Jiutiya Vrat: आज रखा जा रहा जीउतिया व्रत, माताओं के लिए खास है यह दिन, जानें पूजा का शुभ समय और नियम

जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जीउतिया भी कहा जाता है, माताओं के लिए बेहद खास माना जाता है. इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं.

Jiutiya Vrat 2026 jeevitputrika know the auspicious time for worship and the rituals
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Jiutiya Vrat 2026: जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जीउतिया भी कहा जाता है, माताओं के लिए बेहद खास माना जाता है. इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं. व्रत की तारीख को लेकर इस बार लोगों के बीच असमंजस है. धार्मिक पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि शनिवार को पड़ रही है. इसी आधार पर शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जा रहा है.

शनिवार को रखा जाएगा जीवित्पुत्रिका व्रत

जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि में रखने की परंपरा है. निर्णयसिंधु में भी प्रदोष काल में अष्टमी तिथि होने पर जीमूतवाहन की पूजा का उल्लेख मिलता है. इसी नियम को देखते हुए इस वर्ष शनिवार को व्रत रखना उचित माना गया है.

शाम 4:52 से 6:20 बजे तक पूजा का समय

जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन पूजा का समय शाम 4:52 बजे से 6:20 बजे तक बताया गया है. इस दौरान आर्द्रा नक्षत्र रहेगा. व्रत रखने वाली महिलाएं इसी समय के बीच जीमूतवाहन की पूजा कर सकती हैं.

मान्यता है कि महिलाएं यह व्रत अपने बच्चों की रक्षा, लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण की कामना से रखती हैं. श्रद्धा के साथ व्रत और पूजा करने से संतान के सुख और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है.

एक दिन पहले से शुरू होती है तैयारी

जीवित्पुत्रिका व्रत की तैयारी एक दिन पहले से शुरू हो जाती है. परंपरा के अनुसार महिलाएं ब्रह्ममुहूर्त में जल, अन्न और फल ग्रहण करती हैं. इसके बाद अष्टमी तिथि में निर्जला व्रत शुरू किया जाता है. इस दौरान पूरे दिन और रात पानी तक नहीं पिया जाता है.

ऐसे करें जीमूतवाहन की पूजा

शाम के समय जीमूतवाहन की कुशा से बनी प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है. पूजन में जल, पंचामृत, रक्षासूत्र, चंदन, फूल, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य आदि चढ़ाए जाते हैं.

जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की आकृतियां भी बनाई जाती हैं. इनके माथे पर लाल सिंदूर लगाया जाता है. इसके बाद विधि के अनुसार पूजा पूरी की जाती है.

पूजा के बाद सुनी जाती है व्रत कथा

जीमूतवाहन की पूजा पूरी होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने की परंपरा है. इसमें राजा जीमूतवाहन से जुड़ी कथा सुनाई जाती है. महिलाएं अपने बच्चों और परिवार के कल्याण, उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए श्रद्धा से कथा सुनती हैं.

धार्मिक परंपरा में पूजा और कथा के बाद ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने का भी महत्व बताया गया है. मान्यता के अनुसार इससे संतान सुख और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है. इसे धार्मिक आस्था और परंपरा के तौर पर ही देखा जाता है.

रविवार को होगा व्रत का पारणा

जीवित्पुत्रिका व्रत का पारणा अगले दिन यानी रविवार सुबह 7:27 बजे के बाद करने की बात कही गई है. व्रत रखने वाली महिलाएं पारणा करने से पहले अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग में समय एक बार जरूर देख लें, क्योंकि स्थान के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है.