जैसे अभियानों के लिए पूरी तरह पुन: उपयोग किए जा सकने वाले लॉन्च सिस्टम तैयार करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. भारतीय समयानुसार रॉकेट को शाम 6:16 बजे लॉन्च किया गया.

एक इंजन हुआ बंद, फिर भी जारी रहा मिशन

स्टारशिप की यह उड़ान पूरी तरह चुनौतीमुक्त नहीं थी. उड़ान के दौरान छह रैप्टर वैक्यूम यानी RV इंजनों में से एक इंजन बंद हो गया. इस स्थिति के बाद मिशन कंट्रोल टीम ने बाकी इंजनों की कार्यक्षमता और स्थिति का आकलन किया. सिस्टम सामान्य पाए जाने के बाद मिशन को आगे बढ़ाने का फैसला किया गया और स्टारशिप निर्धारित तरीके से पृथ्वी की कक्षा तक पहुंच गया.

पहली बार ऑर्बिट तक पहुंचा स्टारशिप

स्पेसएक्स की योजना के अनुसार स्टारशिप लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए पृथ्वी के करीब छह चक्कर लगाएगा. पूरे मिशन के लगभग 10 घंटे तक चलने की उम्मीद है. मिशन के अंतिम चरण में स्टारशिप को प्रशांत महासागर में चिली के पश्चिमी तट के पास स्प्लैशडाउन कराए जाने की योजना है. यह उड़ान स्टारशिप को तेजी से दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले अंतरिक्षयान के रूप में विकसित करने के प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण है.

पहली बार तैनात हुए Starlink V3 सैटेलाइट

इस मिशन में स्पेसएक्स ने पहली बार स्टारलिंक V3 सैटेलाइट को कक्षा में भेजा. कुल 26 सैटेलाइट तैनात किए गए हैं. कंपनी के मुताबिक, इन नई पीढ़ी के सैटेलाइट को पहले के मुकाबले ज्यादा डेटा क्षमता, अधिक पावर और बेहतर नेटवर्क प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया है. मिशन से जुड़ी जानकारी के अनुसार प्रत्येक सैटेलाइट करीब 1 Tbps तक डाउनलिंक क्षमता जोड़ सकता है.

407 फीट ऊंचा है स्टारशिप सिस्टम

स्टारशिप-सुपर हेवी सिस्टम की ऊंचाई करीब 124.4 मीटर यानी लगभग 407 फीट है. इसका निर्माण दो प्रमुख हिस्सों से हुआ है. पहला हिस्सा सुपर हेवी बूस्टर है, जबकि दूसरा स्टारशिप का ऊपरी चरण है. दोनों हिस्सों को भविष्य में तेजी से दोबारा इस्तेमाल करने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है. स्पेसएक्स का दीर्घकालिक लक्ष्य ऐसे लॉन्च सिस्टम का निर्माण करना है, जो पृथ्वी की कक्षा से आगे चंद्रमा और मंगल अभियानों में भी इस्तेमाल हो सके.

सुपर हेवी बूस्टर की भी होगी परीक्षा

इस मिशन में सिर्फ स्टारशिप ही नहीं, बल्कि सुपर हेवी बूस्टर के प्रदर्शन पर भी नजर रहेगी. लॉन्च के बाद इसकी सफल चढ़ाई, स्टेज सेपरेशन, बूस्टबैक बर्न और लैंडिंग बर्न महत्वपूर्ण चरण होंगे. इसके बाद बूस्टर को खाड़ी में निर्धारित समुद्री क्षेत्र में उतारने की योजना है. पिछले परीक्षणों में सामने आई चुनौतियों के बाद स्पेसएक्स ने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में कई बदलाव किए हैं.

स्टारशिप का ऊपरी चरण करेगा कई अहम काम

ऑर्बिटल इंसर्शन मैनूवर के साथ स्टारशिप का ऊपरी चरण 26 स्टारलिंक V3 सैटेलाइट को तैनात करेगा. इसके बाद एक रैप्टर इंजन की मदद से डीऑर्बिट बर्न किया जाएगा. इसके जरिए स्टारशिप को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वातावरण में वापस लाया जाएगा. मिशन के अंत में प्रशांत महासागर में इसके स्प्लैशडाउन की योजना है.

हीट शील्ड की भी होगी निगरानी

मिशन के दौरान तीन स्टारलिंक V3 सैटेलाइटों में अतिरिक्त कैमरे लगाए गए हैं. इन कैमरों का इस्तेमाल स्टारशिप की हीट शील्ड की तस्वीरें लेने के लिए किया जाएगा. इन तस्वीरों से इंजीनियरों को दोबारा प्रवेश के दौरान हीट शील्ड के प्रदर्शन और उसकी स्थिति को समझने में मदद मिलेगी. भविष्य की स्टारशिप उड़ानों में इस डेटा का इस्तेमाल सुधार के लिए किया जा सकता है.

कुछ हफ्तों में शुरू हो सकती है सैटेलाइट सेवा

कक्षा में पहुंचने के बाद स्टारलिंक V3 सैटेलाइट अपने एंटीना और सोलर एरे को तैनात करेंगे. इसके बाद रेडियो फ्रीक्वेंसी और लेजर लिंक के जरिए वे ग्राउंड सिस्टम और मौजूदा स्टारलिंक नेटवर्क से जुड़ेंगे. सैटेलाइट अपने ऑनबोर्ड थ्रस्टर्स की मदद से धीरे-धीरे अपनी निर्धारित कक्षा में पहुंचेंगे. जरूरी ऑर्बिटल टेस्ट पूरे होने के बाद इनके कुछ हफ्तों में ग्राहकों को सेवा देना शुरू करने की उम्मीद है.

चांद से मंगल तक है स्पेसएक्स का बड़ा लक्ष्य

स्पेसएक्स स्टारशिप को केवल एक भारी-भरकम रॉकेट के तौर पर नहीं देखती. कंपनी इसे भविष्य के डीप-स्पेस मिशनों के लिए एक महत्वपूर्ण परिवहन प्रणाली के रूप में विकसित कर रही है. पूरी तरह पुन: उपयोग योग्य स्टारशिप सिस्टम तैयार होने पर अंतरिक्ष तक पहुंच की लागत और लॉन्च प्रक्रिया में बड़ा बदलाव लाने का लक्ष्य है.

इस उड़ान की सफलता उसी लंबी योजना का हिस्सा है, जिसमें पृथ्वी की कक्षा से आगे इंसानों और कार्गो को चंद्रमा तक पहुंचाने और भविष्य में मंगल मिशनों के लिए जरूरी तकनीक विकसित करने पर जोर है.

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