कहीं मुलाकात पर सस्पेंस, कहीं चुनावी सर्वे की टेंशन... Political Popcorn में पढ़ें 5 बड़ी खबरें

Political Popcorn: राजनीतिक गलियारों में इन दिनों मुलाकातों से लेकर बैठकों और चुनावी तैयारियों तक हर तरफ हलचल तेज है. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री के दिल्ली में मुलाकात से दूरी बनाने की चर्चा ने कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी को हवा दे दी है.

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Political Popcorn

Political Popcorn: राजनीतिक गलियारों में इन दिनों मुलाकातों से लेकर बैठकों और चुनावी तैयारियों तक हर तरफ हलचल तेज है. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री के दिल्ली में मुलाकात से दूरी बनाने की चर्चा ने कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी को हवा दे दी है. यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विधायकों और संभावित दावेदारों का गोपनीय सर्वे सियासी बेचैनी बढ़ा रहा है. आंध्र प्रदेश में अनंत अंबानी के निवेश प्रस्ताव और राज्य सरकार के साथ हुए MoU ने उद्योग और सियासत के रिश्तों को नई चर्चा दी है.

दिल्ली में सेंट्रल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी की ऐतिहासिक धरोहर को लेकर उठे सवालों पर सरकार की सफाई के बाद मामला फिर सुर्खियों में है. वहीं विपक्षी एकजुटता की बैठक से सहयोगियों की दूरी और कांग्रेस के साथ रिश्तों की खींचतान ने गठबंधन की सियासत पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

1. वक्त मांगकर 'गायब' हुए पूर्व सीएम, दिल्ली दरबार में भृकुटियां तनीं!

गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर कांग्रेस आलाकमान नाराज!

राजधानी के सियासी गलियारों में इन दिनों 24 अकबर रोड और 10 राजाजी मार्ग के बीच चल रही एक अजीबोगरीब बेरुखी चर्चा का विषय बन गई है. खबर है कि पंजाब की कमान संभाल चुके पूर्व मुख्यमंत्री ने खुद आगे बढ़कर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात का समय मांगा था. अलबत्ता दिल्ली में ही मौजूद रहने के बावजूद साहब तय वक्त पर पार्टी सुप्रीमो की चौखट पर हाजिरी लगाने पहुंचे ही नहीं. सचमुच जब सूबे का कोई बड़ा चेहरा खुद वक्त लेकर ऐन मौके पर 'गायब' हो जाए, तो इसे सामान्य भूल नहीं बल्कि खुली अनुशासनहीनता ही माना जाता है. इस 'लापरवाह' अंदाज से शीर्ष नेतृत्व का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और अंदरखाने बेहद सख्त संदेश जारी कर दिया गया है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि पंजाब में हालिया सांगठनिक फेरबदल और खींचतान के बीच पूर्व सीएम का यह रवैया उनकी अपनी ही सियासी पिच को गीला कर सकता है. अब पार्टी के गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि इस 'मिसिंग एक्ट' के बाद क्या साहब के लिए दिल्ली दरबार के दरवाजे पहले की तरह सहजता से खुल पाएंगे या अगली मुलाकात के लिए उन्हें लंबी तपस्या करनी पड़ेगी?

2. चौराहों पर जासूसी, घर-घर दस्तक, माननीयों की धड़कनें तेज!

काम का हिसाब या टिकट कटने की किताब, सर्वे वाले आ गए जनाब!

लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी और घबराहट पसरी है. मिशन 2027 को साधने के लिए भगवा खेमे ने अपने मौजूदा विधायकों और संभावित दावेदारों की कुंडली खंगालने का ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि बड़े-बड़ों के माथे पर पसीना आ गया है. चाय की थड़ियों, बस स्टैंडों और चौक-चौराहों से लेकर सीधे ड्राइंग रूम तक पार्टी के गुप्त सिपहसालार जनता की नब्ज टटोलने में जुटे हैं. अलबत्ता संगठन इसे सामान्य लोकतांत्रिक कवायद बता रहा है, लेकिन माननीय जानते हैं कि इस बार 'एंटी-इनकंबेंसी' का बहाना बनाकर कई पुराने चेहरों की टिकट पर कैंची चलाने की पूरी तैयारी है. सचमुच जब विधानसभा प्रभारियों की गोपनीय डायरी, रिसर्च विंग का कच्चा-चिट्ठा और केंद्रीय प्रभारियों की पैनी निगाहें एक मेज पर मिलेंगी तो दूध का दूध और पानी का पानी होना तय है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि यह कड़ा फिल्टर जमीनी हकीकत को भांपने और हवा के रुख को अपने पक्ष में मोड़ने का अचूक चुनावी हथियार है. अब सूबे के विधायकों के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि जनता की अदालत में दर्ज हुआ उनका 'असली रिपोर्ट कार्ड' उन्हें फिर से विधायकी की कुर्सी दिलाएगा या सीधे घर बैठने का फरमान थमा देगा!

3.आंध्र की माटी, अंबानी का दिल, जब मंच से कहा- 'मुझे अपना बेटा समझें'!

सीएम चंद्रबाबू के सामने भावुक हुए अनंत अंबानी, ऐतिहासिक MoU पर लगी मुहर!

आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में सजा मंच केवल औपचारिक शिलान्यास भर नहीं था, बल्कि विकास और उद्योग के नए गठजोड़ का एक भव्य कैनवास बन गया. देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के युवा चेहरे अनंत अंबानी जब मंच पर आए तो उन्होंने न केवल निवेश की झोली खोली बल्कि "मुझे आंध्र का बेटा समझें" कहकर सूबे के दिलों की तारें भी छेड़ दीं. अलबत्ता जब मंच पर मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, डिप्टी सीएम पवन कल्याण और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक साथ मौजूद हों तो यह साफ हो जाता है कि तैयारी सिर्फ एक संस्थान की नहीं, बल्कि कृषि में एक नए युग की शुरुआत की है. सचमुच रिलायंस और आंध्र सरकार के बीच हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने यह दिखा दिया कि 'विकसित भारत 2047' का खाका केवल फाइलों में बंद नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरने को बेताब है. राजनीतिक प्रेक्षक मुस्कुराते हुए यह नोट कर रहे हैं कि अनंत अंबानी ने जिस सधे अंदाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को रेखांकित करते हुए 'आंध्र भूमि' को 'स्वर्ण भूमि' बनाने का संकल्प दोहराया, उसने केंद्र और राज्य के रिश्तों में भी चाशनी घोल दी है. अब सियासी और कॉरपोरेट गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि क्या तकनीक, भारी-भरकम पूंजी और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की यह त्रिवेणी देश के बाकी राज्यों के लिए भी विकास का नया ब्लूप्रिंट साबित होगी?

4. विरासतों का ठिकाना और 'कमरों' का फसाना, कर्तव्य पथ पर नया पता!

चार मंजिल की किताब, दो कमरों का हिसाब, कर्तव्य भवन-2 में सुरक्षित है 115 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर!

राजधानी दिल्ली के लुटियंस जोन में जब पुरानी ईंटों की जगह आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर ले रहा हो तो अफवाहों की स्याही बिखरना लाजिमी है. 1911 में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में कोलकाता से दिल्ली लाई गई ऐतिहासिक सेंट्रल सेक्रेटरिएट लाइब्रेरी के भविष्य को लेकर एक अखबार ने जब 'लावारिस विरासत' जैसी सनसनीखेज हेडलाइन बनाई, तो केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर आकर तथ्यों की असली तस्वीर सामने रख दी. अलबत्ता सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास के तहत शास्त्री भवन के सभी दफ्तरों को खाली करने का फरमान बहुत पहले जारी हो चुका था, लेकिन कुछ हलकों में यह भ्रम फैलाया जाने लगा कि चार मंजिलों में सिमटी किताबों का जखीरा अब बेघर हो जाएगा.राजनीतिक प्रेक्षक इस पूरे प्रकरण को प्रशासनिक गतिशीलता और पुरानी औपनिवेशिक फाइलों से निकलने की आधुनिक छटपटाहट के रूप में देख रहे हैं, जहां सरकार हर ऐतिहासिक पन्ने को सहेजते हुए नए भारत की भव्य इमारतों को आकार देने में जुटी है!

5. गठबंधन की थाली, 'एकला चलो' की ताली!

जब दूल्हा खुद ही शहनाई बजाने लगे, तो बारातियों का रूठना तो तय था!

दिल्ली में 'लोकतंत्र बचाने' के नाम पर बुलाई गई विपक्षी बैठक में उस वक्त अजीब सन्नाटा पसर गया, जब कांग्रेस के कथित 'स्वयंभू बड़े भाई' वाले तेवर देख अहम सहयोगियों ने एक-एक कर कन्नी काट ली. अलबत्ता संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ साथ खड़े होने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी और डीएमके ने जहां दूरी बनाए रखी, वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया ने बैठक के ठीक उसी मुहुर्त पर लखनऊ में राज्यसभा का पर्चा दाखिल करवाकर दिल्ली को अपनी प्राथमिकताओं का साफ आईना दिखा दिया. सचमुच वर्चुअल जुड़े उद्धव ठाकरे का कांग्रेस को 'एकला चलो' का चोला उतारने की नसीहत देना और हालिया चुनावी हकीकतों को दरकिनार कर कांग्रेस इकोसिस्टम का 'अकेले ही सत्ता आ रही है' वाले मुगालते में रहना अब सहयोगियों को हजम नहीं हो रहा. राजनीतिक प्रेक्षक इसे साफ शब्दों में सहयोगियों द्वारा दी गई वह चेतावनी मान रहे हैं कि सोशल मीडिया की हवा और वोटबैंक के अति-आत्मविश्वास से जमीनी गठबंधन नहीं चलते. अब इंदिरा भवन के गलियारों में यही यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि जब अपने ही आंगन के साथी मंच साझा करने से कतरा रहे हों तो दिल्ली की चौखट पर सजाया जा रहा यह विपक्षी मोर्चा चुनावी रण में किसका तंबू तानेगा और किसका उखाड़ेगा!

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