बदल गया युद्ध का तरीका! यूक्रेन से ऑपरेशन सिंदूर तक… ड्रोन कैसे बन गए वॉर के सबसे घातक हथियार?

यूक्रेन युद्ध को चार साल से अधिक समय बीत चुका है और अब युद्ध के मैदान में सबसे घातक हथियार न तो टैंक रह गया है और न ही भारी तोप. इसकी जगह एक छोटी, सस्ती मशीन ने ले ली है, जिसे कई किलोमीटर दूर बैठा सैनिक स्क्रीन पर नजर रखते हुए उड़ाता है.

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यूक्रेन युद्ध को चार साल से अधिक समय बीत चुका है और अब युद्ध के मैदान में सबसे घातक हथियार न तो टैंक रह गया है और न ही भारी तोप. इसकी जगह एक छोटी, सस्ती मशीन ने ले ली है, जिसे कई किलोमीटर दूर बैठा सैनिक स्क्रीन पर नजर रखते हुए उड़ाता है. यूक्रेन का दावा है कि अब उसके युद्धक्षेत्र में 80 प्रतिशत से अधिक हमले ड्रोन के जरिए किए जा रहे हैं. अकेले 2025 में ड्रोन ने करीब 8.20 लाख लक्ष्यों पर हमला किया.

इस बदलाव का असर सेनाओं की आवाजाही पर भी दिखाई दे रहा है. युद्ध के मोर्चे पर भारी बख्तरबंद वाहनों की मौजूदगी काफी कम हो गई है. रूसी सैनिक अब मोटरसाइकिलों और पैदल छोटे-छोटे समूहों में आगे बढ़ते हैं, क्योंकि बड़े सैन्य वाहनों या समूहों को ड्रोन आसानी से देख लेते हैं और कुछ ही मिनटों में निशाना बना सकते हैं. इससे एक बात साफ हो गई है कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में छिपना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है. अब जो दिखाई देगा, उसके निशाने पर आने का खतरा भी बढ़ जाएगा.

ड्रोन ने बदला युद्ध का स्वरूप

इस बदलाव की शुरुआत यूक्रेन से नहीं हुई, लेकिन यूक्रेन ने इसे बड़े औद्योगिक स्तर पर अपनाया. साल 2020 में हुए 44 दिनों के नागोर्नो-काराबाख युद्ध में अजरबैजान ने सशस्त्र ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल किया. इन हथियारों की मदद से पहले आर्मेनिया की हवाई रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया और फिर तोपखाने के सहयोग से खुले में मौजूद बख्तरबंद वाहनों को नष्ट किया गया. तस्वीरों और वीडियो से पुष्टि किए गए न्यूनतम आंकड़ों के अनुसार, आर्मेनिया ने कम से कम 224 टैंक गंवाए. उसके पुराने रडार छोटे और धीमी गति से उड़ने वाले विमानों को पहचानने में सक्षम नहीं थे. इसके अलावा, ड्रोन के नियंत्रण और संचार लिंक को बाधित करने वाले जैमर की भी कमी थी.

पश्चिम एशिया के संघर्ष ने ड्रोन युद्ध का आर्थिक पहलू भी सामने रखा है. 28 फरवरी को शुरू हुए इस साल के ईरान युद्ध के पहले सप्ताह में तेहरान ने इजरायल और खाड़ी देशों की ओर 2,000 से अधिक एकतरफा हमलावर ड्रोन दागे. प्रत्येक ड्रोन की अनुमानित कीमत 20,000 से 50,000 डॉलर के बीच थी. इसके मुकाबले उन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मिसाइलों की कीमत प्रति मिसाइल 30 लाख से 1.2 करोड़ डॉलर तक बताई गई. यानी हमलावर को कुछ ड्रोन लक्ष्य तक पहुंचाने हैं, जबकि बचाव करने वाले पक्ष को हर ड्रोन रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. ऐसी स्थिति में कोई देश सैन्य मुकाबले में सफल होने के बावजूद आर्थिक गणित में नुकसान उठा सकता है.

भारत ने भी देखा ड्रोन युद्ध का नया दौर

भारत को भी मई 2025 में ड्रोन युद्ध की चुनौती का सामना करना पड़ा. 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत के बाद भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया. इस अभियान में भारतीय सेना ने सीमा पार किए बिना पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में स्थित नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया. इस कार्रवाई में लोइटरिंग म्यूनिशन भी इस्तेमाल किए गए. नई दिल्ली में पोलैंड के राजदूत ने बाद में पुष्टि की कि इस अभियान में इस्तेमाल के बाद भारत ने वॉर्मेट (Warmate) प्रणालियों के लिए नए ऑर्डर दिए थे.

इसके जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू से लेकर भुज तक के शहरों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन के झुंड भेजे. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने बाद में कहा कि इनमें से ज्यादातर को काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक तरीकों से निष्क्रिय कर दिया गया और किसी भी ड्रोन से सैन्य या नागरिक बुनियादी ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचा. उनके बयान का व्यापक संदेश यह था कि ड्रोन और ड्रोन-रोधी प्रणालियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब भारत की रणनीतिक जरूरत बन चुकी है.

लोइटरिंग म्यूनिशन की बढ़ती अहमियत

लोइटरिंग म्यूनिशन आधुनिक युद्ध में इस बदलाव के केंद्र में हैं. इन्हें ड्रोन और मिसाइल के बीच की एक तकनीक माना जा सकता है. इन्हें एक छोटी टीम अपने साथ ले जा सकती है और कुछ ही मिनटों में लॉन्च कर सकती है. ये किसी क्षेत्र के ऊपर चक्कर लगाते हुए लक्ष्य की तलाश करते हैं. ऑपरेटर लक्ष्य की पुष्टि करने के बाद हमला कर सकता है. जरूरत पड़ने पर हमले को रद्द करके दूसरे लक्ष्य की तलाश भी की जा सकती है. पहले सटीक हमला करने के लिए लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल या गाइडेड तोप के गोले की जरूरत पड़ती थी, जो महंगे और सीमित संख्या में उपलब्ध होते हैं. अब एक सैनिक दल अपने साथ ले जाए जा सकने वाले लोइटरिंग म्यूनिशन के जरिए ऐसी क्षमता हासिल कर सकता है. ये हथियार निगरानी करने और आसमान से जानकारी जुटाने में भी मदद करते हैं.

भारत के लिए अब सवाल यह नहीं है कि ऐसे हथियार सेना में शामिल किए जाएं या नहीं, बल्कि यह है कि उनका निर्माण देश में कहां और किस स्तर पर किया जाए. भारतीय सेना ने आपातकालीन खरीद प्रक्रिया के तहत वॉर्मेट प्रणाली को शामिल किया और लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों से लेकर मैदानी इलाकों तक इसका परीक्षण किया है. डब्ल्यूबी ग्रुप की कंपनी डब्ल्यूबी इंडिया अब उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में ट्यूब से लॉन्च होने वाले इसके एक संस्करण की उत्पादन इकाई स्थापित करने की योजना बना रही है. इस योजना का उद्देश्य आयातित कलपुर्जों की जगह भारतीय कलपुर्जों का इस्तेमाल बढ़ाना है, बशर्ते वे तय मानकों पर खरे उतरें. लंबे युद्ध के लिए ऐसी तकनीकों का होना जरूरी है, जिन्हें युद्ध के अनुभवों के आधार पर बेहतर बनाया जा सके और देश में ही तैयार किया जा सके.

डब्ल्यूबी ग्रुप की वॉर्मेट लोइटरिंग म्यूनिशन प्रणालियां पहले से भारतीय सेना के पास हैं और लद्दाख में इनके परीक्षण भी किए जा चुके हैं. कंपनी के फ्लाईआई (FlyEye) निगरानी ड्रोन के साथ मिलकर वॉर्मेट करीब 100 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों पर हमला कर सकता है. यह सेंसर से लक्ष्य की पहचान करने और फिर हथियार के जरिए उस पर हमला करने की क्षमता को जोड़ता है. इसी तरह की व्यवस्था शाक्तिबाण (Shaktibaan) इकाइयों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है. डब्ल्यूबी इंडिया कठिन भौगोलिक और परिचालन परिस्थितियों के अनुरूप अपने सिस्टम में बदलाव करने और उन्हें इस्तेमाल करने वाली सैन्य इकाइयों के नजदीक ही रखरखाव की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी काम कर सकती है.

भारतीय कंपनियां भी बढ़ा रहीं योगदान

देश की अन्य कंपनियां भी स्वदेशी ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन के उत्पादन में योगदान बढ़ा रही हैं. सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) ने भारतीय सेना को एक ही खेप में 450 नागास्त्र-1आर (Nagastra-1R) लोइटरिंग म्यूनिशन की आपूर्ति की है. कंपनी के अनुसार, सेना को एक बार में की गई यह अपनी तरह की सबसे बड़ी आपूर्ति है. इसके अलावा, 14 अगस्त 2026 को रक्षा मंत्रालय ने नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और निबे प्राइवेट लिमिटेड के साथ अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए. इन समझौतों के तहत भारतीय सेना के लिए लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम, हथियार और अन्य सहायक उपकरण खरीदे जाने हैं. इन अनुबंधों की कुल कीमत करीब 1,577 करोड़ रुपये बताई गई.

भारत को आगे क्या करना होगा? 

भारत के सामने अब तीन प्रमुख प्राथमिकताएं हैं. पहली प्राथमिकता बड़े पैमाने पर उत्पादन की है. यूक्रेन ने 2025 में ही करीब 25 लाख छोटे हमलावर ड्रोन बनाने की योजना बनाई थी, जबकि भारत में ऐसे हथियारों के ऑर्डर अभी भी सैकड़ों की संख्या में गिने जा रहे हैं. भारत को अपने भंडार इस तरह तैयार करने होंगे कि वे कुछ दिनों के बजाय कई सप्ताह तक चलने वाले युद्ध में भी पर्याप्त साबित हों. इसके लिए ऐसी उत्पादन इकाइयों की जरूरत है, जो जरूरत पड़ने पर तेजी से उत्पादन बढ़ा सकें.

दूसरी प्राथमिकता कम लागत में ड्रोन को रोकने की क्षमता विकसित करना है. ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि भारत की कई स्तरों वाली वायु रक्षा प्रणाली सीमित अवधि के ड्रोन हमले को रोक सकती है. लेकिन लंबे समय तक सस्ते ड्रोन के खिलाफ महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं होगा. इसलिए ड्रोन को नष्ट करने वाली तोपों, संचार और नियंत्रण संकेतों को बाधित करने वाले जैमर तथा दुश्मन के ड्रोन को रोकने वाले इंटरसेप्टर ड्रोन की भूमिका बढ़ानी होगी. इन प्रणालियों के जरिए कम लागत में ज्यादा संख्या में आने वाले हमलों का मुकाबला किया जा सकता है.

तीसरी प्राथमिकता सैन्य रणनीति और प्रशिक्षण में बदलाव की है. सेना की हर इकाई को न केवल ड्रोन का प्रभावी इस्तेमाल करना सीखना होगा, बल्कि दुश्मन के ड्रोन से खुद को छिपाने और बचाने के तरीके भी अपनाने होंगे. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना द्वारा हमलावर और ड्रोन-रोधी झुंडों के साथ किए जा रहे अभ्यास इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हैं. बिना पायलट वाले युद्धक्षेत्र की अवधारणा अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है. आने वाले समय में वही देश रणनीतिक बढ़त बनाए रख सकेगा, जो तेजी से ड्रोन बना सकेगा, नई तकनीकों के अनुसार खुद को ढाल सकेगा और युद्ध में नष्ट हुए हथियारों की जगह जल्द नए हथियार उपलब्ध करा सकेगा.

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