पितृ पक्ष में आज द्वितीया श्राद्ध, पितरों की शांति के लिए ऐसे करें तर्पण और पिंडदान, जानें कुतुप काल और विधि

Pitra Paksha 2026: पितृ पक्ष में आज द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. जानें कुतुप काल का सही समय, तर्पण-पिंडदान की विधि और पंचबलि से जुड़ी जरूरी बातें.

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Pitra Paksha 2026: पितृ पक्ष में पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करने और उनके निमित्त तर्पण-पिंडदान करने की परंपरा है. इस दौरान हर तिथि का श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनका निधन उसी तिथि को हुआ हो. 28 सितंबर 2026 को द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित की जाती है. चावल, दूध, घी, शहद और काले तिल से तैयार पिंड अर्पित करने की भी परंपरा है.

28 सितंबर को ही क्यों होगा द्वितीया श्राद्ध?

पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि 27 सितंबर की रात 8 बजकर 58 मिनट से शुरू होकर 28 सितंबर की शाम 7 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के नियम के अनुसार द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर, सोमवार को किया जाएगा. इस दिन उन पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो.

द्वितीया श्राद्ध का कुतुप काल

श्राद्ध कर्म में दोपहर के समय पड़ने वाले कुतुप काल को विशेष महत्व दिया जाता है. 28 सितंबर को कुतुप काल सुबह 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक रहेगा. इसी अवधि में श्राद्ध और तर्पण करना शुभ माना जाता है. हालांकि कुतुप काल का वास्तविक समय स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा.

कैसे करें द्वितीया तिथि का श्राद्ध?

द्वितीया तिथि के श्राद्ध में पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है. इसके लिए आटे, चावल या जौ से गोल पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित किए जाते हैं. इसके बाद जल में काले तिल मिलाकर तर्पण किया जाता है. तर्पण करते समय कुश धारण करने की परंपरा है. कुश एक प्रकार की पवित्र घास मानी जाती है, जिसकी अंगूठी बनाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में पहनी जाती है.

श्राद्ध के बाद क्या करें?

श्राद्ध कर्म पूरा करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा है. इसके बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया श्राद्ध पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है.

क्या है पंचबलि की परंपरा?

श्राद्ध के दौरान पंचबलि का भी विशेष महत्व बताया गया है. इसके तहत गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों समेत जीव-जंतुओं के लिए भोजन का एक हिस्सा अलग निकालकर रखा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है. इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सभी जीवों के प्रति सम्मान की परंपरा के रूप में भी देखा जाता है. पितृ पक्ष में किए जाने वाले इन कर्मकांडों का उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण, उनकी शांति के लिए प्रार्थना और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना है.

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