कोई बना सारथी, कोई ‘पंचरत्न’ की ढाल, तो कोई प्रेस की गाड़ी से पहुंचा! दिल्ली की सियासत के अनोखे पैंतरे

Political popcorn: पुलिस की सख्त नाकाबंदी के बीच अजय कुमार लल्लू टीवी चैनल की गाड़ी में सवार होकर विजय चौक पहुंचे, उनके इस अनोखे पैंतरे ने सियासी गलियारों में चर्चाओं को हवा दे दी.

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Political Popcorn

1.जब ‘आयोग’ बन जाए अखाड़ा !

सड़कों पर ‘संसदीय’ दांव-पेंच!

​दिल्ली की सियासी फिजाओं में इन दिनों गर्माहट कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही है. चुनाव सुधारों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष ने जहां जंतर-मंतर पर मोर्चा खोला, वहीं बीजेपी मुख्यालय से पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्षी रणनीति की हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बीजेपी ने इस पूरे प्रदर्शन को ‘अराजक तत्वों का फ्लॉप शो’ करार देते हुए दोटूक कहा कि देश संसद से चलेगा, सड़क पर दिल्ली को बंधक बनाकर नहीं. प्रसाद ने एसआईआर (SIR) को विशुद्ध संवैधानिक प्रक्रिया बताते हुए सवाल दागा कि जो देश के नागरिक नहीं हैं या मृतक हैं, उनका नाम वोटर लिस्ट में कैसे रह सकता है, घुसपैठियों को वोटर क्यों माना जाए? राजनीतिक प्रेक्षक इस जुबानी जंग को केवल एक दिन का विरोध नहीं, बल्कि आगामी चुनावी समर की धारदार रिहर्सल मान रहे हैं. सचमुच जब एक तरफ राहुल गांधी के राष्ट्रपति से मुलाकात के दावों पर सवाल उठें और दूसरी तरफ शैडो बॉक्सिंग के आरोप लगें, तो चाय की चुस्कियों के बीच सियासी पारा चढ़ना लाजिमी है. अलबत्ता, सत्ता पक्ष का कहना है कि वे लोकतांत्रिक प्रदर्शन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन आम जनता को परेशान करने और आगजनी की साजिशों को देश कभी स्वीकार नहीं करेगा !

2.अटलांटिक पार से बयानों के तीर, साउथ ब्लॉक की सधी तदबीर!

अमेरिकी वीजा नीतियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ता पर भारत का संप्रभु रुख !

​वाशिंगटन से लेकर बर्लिन तक कूटनीतिक मेजों पर भारत की आर्थिक नीतियों की चर्चा गर्म है. अमेरिकी चुनावों के बीच भारतीय प्रवासियों और ग्रीन कार्ड को लेकर आए कुछ विदेशी बयानों पर नई दिल्ली ने बेहद नपे-तुले शब्दों में अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. वहीं दूसरी ओर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विदेशी धरती से संकेत दिया है कि व्यापार समझौतों पर भारत अपनी शर्तों और हितों से समझौता किए बिना आगे बढ़ रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि भारत अब दबाव की राजनीति से परे अपनी विदेश नीति का एजेंडा खुद तय करने की स्थिति में है. सचमुच वैश्विक मंचों पर गरिमा और व्यापारिक लाभ दोनों को एक साथ साधना आसान काम नहीं होता. अलबत्ता घरेलू विपक्ष का मानना है कि वैश्विक उतार-चढ़ाव के बीच स्थानीय निर्यातकों के हितों की रक्षा सबसे पहले होनी चाहिए. सरकार का भरोसा है कि बातचीत सही दिशा में है और अर्थव्यवस्था मजबूत पायदान पर खड़ी है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि वैश्विक राजनीति की इस बिसात पर आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते का ऊंट किस करवट बैठता है ?

3.जब सांसद महोदय बने ‘सारथी’ और कार बनी ‘गुप्त मंत्रणा कक्ष’!

रणनीति लीक होने के डर से डेरेक ओ'ब्रायन खुद बने ममता बनर्जी के ड्राइवर !

​दिल्ली में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों के तीखे विरोध-प्रदर्शन के बीच तृणमूल कांग्रेस के खेमे से गोपनीयता की एक दिलचस्प बानगी सामने आई है. गठबंधन की रणनीति और योजनाओं की भनक किसी तीसरे कान तक न पहुंचे, इसके लिए टीएमसी ने सुरक्षा का ऐसा घेरा खींचा कि राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन खुद ही ‘ड्राइविंग सीट’ पर आ बैठे. गुरुवार को दिल्ली एयरपोर्ट पर पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के उतरते ही डेरेक अपनी निजी कार से उन्हें रिसीव करने पहुंचे और खुद गाड़ी चलाते हुए पहले सांसद अभिषेक बनर्जी के आवास और फिर संसद में हुई संयुक्त बैठक तक ले गए. राजनीतिक प्रेक्षक इसे केवल निष्ठा नहीं, बल्कि सियासत में भेद खुलने के डर से उपजी अति-सतर्कता मान रहे हैं. सचमुच जब बड़े-बड़े राजनीतिक सिपहसालार ड्राइवर की भूमिका खुद संभाल लें, तो समझा जा सकता है कि गुप्त मंत्रणा कितनी नाजुक रही होगी. अलबत्ता सत्ता पक्ष के गलियारों में इसे सुरक्षा नियमों और स्थापित प्रोटोकॉल से हटकर एक रोचक सियासी ड्रामा करार दिया जा रहा है. अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि ड्राइविंग सीट पर बैठकर बंद शीशों के पीछे साधी गई यह गोपनीयता क्या आगामी चुनावी मोर्चे पर कोई ठोस और टिकाऊ गुल खिला पाएगी?

4.'प्रेस’ के पहिये पर सवार होकर नाकाबंदी पार कर गए नेताजी!

आलाकमान की नजरों में खुद को चमकाने की होड़ !

​दिल्ली के दिल विजय चौक पर जब शुक्रवार शाम विपक्षी सांसदों के जमावड़े का ऐलान हुआ तो पुलिस प्रशासन ने भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हुए पूरे इलाके को छावनी में बदल दिया और कार्यकर्ताओं की धरपकड़ शुरू कर दी. ऐसे कड़े पहरे के बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने का जो नायाब जुगाड़ निकाला, उसने सबको हैरान कर दिया. पुलिस की चौकसी को गच्चा देने के लिए लल्लू किसी राजनीतिक काफिले के बजाय सीधे एक टीवी चैनल की गाड़ी में सवार हो गए और चुपके से सीधे विजय चौक पहुंच गए. राजनीतिक प्रेक्षक इस जुगत को सिर्फ विरोध दर्ज कराने का जज्बा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों से पहले आलाकमान की नजरों में खुद को चमकाने की होड़ से भी जोड़कर देख रहे हैं. सचमुच जब खादी और कैमरे की जुगलबंदी इस अंदाज में हो जाए तो नाकाबंदी तोड़ना भी एक सियासी कला बन जाता है. अलबत्ता प्रशासनिक हलकों का तर्क है कि मीडिया के विशेषाधिकार वाले वाहनों का इस तरह राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल होना सुरक्षा नियमों के लिहाज से कतई उचित नहीं है. ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि इस हाई-वोल्टेज ‘एंट्री’ से हाईकमान के दिल में तो जगह पक्की हो जाएगी, लेकिन क्या यह अनोखी तरकीब आने वाले चुनावों में जनता के बीच भी कोई असरदार छाप छोड़ पाएगी?

5.सेनापति के इर्द-गिर्द ‘पंचरत्न’ का पहरा, क्या पार लगेगी रणनीति की नैया!

चुनाव आयोग के खिलाफ धरने में राहुल गांधी के भरोसेमंद बने ढाल !
 
​मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की जिद पर अड़े विपक्षी कुनबे के तीन दिवसीय सियासी दंगल में राहुल गांधी की कप्तानी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है. लुटियंस दिल्ली की सड़कों पर चले इस शक्ति प्रदर्शन के दौरान सबसे दिलचस्प नजारा यह रहा कि राहुल गांधी के इर्द-गिर्द पार्टी के चुनिंदा 5-6 दिग्गज नेताओं का एक अभेद्य सुरक्षा घेरा हर पल मुस्तैद दिखा. संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा, सांसद दीपेंद्र हुड्डा, मणिक्कम टैगोर, गौरव गोगोई और अमरिंदर सिंह राजा वडिंग इस पूरे आंदोलन में नेताजी के प्रमुख संकटमोचक की भूमिका निभाते नजर आए. राजनीतिक प्रेक्षक इस सघन घेराबंदी को केवल सुरक्षा या समन्वय नहीं, बल्कि राहुल गांधी की रणनीति को किसी भी भटकाव या अप्रत्याशित चूक से बचाने की सोची-समझी कवायद मान रहे हैं. सचमुच जब मीडिया ब्रीफिंग से लेकर सांसदों की कतार साधने तक की डोर इन विश्वस्तों के हाथ में हो तो साफ झलकता है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है. कांग्रेस इसे एसआईआर और वोटर लिस्ट के जरिए लोकतंत्र को बचाने का पवित्र संघर्ष बता रही है. अलबत्ता सत्ता पक्ष के रणनीतिकार इसे राहुल गांधी की छवि को चमकाने के लिए तैयार की गई एक नियंत्रित और प्रायोजित कवायद करार दे रहे हैं. अब गलियारों में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि चुनिंदा दरबारी सलाहकारों के इस मजबूत पहरे से राहुल गांधी का यह सियासी दांव मतदाताओं के दिलों को छू पाएगा या यह सिर्फ एक कोर-ग्रुप की रणनीतिक बाजीगरी बनकर सिमट जाएगा?

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