1. पतंग वाले भाईजान पर सरकार की 'गुलाबी' नजरें!
किरेन रिजिजू ने की असदुद्दीन ओवैसी की तारीफ..विपक्षी नेताओं को नसीहत या नया नैरेटिव?
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के एक ताजा बयान ने सियासी गलियारों में सबको चौंका दिया है, जिसमें उन्होंने एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की समझदारी की खुलकर दाद दी. रिजिजू ने साफ किया कि नीतियों से असहमति अपनी जगह है, लेकिन ओवैसी कभी-कभी राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर बिल्कुल सही बात करते हैं. अलबत्ता रिजिजू यहीं नहीं रुके और विपक्षी नेताओं को ओवैसी से सीखने तक की सलाह दे डाली ताकि यह साफ हो सके कि कौन भारत विरोधी गुट में है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विपक्ष के INDIA गठबंधन में दरार चौड़ी करने और ओवैसी के बहाने पूरे विपक्ष को घेरने का सटीक दांव मान रहे हैं. सचमुच जब धुर विरोधी खेमे से कसीदे पढ़े जाएं, तो दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही रंग बदलती दिखती है. अब सियासी चौपालों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि यह तारीफ ओवैसी की सियासत को धार देगी या विपक्ष के आरोपों को नया ईंधन?
2. पूजा पंडाल में परिक्रमा या सियासी पेप टॉक?
कार्यकर्ताओं में जोश भरने और मां के आशीर्वाद की दोहरी जुगत!
दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर भाजपा नेता नितिन नवीन दो दिवसीय दौरे पर पटना पहुंचे, जिसे पार्टी के रणनीतिकार उनके लिए काफी अहम मान रहे हैं. दौरे के पहले दिन उन्होंने राजधानी के ऐतिहासिक डाक बंगला चौराहा स्थित पंडाल में शीश नवाया, जबकि दूसरे दिन भी सुबह 9 से शाम 5:40 बजे तक कई पंडालों और सांगठनिक बैठकों का मैराथन शिड्यूल तय है. अलबत्ता, भक्ति भाव के इस माहौल के बीच असल हलचल पार्टी के आंतरिक संवाद और कार्यकर्ताओं को 'पेप टॉक' देने को लेकर है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मसले पर जब विपक्ष और सिविल सोसायटी सरकार को घेरने में जुटे हैं, ऐसे वक्त में कैडर का मनोबल ऊंचा रखना बेहद जरूरी हो गया है. सचमुच, सियासत में आस्था और संगठन के शक्ति प्रदर्शन का यह संगम कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकने का सबसे मुफीद जरिया रहा है. अब सत्ता के गलियारों में यक्ष प्रश्न यही गूंज रहा है कि पंडालों की यह परिक्रमा और संगठनात्मक मंत्रणा जमीन पर कार्यकर्ताओं के जोश को किस हद तक रिचार्ज कर पाएगी?
3. खाली हुई सीट और 'पूरी' तैयारी!
एल मुरुगन के इस्तीफे के बाद एमपी से हरदीप पुरी की दावेदारी की चर्चा!
मध्य प्रदेश में डॉ. एल मुरुगन के इस्तीफे के बाद खाली हुई राज्यसभा सीट को लेकर दिल्ली से भोपाल तक चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म है. सत्ता के अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी को मध्य प्रदेश के कोटे से उच्च सदन भेजने की पुख्ता तैयारी चल रही है. अलबत्ता, मध्य प्रदेश भाजपा के स्थानीय कद्दावर नेता भी इस खाली कुर्सी पर टकटकी लगाए बैठे थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व अनुभव और कैबिनेट संतुलन को तवज्जो देने के मूड में दिखता है,राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि पुरी जैसे वरिष्ठ और रणनीतिकार चेहरे को संसद में बनाए रखना सरकार की प्राथमिकताओं में शुमार है. सचमुच दिल्ली की कैबिनेट से तय होने वाले फैसलों के आगे राज्यों की स्थानीय फेहरिस्त हमेशा दोयम साबित होती रही है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि इस संभावित फैसले से मध्य प्रदेश के स्थानीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाएं शांत रहेंगी या अंदरूनी असंतोष धीमे सुर में सुलगता रहेगा?
4. गठबंधन की हांडी में जुबानी तड़का!
तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस के बीच जुबानी जंग..वरिष्ठ वकील सांसद बने संकटमोचक!
तमिलनाडु में डीएमके और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मणिकम टैगोर के बीच तल्खी इस कदर बढ़ गई है कि दरारें सड़क पर दिखने लगी हैं. टैगोर के तीखे बयानों पर डीएमके ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद कांग्रेस आलाकमान ने तुरंत दखल देते हुए अपने प्रदेश अध्यक्ष को जुबान पर लगाम लगाने की सख्त हिदायत दी. अलबत्ता, डैमेज कंट्रोल के लिए एक वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद को दोनों दलों के बीच सुलह-सफाई और मध्यस्थता के काम पर लगाया गया है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे वर्चस्व की स्वाभाविक नूराकुश्ती करार दे रहे हैं. सचमुच एक गलत बयान रिश्ते चटका सकता है. अब यक्ष प्रश्न यह बना हुआ है कि वकील साहब की कानूनी और राजनीतिक दलीलें गांठों को ढीला कर पाएंगी या मनमुटाव अंदर ही अंदर पकता रहेगा?
5. बड़ा काम' बनाम 'छोटू' का स्वाभिमान!
नेहा बोरा की एंट्री पर NSUI में बगावत!
छात्र संगठन NSUI में उस वक्त अजीबोगरीब बगावत देखने को मिली जब नेहा बोरा की नई एंट्री से नाराज पुराने जमीनी कार्यकर्ताओं ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप का नाम बदलकर तंजिया लहजे में 'वी द छोटू' रख दिया. कार्यकर्ताओं का साफ दर्द था कि लाठियां खाएं और पसीना बहाएं हम, जबकि मलाई और क्रेडिट कोई पैराशूट नेता ले उड़े. अलबत्ता बात जब बढ़ते-बढ़ते राहुल गांधी की चौखट तक पहुंची, तो उन्होंने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को तवज्जो देते हुए खुद इसे पार्टी की चूक माना और भरोसा दिलाया कि कैडर का सम्मान सबसे ऊपर रहेगा. राजनीतिक प्रेक्षक इस बगावत को कांग्रेस के भीतर 'जमीनी कार्यकर्ता बनाम पैराशूट कल्चर' की पुरानी और स्थायी बीमारी का नया लक्षण बता रहे हैं. सचमुच जब कार्यकर्ताओं का सब्र जवाब दे जाता है, तो सोशल मीडिया के छोटे-छोटे ग्रुप भी बड़े-बड़ों के सिंहासन हिला देते हैं. अब यक्ष प्रश्न यही है कि राहुल के मरहम के बाद क्या सच में 'छोटू' का कद बढ़ेगा या फिर अगली नियुक्तियों में यही कहानी दोहराई जाएगी?