स्मृति का अगला ठिकाना दिल्ली या लखनऊ? राज्यसभा से यूपी के रण तक सस्पेंस, सियासी गलियारों में हलचल

Political Popcorn: दिल्ली से लखनऊ और पटना से कोलकाता तक सियासी गलियारों में हलचल तेज है. मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड, स्मृति ईरानी की संभावित भूमिका, बिहार में DGP की रेस, SIR पर विपक्षी गोलबंदी और राहुल गांधी से जुड़े सियासी घटनाक्रमों ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी.

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Political Popcorn

1.रिपोर्ट कार्ड में बजी घंटी !

किसी को शाबाशी तो किसी की छुट्टी तय?

राजधानी दिल्ली के सेवा तीर्थ में 23 और 24 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुई दो दिवसीय गोपनीय चिंतन बैठक के भीतर की छनकर आई खबरों ने कई मंत्रियों की रात की नींद उड़ा दी है. पीएमओ और सेक्टोरल ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज द्वारा तैयार गोपनीय 'रिव्यू रिपोर्ट कार्ड' के मुताबिक केवल 65 फीसदी कैबिनेट मंत्री ही प्रधानमंत्री की सख्त कसौटियों पर खरे उतरे हैं, जिनमें कुछ को ‘एक्सीलेंट’ रेटिंग मिली है. अलबत्ता 35 फीसदी मंत्रियों का परफॉरमेंस औसत या उससे भी खराब आंका गया है. राज्य मंत्रियों का हाल तो और भी पतला है, जहां महज 23 फीसदी ही उम्मीदों पर पास हुए और बाकी में खराब प्रदर्शन वालों की तादाद ज्यादा है. सचमुच सरकार के सुशासन के तराजू पर परफॉरमेंस ही एकमात्र पैमाना बनता दिख रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे आगामी संभावित फेरबदल की पूर्व-तैयारी मान रहे हैं !

2.दिल्ली की दहलीज या लखनऊ का दंगल !

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सीटों का खाली होना और स्मृति ईरानी के अगले राजनीतिक रोल पर सस्पेंस !

​उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की खाली हो रही सीटों और दिनेश शर्मा के अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनने के बाद पैदा हुए शून्य ने सियासी सरगर्मियां चरम पर पहुंचा दी हैं. इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा आकर्षण पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम बना हुआ है. 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद संगठन ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर सक्रिय रखा, लेकिन अब लुटियंस जोन में कानाफूसी है कि उन्हें उच्च सदन भेजा जाएगा या 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के रण में किसी अहम भूमिका के साथ उतारा जाएगा. अलबत्ता उनके साथ राष्ट्रीय महासचिव बने हरीश द्विवेदी भी संसद पहुंचने की मजबूत कतार में हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि पार्टी नेतृत्व स्मृति ईरानी के मुखर तेवरों का इस्तेमाल राष्ट्रीय पटल पर करना चाहेगा या राज्य की सियासत में, यह एक बेहद नपा-तुला फैसला होगा. सचमुच स्मृति का अगला पड़ाव पार्टी के बड़े संतुलन को साधेगा. अब प्रश्न यह है कि अगला ठिकाना संसद का उच्च सदन होगा या यूपी की कोई हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट?

3.एक तरफ जाम का सुरूर, दूसरी तरफ नोटों का गुरूर!

बिहार के नए डीजीपी की रेस..पटना से दिल्ली तक राजनीतिक आकाओं के दर पर हाजिरी !

​बिहार में पुलिस महानिदेशक की खाली होने वाली सबसे बड़ी कुर्सी को हथियाने के लिए सीनियर आईपीएस अफसरों के बीच पर्दे के पीछे शह-मात का खेल उफान पर है. पटना के सत्ता गलियारों से लेकर दिल्ली के लुटियंस तक पॉलिटिकल बॉसेज के बंगलों पर रात-दिन चक्कर काटे जा रहे हैं. सूत्रों का दावा है कि रेस में आगे चल रहे दो मुख्य दावेदारों की गोपनीय कुंडली पहले ही दिल्ली आलाकमान की मेज पर पहुंच चुकी है. खबर तो यह भी गरम है कि एक दावेदार साहब का अधिकांश वक्त 'सोमरस' और महफिलों के सुरूर में बीतता है, तो दूसरे साहब पर 'लक्ष्मी कृपा' और नोटों के लेन-देन को लेकर भारी शिकायतों की फाइलें तैयार हैं. अलबत्ता सरकार राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर जीरो टॉलरेंस का संदेश देना चाहती है, जिससे चयनकर्ताओं के पसीने छूट रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मुस्कुराते हुए कह रहे हैं कि बिहार की ब्यूरोक्रेसी में लॉबिंग का यह मुकाबला अब किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है !

4.'एकला चलो' वाली दीदी और साथी... खरगे जी की घंटी पर कौन खोलेगा कुंडी?

एसआईआर के नाम पर खरगे की विपक्षी गोलबंदी की कोशिश ! 

​चुनाव दर चुनाव साथियों के नखरे झेलने के बाद भी कांग्रेस का 'गठबंधन प्रेम' कम होने का नाम नहीं ले रहा. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के बहाने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक बार फिर ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को फोन खड़काकर साझा आंदोलन की गुहार लगाई है. अलबत्ता बंगाल में कांग्रेस नेताओं को दिन-रात पानी पी-पीकर कोसने वाली तृणमूल और यूपी में कांग्रेस को दोयम दर्जे पर रखने वाले अखिलेश क्या वाकई सड़क पर खरगे के पीछे चलेंगे? राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि जब खुद का संगठन सुस्त पड़ा हो, तो दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कांग्रेस की यह पुरानी आदत है. सचमुच, अपने दम पर भीड़ जुटाने में हांफ रही पार्टी अब क्षेत्रीय क्षत्रपों की बैसाखियों के सहारे माहौल बनाने की हसरत पाले बैठी है. अब प्रश्न यही है कि दिल्ली के बंद कमरों में फोन घुमाकर एकता का दम भरने वाली कांग्रेस क्या राज्यों में अपने सहयोगियों से अपनी ही फजीहत होने से बचा पाएगी?

5.इंदौर में फिसली जुबान, तो दरबारी दिग्गजों को थमा दिया 'री-ट्वीट' का फरमान!

इंदौर में छात्रों के तीखे सवालों से घिरे राहुल गांधी, साख बचाने के लिए वरिष्ठ नेताओं पर डिजिटल पहरेदारी !

​इंदौर में छात्रों के साथ संवाद में राहुल गांधी जब असहज सवालों और तर्कों के भंवर में फंसे, तो सोशल मीडिया पर उड़े मजाक ने पूरी पार्टी की नींद हराम कर दी. आनन-फानन में 10, जनपथ के हुक्मरानों ने एक फरमान जारी कर दिया कि पार्टी के तमाम दिग्गज और बड़े फॉलोअर्स वाले नेता अब राहुल के हर बयान और पोस्ट को अनिवार्य रूप से री-ट्वीट और कोट करेंगे. शशि थरूर जैसे गंभीर और बौद्धिक नेता भी अब आलाकमान के इस 'डिजिटल व्हिप' के दबाव में दिन-रात टाइमलाइन पर राहुल की ढाल बनने को मजबूर हैं. अलबत्ता पार्टी के भीतर ही यह कानाफूसी तेज है कि जब नेताजी खुद सार्वजनिक मंचों पर होमवर्क करके नहीं आते, तो उनकी किरकिरी का ठीकरा बाकी नेताओं के सिर क्यों फोड़ा जाए? राजनीतिक प्रेक्षक साफ कह रहे हैं कि जबरन री-ट्वीट करवाकर सोशल मीडिया पर आभासी माहौल तो बनाया जा सकता है, लेकिन जनता की नजरों में समझदारी साबित नहीं की जा सकती. सचमुच स्वतंत्र आवाज का दावा करने वाले बड़े क्षत्रपों को महज 'आईटी सेल का सिपाही' बना देना क्या कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र का चेहरा उजागर करता है. यक्ष प्रश्न यही है कि क्या री-ट्वीट की यह जबरन पहरेदारी राहुल गांधी की फिसलती सियासी साख को जमीन पर संभाल पाएगी?

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