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हिंदू धर्म में मुखाग्नि को अंतिम संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है. इसे आत्मा की आगे की यात्रा से जोड़कर देखा जाता है.


गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार की विधियों का विस्तार से वर्णन मिलता है, लेकिन बेटियों के मुखाग्नि देने पर स्पष्ट प्रतिबंध का उल्लेख नहीं मिलता.


पुराने समय में परिवार का ज्येष्ठ पुत्र अंतिम संस्कार करता था. समय के साथ यह सामाजिक परंपरा बन गई, जिसे धार्मिक नियम समझ लिया गया.


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुत्र न होने पर अन्य योग्य परिजन अंतिम संस्कार कर सकते हैं. कई विद्वान बेटियों द्वारा मुखाग्नि देने को भी स्वीकार्य मानते हैं.


आज कई परिवारों में बेटियां अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार कर रही हैं. इसे कर्तव्य, सम्मान और समान अधिकार की भावना से देखा जा रहा है.


मुखाग्नि का उद्देश्य दिवंगत को श्रद्धापूर्वक विदाई देना है. सबसे महत्वपूर्ण भावना, श्रद्धा और धार्मिक विधि का पालन माना जाता है.

