पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) की नदियां पाकिस्तान के राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को ऊर्जा देती हैं, लेकिन उसी क्षेत्र के लोगों को बिजली की राशनिंग करनी पड़ती है और भारी बिलों के खिलाफ सड़कों पर उतरना पड़ता है. इसके उलट, जम्मू-कश्मीर अपनी नदियों की ताकत का इस्तेमाल विकास, उद्योग और रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कर रहा है.
जनवरी 2025 में गिलगित-बाल्टिस्तान के हुंजा में करीब 1,000 निवासियों ने माइनस 15 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच काराकोरम हाईवे को जाम कर दिया. उनकी शिकायत सीधी थी: उन्हें दिन में केवल एक या दो घंटे बिजली मिल रही थी. इस नाकेबंदी के कारण चीन जाने वाले माल से लदे दर्जनों ट्रक रास्ते में फंस गए. ये लोग एशिया की कुछ सबसे शक्तिशाली नदियों के किनारे रहते हैं. वहीं, नियंत्रण रेखा के दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर हिमालय के इसी पानी को बिजली, उद्योग और रोजगार में बदल रहा है.
वे नदियां, जो इस्लामाबाद को देती हैं बिजली
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में 31 चालू जलविद्युत परियोजनाएं हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 3,205 मेगावाट है. यह क्षेत्र की अधिकतम बिजली मांग 400 मेगावाट से आठ गुना अधिक है. इसके बावजूद, यहां पैदा होने वाली बिजली का बहुत कम हिस्सा स्थानीय लोगों के काम आता है.
969 मेगावाट क्षमता वाला नीलम-झेलम जलविद्युत संयंत्र 2018 से पाकिस्तान के राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को बिजली दे रहा है. यह संयंत्र कई वर्षों तक PoJK सरकार के साथ किसी औपचारिक समझौते के बिना चलता रहा. वहीं, मंगला बांध से जुड़े समझौते के तहत इस्लामाबाद ने पानी के इस्तेमाल के लिए क्षेत्र को केवल 42 पैसे प्रति यूनिट का भुगतान किया. वर्ष 2021-22 में यह राशि महज 71.2 करोड़ रुपये थी.
इन बिजली संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को इसका बहुत कम लाभ मिलता है. PoJK का बिजली विभाग अधिकतम मांग के समय केवल 330 मेगावाट बिजली की आपूर्ति कर पाता है. इसके कारण करीब पांचवां हिस्सा मांग अधूरा रह जाता है. यहां प्रति व्यक्ति सालाना बिजली खपत महज 408 किलोवाट-घंटे है.
वर्ष 2024 में बिजली विभाग ने 2,807 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी, लेकिन केवल 1,673 मिलियन यूनिट ही बेच पाया. यानी खरीदी गई हर पांच यूनिट में से लगभग दो यूनिट का नुकसान हुआ. इतना ही नहीं, क्षेत्र की करीब चार फीसदी आबादी के पास अब भी बिजली का कनेक्शन नहीं है.
बिजली के बिलों ने भड़काया विरोध
बिजली की कमी और महंगाई से जुड़ी परेशानियों का असर सड़कों पर दिखाई देने लगा. वर्ष 2023 में आटे की कीमतें बढ़ने और बिजली की दरों में उछाल आने के बाद लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए. इसके बाद ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने मांग की कि लोगों को बिजली उन्हीं दरों पर उपलब्ध कराई जाए, जिन लागतों पर PoJK के अपने बांध बिजली पैदा करते हैं.
मई 2024 में कमेटी की ओर से किए गए चक्का जाम आंदोलन ने पूरे क्षेत्र को ठप कर दिया. इस दौरान हुई झड़पों में एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई. हालात शांत करने के लिए इस्लामाबाद को 23 अरब रुपये की सब्सिडी देने का फैसला करना पड़ा. PoJK के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया कि बिजली और गेहूं जैसे अहम मुद्दे उनकी सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं.
गिलगित-बाल्टिस्तान में भी अंधेरे की मार
गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति इससे भी खराब है. यहां 171 बिजली उत्पादन केंद्र हैं, जिनकी स्थापित क्षमता केवल 239 मेगावाट है. सर्दियों में ये केंद्र महज 117 मेगावाट बिजली पैदा कर पाते हैं, जबकि क्षेत्र की मांग 455 मेगावाट तक पहुंच जाती है. इस तरह जरूरत की करीब तीन-चौथाई बिजली की कमी बनी रहती है. सर्दियों के दिनों में गिलगित में 19 से 20 घंटे तक बिजली कटौती होती है. वर्ष 2021 के बाद इस क्षेत्र में बिजली की कीमतें दोगुने से भी ज्यादा बढ़ चुकी हैं.
गर्मियों में भी लोगों को राहत नहीं मिलती. जुलाई 2026 में गिलगित और चिलास के निवासियों ने एक बार फिर काराकोरम हाईवे जाम कर दिया. उस समय तापमान करीब 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा था, जबकि लोगों को रोजाना 10 घंटे से अधिक की बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा था.
इस क्षेत्र में पाकिस्तान की रणनीतिक बांध परियोजना ने भी स्थानीय लोगों की नाराजगी बढ़ाई है. इस्लामाबाद ने डायमर-भाषा बांध को देश की पानी और ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से तैयार किया था. लेकिन जिन परिवारों ने इस परियोजना के लिए अपनी जमीन दी थी, उन्हें अब भी मुआवजे और रोजगार के वादों को पूरा किए जाने का इंतजार है. अप्रैल 2026 में इन परिवारों ने अपनी मांगों को लेकर हाईवे जाम कर दिया और बांध के लिए अधिग्रहित जमीन के बदले मुआवजे तथा रोजगार की मांग उठाई.
जम्मू-कश्मीर बिजली उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा
जम्मू-कश्मीर की तस्वीर इससे अलग है. यहां वर्ष 2023-24 में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 1,532 किलोवाट-घंटे रही. तीन साल पहले यह आंकड़ा 1,322 किलोवाट-घंटे था. इस तरह जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति बिजली खपत PoJK की तुलना में 3.7 गुना अधिक है.
वर्ष 2023-24 में जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश ने अपनी बिजली की कुल मांग का 98.6 फीसदी पूरा किया. इस दौरान यहां के जलविद्युत संयंत्रों ने 16,300 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली का उत्पादन किया. अब जम्मू-कश्मीर अपनी जलविद्युत क्षमता का और अधिक इस्तेमाल करने के लिए तेजी से नई परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है. प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन की चिन्हित क्षमता 14,867 मेगावाट है.
वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में 32 जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं, जिनकी कुल क्षमता 3,540 मेगावाट है. प्रदेश की योजना वित्त वर्ष 2026-27 में ही 1,685.7 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की है. इसके बाद 2030-31 तक कुल क्षमता बढ़ाकर 7,315 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है. 900 मेगावाट क्षमता वाला बगलिहार जलविद्युत संयंत्र पहले से ही प्रदेश की बिजली उत्पादन व्यवस्था का अहम हिस्सा है. वहीं, 1,000 मेगावाट क्षमता वाली पाकल दुल और 624 मेगावाट की किरू परियोजनाएं अगली बड़ी परियोजनाओं में शामिल हैं.
दिसंबर 2035 तक जम्मू-कश्मीर अपनी कुल जलविद्युत उत्पादन क्षमता को करीब 11,000 मेगावाट तक पहुंचाना चाहता है. यह मौजूदा क्षमता के तीन गुने से भी अधिक होगी. इस विस्तार में 1,856 मेगावाट क्षमता वाली सावलकोट परियोजना भी अहम भूमिका निभाएगी.
बिजली ग्रिड को मजबूत करने पर भी जोर
जम्मू-कश्मीर में केवल बिजली उत्पादन ही नहीं बढ़ाया जा रहा, बल्कि बिजली की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क को भी मजबूत किया जा रहा है. प्रदेश का बिजली विकास विभाग 1,66,376 सर्किट किलोमीटर लंबी बिजली लाइनों का संचालन करता है. इसकी ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन क्षमता 31,743.5 मेगावोल्ट-एम्पियर है. इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर का लक्ष्य ग्रिड से जुड़ी 500 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करना और 15,000 सोलर पंप उपलब्ध कराना है.
बिजली वितरण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्मार्ट मीटर भी लगाए जा रहे हैं. जून 2024 तक प्रदेश में 5.74 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके थे. इनके इस्तेमाल से बिजली के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन में होने वाले नुकसान में एक-चौथाई की कमी आई और हर महीने बिजली बिलों से होने वाली वसूली में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
एक जैसी नदियां, लेकिन दोनों तरफ अलग-अलग हालात
झेलम और किशनगंगा नदियों का उद्गम जम्मू-कश्मीर में होता है. किशनगंगा नदी को पाकिस्तान में नीलम के नाम से जाना जाता है. ये नदियां आगे चलकर PoJK में प्रवेश करती हैं.
भारतीय क्षेत्र में इन नदियों के पानी से घरों को रोशन किया जा रहा है, कारखाने चल रहे हैं और बिजली ग्रिड का लगातार विस्तार हो रहा है. इसके उलट, पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में इन्हीं नदियों का पानी दूर-दराज के शहरों को बिजली देने वाले संयंत्रों को चलाता है, जबकि नदी किनारे रहने वाले लोगों को 20 घंटे तक बिजली कटौती झेलनी पड़ती है. वे अपने अधिकारों के लिए हाईवे जाम करते हैं और बिजली के बिलों के खिलाफ आंदोलन करने को मजबूर होते हैं.
भूगोल ने कश्मीर के दोनों हिस्सों को प्राकृतिक संसाधनों के रूप में एक जैसी संपदा दी है. लेकिन इन संसाधनों का इस्तेमाल कैसे किया जाए और इनका लाभ वहां रहने वाले लोगों तक किस तरह पहुंचाया जाए, इस मामले में दोनों तरफ की तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है.