इस साल दिल्ली की दीवाली होगी धमाकेदार! कोर्ट की टिप्पणी ने बढ़ाई उम्मीद, हट सकता है पटाखों से बैन

Court On Firecrackers In Delhi: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को लेकर चल रही सुनवाई में फैसला सुरक्षित रख लिया है. न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ इस मामले पर विचार कर रही है और आने वाले दिनों में आदेश जारी कर सकती है.

Delhi Diwali grand this year Court increases hope ban on firecrackers may be lifted
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Court On Firecrackers In Delhi: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को लेकर चल रही सुनवाई में फैसला सुरक्षित रख लिया है. न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ इस मामले पर विचार कर रही है और आने वाले दिनों में आदेश जारी कर सकती है. कोर्ट की टिप्पणी और बहस के स्वरूप से यह संकेत मिल रहे हैं कि दिवाली के दौरान कुछ शर्तों के साथ ग्रीन पटाखों के प्रयोग की अनुमति दी जा सकती है.

ग्रीन पटाखे वे आतिशबाज़ियाँ होती हैं जिन्हें इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि वे परंपरागत पटाखों की तुलना में कम हानिकारक रसायन छोड़ें. इन पटाखों का निर्माण नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) और पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जाता है. इन पटाखों में सल्फर, नाइट्रेट और भारी धातुओं की मात्रा सीमित होती है, जिससे इनका पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है.

दिल्ली सरकार की तरफ से क्या कहा गया?

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए, ने अदालत के समक्ष यह आग्रह किया कि NEERI और PESO द्वारा प्रमाणित ग्रीन पटाखों को ही बिक्री और उपयोग की अनुमति दी जाए. उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि लड़ी वाले पटाखों (Chain Crackers) पर पहले की तरह पूरी तरह प्रतिबंध जारी रहे.

केवल उन्हीं निर्माताओं को ग्रीन पटाखे बनाने की अनुमति दी जाए जिन्हें NEERI और PESO का प्रमाणपत्र मिला हो. निर्माण इकाइयों की नियमित जांच की जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पटाखों में मानकों के अनुरूप रसायन इस्तेमाल किए जा रहे हैं. दिल्ली सरकार ने यह भी सुझाव दिया कि दिवाली, गुरुपर्व और क्रिसमस जैसे त्योहारों पर सीमित समय के लिए ग्रीन पटाखों की अनुमति दी जा सकती है, उदाहरण के तौर पर दिवाली पर रात 8 बजे से 10 बजे तक.

क्या पटाखों पर बैन से वायु गुणवत्ता सुधरी?

चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण सवाल उठाया. उन्होंने पूछा, "2018 से अब तक जब पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया, क्या उस दौरान वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में कोई सुधार देखने को मिला?"

इस पर सॉलिसिटर जनरल मेहता ने जवाब दिया कि AQI में कोई खास बदलाव नहीं आया है. केवल कोविड-19 महामारी के दौरान जब आर्थिक गतिविधियाँ थमीं और गाड़ियाँ सड़कों से गायब हो गईं, तब वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ था, लेकिन वह भी पटाखों पर प्रतिबंध की वजह से नहीं था.

अन्य वकीलों ने भी समर्थन करते हुए कहा कि पराली जलाना, वाहन उत्सर्जन और उद्योगों से निकले धुएं जैसे बड़े कारणों को दरकिनार कर सिर्फ पटाखों को प्रदूषण का कारण बताना एकतरफा नजरिया है.

“बच्चों की खुशी भी जरूरी” 

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा, "बच्चों को पटाखे जलाने के लिए मनाने में ही माता-पिता का एक घंटा लग जाता है. त्योहारों पर पूरी तरह समय सीमा तय करना उनकी खुशी छीनने जैसा होगा." उन्होंने कोर्ट से अपील की कि बच्चों की भावनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को भी ध्यान में रखा जाए.

कितने उत्पादकों को मिली ग्रीन पटाखे बनाने की अनुमति?

सुनवाई में यह बात भी सामने आई कि NEERI और PESO ने अब तक केवल 49 उत्पादकों को ग्रीन पटाखे बनाने की अधिकारिक अनुमति दी है. इस पर अदालत ने सवाल किया कि क्या बाजार में सिर्फ इन्हीं के बनाए पटाखे बेचे जाएंगे?

इस पर मेहता ने जवाब दिया कि दिल्ली सरकार इन्हीं 49 उत्पादकों को अनुमति देने की सिफारिश कर रही है, ताकि बाजार में अवैध या गैर-प्रमाणित पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई जा सके.

“दिल्ली की वजह से हमें क्यों सजा?”

पटाखा उद्योग से जुड़े वकीलों ने कोर्ट में यह आपत्ति जताई कि सिर्फ दिल्ली की वायु गुणवत्ता को आधार बनाकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कई शहरों में भी पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जबकि इन राज्यों की स्थिति और जनसंख्या घनत्व अलग है.

उन्होंने कहा कि इस प्रतिबंध से कई राज्यों की स्थानीय अर्थव्यवस्था, खासकर पटाखा कारोबार और उससे जुड़े हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है. वकीलों का कहना था कि अगर समस्या केवल दिल्ली में है, तो बाकी राज्यों को बिना सुने प्रतिबंध क्यों लगाया गया?

कोर्ट का नजरिया: “संतुलन बनाना होगा”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक तरफ स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा जरूरी है, तो दूसरी तरफ संस्कृति, परंपरा और नागरिकों की भावनाएं भी महत्वपूर्ण हैं. न्यायमूर्ति गवई ने इशारा दिया कि अदालत किसी एक पक्ष का झुकाव किए बिना संतुलित फैसला सुनाना चाहेगी.

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