Malloujula Venugopal Rao: महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली जिले में देश के सुरक्षा बलों और केंद्र सरकार को बड़ी सफलता मिली है. माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व में शामिल मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति उर्फ सोनू ने 60 साथियों के साथ पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है. यह केवल एक रणनीतिक कदम नहीं, बल्कि माओवादी आंदोलन के वैचारिक ढांचे को भी गहरा धक्का है.
मल्लोजुला वेणुगोपाल राव, जिन्हें संगठन में सोनू, भूपति या अभय जैसे नामों से जाना जाता रहा है, तेलंगाना के पेद्दापल्ली जिले का निवासी है. उनका परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा रहा है. पिता शिक्षक थे और दादा स्वतंत्रता सेनानी. लेकिन 1970 के दशक में वेणुगोपाल ने सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया और सीपीआई (माओवादी) से जुड़ गए. पिछले पांच दशकों से वे संगठन में वैचारिक प्रचारक, लेखक और रणनीतिकार के रूप में सक्रिय थे.
Malloujula Venugopal Rao @ Sonu, Polit Bureau member of CPI/Maoist, laid down weapons along with 60 Maoist cadres today in Gadhchiroli, Maharashtra. This is a major blow to CPI/Maoist and is a result of sustained operations by police under the leadership of Union HM Amit Shah and… pic.twitter.com/rUXabMQMiJ
— ANI (@ANI) October 14, 2025
संगठन के पोलित ब्यूरो के सदस्य के रूप में उनका दर्जा सर्वोच्च नेतृत्व में गिना जाता था. वेणुगोपाल वह व्यक्ति था, जो जंगलों से दूर शहरी युवाओं तक माओवादी विचारधारा को पहुंचाने में भूमिका निभाता रहा. उसने आदिवासियों के नाम पर कई उपन्यास और लेख लिखे, जिनमें नक्सल आंदोलन को न्याय की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया गया.
आत्मसमर्पण से पहले जारी हुआ था विचारात्मक पत्र
सितंबर में वेणुगोपाल ने एक प्रेस बयान के ज़रिए इस बात के संकेत दे दिए थे कि अब सशस्त्र संघर्ष की दिशा से उनका विश्वास उठ चुका है. उन्होंने लिखा था कि देश की परिस्थितियां बदल चुकी हैं और जो रास्ता माओवादियों ने चुना था, वह अब प्रासंगिक नहीं रह गया है.
उन्होंने संगठन के अन्य सदस्यों से अपील की थी कि वे इस "व्यर्थ बलिदान" से बचें और मुख्यधारा में लौटकर आदिवासियों के कल्याण के लिए शांतिपूर्ण मार्ग अपनाएं. उनका यह पत्र संगठन के भीतर भारी विवाद का कारण बना. माओवादियों के मौजूदा महासचिव देवजी ने इस पत्र की आलोचना करते हुए कहा कि यह पार्टी लाइन के खिलाफ है और वेणुगोपाल के निजी विचार हैं.
संगठन में फूट और रणनीतिक बदलाव
वेणुगोपाल को संगठन के भीतर बढ़ते मतभेदों और अपनी हत्या की आशंका भी थी. बताया जा रहा है कि आत्मसमर्पण से कुछ महीने पहले ही वे अपने दस्ते के साथ संगठन से अलग-थलग होकर रह रहे थे. उन्होंने कई बार पार्टी नेतृत्व को यह समझाने की कोशिश की कि बदली परिस्थितियों में आंदोलन को राजनीतिक रास्ता अपनाना चाहिए, लेकिन उनकी बातों को नकार दिया गया.
इसके बाद उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय से संपर्क साधा और आत्मसमर्पण की इच्छा जाहिर की. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वे केवल व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि पूरे दस्ते को साथ लेकर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं.
केंद्र सरकार और अमित शाह की रणनीति का असर
यह आत्मसमर्पण केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नक्सलवाद के खिलाफ बनाई गई ठोस रणनीति का परिणाम भी है. गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में बताया था कि 2014 के बाद से सरकार ने सुरक्षा ढांचे को मज़बूत करने के साथ-साथ नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारों को भरपूर संसाधन मुहैया कराए.
एसआरई और एसआईएस योजनाओं के तहत हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, सैकड़ों फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए और 336 नए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैंप स्थापित किए गए. इन प्रयासों के चलते सुरक्षाबलों और आम नागरिकों की मौतों में बड़ी गिरावट आई है.
शाह ने कहा था कि सरकार की प्राथमिकता नक्सलियों को आत्मसमर्पण का मौका देना है. 2024 और 2025 में अब तक 2000 से अधिक नक्सलियों ने या तो आत्मसमर्पण किया या गिरफ्तार हुए. वहीं, केवल 270 को मुठभेड़ों में मारा गया. यह आंकड़े सरकार की ‘सरेंडर फर्स्ट’ नीति को दर्शाते हैं.
संगठन के लिए बड़ा झटका
मल्लोजुला वेणुगोपाल राव का आत्मसमर्पण माओवादी संगठन के लिए वैचारिक, रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक तीनों स्तरों पर बड़ा झटका है. यह संगठन का वह चेहरा था, जो जंगल से बाहर विचारधारा को आकार देता था. उसका जाना संगठन की थिंक टैंक क्षमता को कमजोर करता है.
अब पोलित ब्यूरो में बचे हुए कुछ वरिष्ठ नेता जैसे देवजी और मिशिरा बेसरा पर पूरी जिम्मेदारी है. लेकिन माना जा रहा है कि संगठन में अब भी वैचारिक मतभेद गहराते जा रहे हैं और आने वाले समय में और भी बड़े नाम आत्मसमर्पण कर सकते हैं.
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