Political popcorn: बसपा में कुर्सी का खेल! आकाश से ईशान तक... मायावती के 'उत्तराधिकारी' पर क्यों मचा घमासान?

Political popcorn: कर्नाटक में सिद्धारमैया की अचानक लगी प्रतिमा से लेकर बसपा में उत्तराधिकारी की चर्चा, परिसीमन की सुगबुगाहट और PM मोदी के चिंतन शिविर तक सियासी गलियारों में हलचल तेज है.

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1.बुत तराशा भी और हटाया भी!

कर्नाटक में 'मूर्ति-रहस्य' !

कर्नाटक के कलबुर्गी में एक दिन पहले रात जो हुआ, उसने सियासी ड्रामे की नई पटकथा लिख दी. अचानक चौराहे पर सिद्धारमैया की नौ फीट ऊंची भव्य प्रतिमा प्रकट हुई और संयोग देखिए कि कुछ ही घंटों में उसी सड़क से मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का काफिला गुजरने वाला था. अलबत्ता काफिला आने से पहले ही प्रशासन ने फुर्ती दिखाते हुए रातों-रात मूर्ति को वहां से गायब भी करवा दिया. उधर सिद्धा के खासमखास रहे मंत्री सतीश जरकिहोली पाला बदलकर डीके खेमे में क्या गए, उन्होंने 'अहिंदा' वोट बैंक पर ही अपना दावा ठोक दिया. सचमुच कर्नाटक कांग्रेस में यह शह-मात का खेल नया नहीं है लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर हैरान हैं कि मूर्ति लगवाने वाले का नाम गुप्त था या हटाने वाले का आदेश ज्यादा गोपनीय? अब यह मूर्ति किसने खड़ी की और किसके इशारे पर उतारी गई, यह कन्नड़ सियासत का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है !

​2.कुर्सी-कुर्सी कौन खेलेगा?

बसपा में उत्तराधिकार की 'म्यूजिकल चेयर' !

उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी के नीले आसमान में उत्तराधिकार की पतंग बड़ी तेजी से हिचकोले खा रही है. कभी आकाश आनंद आगे आते हैं, कभी पर्दे के पीछे चले जाते हैं फिर ईशान और दीपिका के नाम की गूंज सुनाई देती है और बात दोबारा ईशान पर आकर टिक जाती है. भाई के परिवार में चल रही इस 'म्यूजिकल चेयर' से पार्टी कार्यकर्ता भले ही उलझन में हों, मगर विरोधी खेमों की बांछें खिल गई हैं. सचमुच संजय निषाद की मुलाकात की कोशिशें हों, सपा की अशोक सिद्धार्थ के जरिए तार जोड़ने की जुगत या फिर कांग्रेस की सधी हुई निगाहें हर कोई हाथी के बाड़े में सेंध लगाने को बेताब है. अलबत्ता बहनजी की खामोशी के पीछे की रणनीति समझना सबके बस की बात नहीं. लखनऊ के चतुर राजनीतिक प्रेक्षक टकटकी लगाए बैठे हैं कि मायावती का अगला दांव क्या होगा और क्या विरोधी दल इस परिवारिक खींचतान का फायदा उठा पाएंगे या खाली हाथ लौटेंगे ! 

​3.नक्शा बदलेगा या सियासत?

परिसीमन की सुगबुगाहट,11 अक्टूबर के आसपास विशेष सत्र और नए सियासी भूगोल की तैयारी!

संसद के गलियारों से छनकर आ रही कानाफूसी ने उत्तर से दक्षिण तक के सियासी क्षत्रपों के कान खड़े कर दिए हैं. चर्चा जोरों पर है कि 11 अक्टूबर के आसपास लोकसभा का सत्र आहूत हो सकता है, जिसमें बहुप्रतीक्षित 'परिसीमन विधेयक' को पटल पर रखकर पारित कराने की बिसात बिछाई जा रही है. अलबत्ता दिल्ली के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में इस पर शांति है, मगर प्रादेशिक दलों के खेमों में अभी से कैलकुलेटर और नक्शे बाहर निकल आए हैं. सचमुच सीटों की नई लकीरें सिर्फ भूगोल नहीं बदलतीं, बल्कि कई दिग्गजों का सियासी भविष्य भी तय करती हैं. संसद की नब्ज पहचानने वाले राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यदि यह बिल इस सत्र में आया तो सदन के भीतर बहसों का पारा आसमान छुएगा. अब देखना यह है कि यह महज अफवाहों का धुआं है या कोई बड़ा विधायी तूफान आने वाला है, यह हर सांसद के लिए एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है !

​4.रिपोर्ट कार्ड, रेटिंग और 'सेवा तीर्थ'!

सुशासन का महामंथन..8-8 मंत्रियों के गुट, सेल्फ-ऑडिट और पीएम मोदी का दो दिवसीय 'चिंतन शिविर' !

राजधानी के 'सेवा तीर्थ' में 23 और 24 सितंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल का जमावड़ा लगने जा रहा है, जिसे सरकार के तीसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी 'क्लास' कहा जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस दो दिवसीय चिंतन शिविर का नेतृत्व करेंगे, जहां हर मंत्रालय का सूक्ष्म ऑडिट होगा और मंत्रियों को अपना 'Self-analyzed' रिपोर्ट कार्ड पेश करना होगा. शासन की रफ्तार और तालमेल बढ़ाने के लिए मंत्रियों को 8-8 के विशेष समूहों में बांटा गया है, ताकि अंतिम पंक्ति तक योजनाओं की डिलीवरी बुलेट ट्रेन की रफ्तार से हो सके. सचमुच सत्तापक्ष इसे सुशासन और विकसित भारत के विजन की मजबूत नींव बता रहा है. अलबत्ता लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक प्रेक्षक यह देखने को उत्सुक हैं कि इस कड़े ऑडिट में कौन सा मंत्री 'डिस्टिंक्शन' लाता है और किसे सुधार की चेतावनी मिलती है. नौकरशाही और मंत्रियों के बीच तालमेल की इस नई कवायद से डिलीवरी कितनी तेज होगी, यह नीतिगत गलियारों का सबसे अहम प्रश्न है !

5.हुजूर, फाइलों से निकलिए, फावड़ा देखिए!

कुएं, पुलिया और रिपोर्ट कार्ड..डीएम-एसडीएम साहेबान पर नकेल कसी!

​उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों 'एक्शन मोड' का सायरन बज चुका है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों  और एसडीएम को सख्त ताकीद की है कि एसी दफ्तरों की फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर छोटे-मझोले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार तेज की जाए. चाहे गांव की पुलिया बनानी हो या कुएं खोदने का काम, अब देरी की कोई गुंजाइश नहीं है. सचमुच नौकरशाही की सुस्ती दूर करने के लिए शासन ने 'वर्क-डन' यानी भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट सीधे तलब कर ली है. अलबत्ता सरकार का साफ संदेश है कि जवाबदेही सीधे कप्तानों और हाकिमों की होगी. लखनऊ के मंझे हुए राजनीतिक प्रेक्षक इसे आगामी चुनावी रणनीति के तहत अंतिम पंक्ति तक विकास पहुंचाने का मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं. लेकिन क्या कागजी आंकड़ों का यह खेल जमीन पर सच में तब्दील हो पाएगा या लालफीताशाही फिर बीच में आ जाएगी, यह जनता के सामने खड़ा सबसे बड़ा प्रश्न है !

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