Political Popcorn: सियासत में कहीं गठबंधन बचाने की कवायद है, तो कहीं AI से जंग और नैतिकता पर घमासान. असम में बाढ़ सरकार की परीक्षा ले रही है, तो यूपी में राज्यसभा का गणित चर्चा में है. देखिए, इस हफ्ते के सियासी मुद्दों पर खास पेशकश Political Popcorn में.
1. इंडी का कुनबा और पुरानी खटास!
एक थाल में कितने कांटे
मातोश्री से निकली सलाह जब दिल्ली और चेन्नई के कानों तक पहुंचती है, तो सियासी गलियारों में मुस्कुराहटें तैर जाती हैं. उद्धव गुट ने साथी दलों को दो-टूक कहा है कि जब जंग बड़ी हो, तो आपस की रंजिशों को अलमारी में बंद कर देना चाहिए. राजनीतिक प्रेक्षक इसे गठबंधन को बचाने की ईमानदार कवायद मान रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत का पेंच भी कम उलझा नहीं है. एक तरफ जहां केंद्र के खिलाफ लामबंदी का भव्य मंच तैयार किया जा रहा है, वहीं राज्यों में सीटों की खींचतान अंदरूनी सिरदर्द बनी हुई है. अलबत्ता नसीहत देना जितना सरल है, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाना उतना ही पेचीदा साबित होता है. सत्ता पक्ष भी इस 'एकजुटता अभियान' पर पैनी नजर रखे हुए है और इसे बेमेल तालमेल करार दे रहा है. सचमुच जब तक स्थानीय स्तर पर गिले-शिकवे दूर नहीं होते, तब तक यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा कि गठबंधन की यह गाड़ी एक ही पटरी पर बिना पटरी बदले कब तक दौड़ेगी ?
2. कंगना की अदालत!
'एआई' के भंवर में सांसदी!
अभिनय से संसद तक का सफर तय करने वाली कंगना रनौत अब उस 'डीपफेक' तकनीक से दो-दो हाथ कर रही हैं, जिसने आजकल इंटरनेट की दुनिया में भूचाल ला रखा है. दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए उन्होंने तकनीक के इस दुरुपयोग पर सख्त कानूनी लगाम लगाने की मांग की है. सचमुच यह मुद्दा केवल एक सांसद या सेलिब्रिटी का नहीं, बल्कि डिजिटल युग में निजता और गरिमा की सुरक्षा का है. राजनीतिक प्रेक्षक इस कदम की सराहना कर रहे हैं, क्योंकि सत्ता पक्ष की नेता होने के बावजूद उन्होंने डिजिटल रेगुलेशन की खामियों को उजागर करने की हिम्मत दिखाई है. अलबत्ता विपक्ष के कुछ चुटीले बयानों में यह तंज भी सुनाई दिया कि जो खुद सोशल मीडिया की धार के मुरीद रहे हों, उन्हें अब उसी धार से सुरक्षा चाहिए. दोनों पक्षों की नोकझोंक के बीच तकनीकी दुनिया में यह बहस तेज हो गई है. अब यक्ष प्रश्न यही खड़ा है कि अदालत के डंडे से एल्गोरिद्म की बेलगाम रफ्तार को काबू किया जा सकेगा या कानून हमेशा तकनीक से दो कदम पीछे ही चलेगा!
3. 'मामा' के 150 दिन और पानी-पानी होती उम्मीदें!
असम में हिमंत सरकार के 150 दिन पूरे, बाढ़ और विकास की दोहरी चुनौती!
असम की सत्ता में दोबारा वापसी के बाद हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने अपने कार्यकाल के 150 दिन पूरे कर लिए हैं. राजधानी से लेकर दिल्ली तक उनके काम की गति और प्रशासनिक पकड़ के कसीदे पढ़े जा रहे हैं, लेकिन ब्रह्मपुत्र की लहरों ने इस बार इम्तिहान थोड़ा कड़ा कर दिया है. अलबत्ता विकास कार्यों और कल्याणकारी योजनाओं की लंबी फेहरिस्त के बावजूद हालिया बाढ़ से उपजे असंतोष ने सरकार के सामने चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे 'मामा' की लोकप्रियता की वास्तविक परीक्षा मान रहे हैं. सत्ता पक्ष जहां राहत कार्यों की गति दिखाकर जनता को आश्वस्त करने में जुटा है, वहीं विपक्ष इसे बुनियादी ढांचे की विफलता बताकर घेर रहा है. सचमुच पूर्वोत्तर की राजनीति में मजबूत नेतृत्व और प्राकृतिक आपदाओं के बीच का यह संघर्ष कोई नया नहीं है. अब यक्ष प्रश्न यह है कि विकास का यह मॉडल असम के पारंपरिक जल संकट का कोई स्थायी समाधान दे पाएगा या हर साल सिर्फ राहत पैकेजों से ही काम चलेगा ?
4. सियासत के तराजू में नैतिकता का वजन?
खाकी पर कोहनी और कैमरे की नजर!
लुटियंस दिल्ली की सड़कों पर जब बैरिकेड हिलते हैं, तो सियासत के तराजू में नैतिकता का वजन नापा जाने लगता है. चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर बढ़ते कदमों के बीच जैसे ही कैमरों ने धक्का-मुक्की के फ्रेम पकड़े, सत्ता पक्ष को कांग्रेस के ‘नारी सम्मान’ वाले दावों पर हमला बोलने का सीधा मौका मिल गया. भाजपा के आधिकारिक हैंडल्स से आरोप दागे गए कि एक तरफ तो पितृसत्ता पर लंबे भाषण दिए जाते हैं, और दूसरी तरफ ऑन-कैमरा महिला पुलिसकर्मियों के साथ कोहनी और धक्कों की नुमाइश हो रही है. सचमुच, जब प्रदर्शन सड़कों पर उतरता है तो खाकी और खादी की रस्साकशी में मर्यादा की लकीरें बेहद महीन हो जाती हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे दोनों ही तरफ से परसेप्शन की लड़ाई बता रहे हैं, जहां विपक्ष इसे पुलिसिया ज्यादती से उपजा प्रतिरोध कह रहा है, वहीं सत्ताधारी दल इसे सीधे तौर पर 'अराजकता की दुकान' साबित करने में जुटा है. अलबत्ता, जब दोनों पक्षों की रीलें सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए घूम रही हों, तो असली आंदोलन पीछे छूट जाता है !
5. तीसरे पर्चे का मोहभंग!
सपा ने बिना लड़े अपनी दोनों सीटें जेब में रख लीं?
राज्यसभा के अखाड़े में जब कुश्ती सिर्फ गणित की रह जाए तो बाहुबलियों के नाम सिर्फ हवा का रुख भांपने के काम आते हैं. उत्तर प्रदेश में चार पर्चे खरीदकर भाजपा के नौवें उम्मीदवार को ललकारने का माहौल तो खूब बना, लेकिन ऐन वक्त पर अखिलेश यादव ने तीसरे मैदान से पांव खींच लिए. चर्चाएं थीं कि बृजभूषण शरण सिंह के जरिए अतिरिक्त वोटों का जुगाड़ होगा लेकिन अंततः समाजवादी खेमे ने जोखिम भरे तीसरे दांव की बजाय अपनी दूसरी सीट को सुरक्षित करने में ही भलाई समझी. सचमुच चाचा रामगोपाल के बाद दूसरी सीट पर धनराज नाथवानी का नाम आगे करना एक ऐसा सियासी मास्टरस्ट्रोक रहा, जिस पर सत्ता पक्ष भी उंगली उठाने से पहले दो बार सोचेगा. राजनीतिक प्रेक्षक इसे एक नफासत भरा समझौता मान रहे हैं, जहां सपा ने बिना लड़े अपनी दोनों सीटें जेब में रख लीं और भाजपा के खेमे में भी खलबली मचने से बचा ली. अलबत्ता अब सपा के अंदरूनी हलकों में बृजभूषण पर ठीकरा फोड़कर चेहरा बचाने की कोशिशें जारी हैं. इस पूरे अंकगणित के बीच यक्ष प्रश्न यही छूट गया कि क्या आक्रामक विपक्ष का यह 'रणनीतिक समर्पण' कार्यकर्ताओं के जोश को ठंडा नहीं कर देगा?