Political Popcorn: बंगाल में BJP की जीत से TMC को झटका, ट्रंप के हाथ भी लगी निराशा, पढ़ें 5 बड़ी खबरें

बंगाल में BJP की जीत से TMC को झटका लगा है, तो विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं. उधर, ट्रंप को नोबेल नहीं मिला और सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी पार्टियों के लिए परेशानी बन रही है. देखिए, इस बार के Political Popcorn में राजनीति की ऐसी ही चटपटी खबरें.

Political Popcorn BJPs win in Bengal deals a blow to TMC Trump Nobel
Political Popcorn

1- कमल की सुनामी और 'शुभेंदु' का दुर्ग: भगवा रंग में रंगा नंदीग्राम-रेजीनगर!

डबल इंजन मॉडल पर जनता की मुहर!

बंगाल की चुनावी पिच पर जब उपचुनाव की गेंद फेंकी गई, तो नतीजों ने सत्ता पक्ष के पक्ष में ऐसा माहौल बनाया कि राजनीतिक गलियारों में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी. नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों ही सीटों पर भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल कर यह संदेश देने की पूरी कोशिश की है कि राज्य का सियासी केंद्र अब पूरी तरह बदल रहा है. बूथ स्तर की माइक्रो-प्लानिंग और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व ने जहां नंदीग्राम के किले को अजेय साबित किया, वहीं मुस्लिम बहुल रेजीनगर में दर्ज हुई यह भारी जीत विपक्ष के पारंपरिक वोट बैंक में सीधी सेंध मानी जा रही है. सचमुच, भाजपा खेमे का दावा है कि अल्पसंख्यक समुदाय भी अब विकास, सुरक्षा और सुशासन के वादे पर भरोसा जता रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस जीत को बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के सर्वमान्य होते कद और भाजपा के इर्द-गिर्द सिमटती राजनीति का अहम पड़ाव मान रहे हैं. अलबत्ता, विपक्ष का यह तर्क भी अपनी जगह है कि उपचुनाव के रुझान अक्सर मौजूदा सत्ता और प्रशासनिक दबदबे के रुख पर निर्भर करते हैं. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या यह प्रचंड जीत वाकई बंगाल के हर कोने में स्थायी जनादेश का रूप ले चुकी है या आगे की राह में अभी कई सियासी मोड़ बाकी हैं !


2- दीदी के पुराने तिलस्म में फिर सेंध!

उपचुनाव में तृणमूल की करारी शिकस्त

जिस नंदीग्राम की लाल मिट्टी से कभी ममता बनर्जी का राजनीतिक पुनर्जन्म हुआ था, उसी जमीन पर अब तृणमूल समर्थित उम्मीदों को जो झटका लगा है, उसने कालीघाट के रणनीतिकारों के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं. रेजीनगर जैसी मुस्लिम बहुल सीट पर तृणमूल का तीसरे पायदान पर खिसकना इस बात का अलार्म बजा रहा है कि अल्पसंख्यक वोट बैंक पर पार्टी का एकाधिकार अब पहले जैसा निर्विवाद नहीं रहा. सचमुच, नतीजों ने संकेत दिया है कि भावनात्मक नारों, केंद्रीय जांच एजेंसियों के नाम पर विक्टिम कार्ड और पुरानी जुझारू सियासत की जगह अब मतदाता रोजगार और जमीनी काम को तवज्जो दे रहा है. संगठन के स्तर पर कार्यकर्ताओं में छाई हताशा और कैडर का दिशाहीन होना भी साफ नजर आने लगा है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि बंगाल अब ममता बनर्जी के पारंपरिक सियासी फॉर्मूले से आगे की सोच रहा है. अलबत्ता तृणमूल के समर्थक अब भी इसे एक अस्थायी झटका मानते हुए यह दलील दे रहे हैं कि दीदी की वापसी का इतिहास हमेशा अप्रत्याशित रहा है. मगर इस चुनावी मलबे के बीच यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या तृणमूल अपनी खोती हुई जमीन को नए विमर्श से वापस पा सकेगी या यह पतन का एक लंबा सिलसिला साबित होगा?

3. बेमेल गठबंधन का पंचर!

नंदीग्राम और रेजीनगर में 'इंडी' गठबंधन का प्रयोग पूरी तरह विफल !

दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में चाय पीकर बनाए जाने वाले गठबंधन जब बंगाल के अखाड़े में उतरे, तो जमीन का फासला खुलकर सामने आ गया. शीर्ष स्तर पर कांग्रेस, लेफ्ट और तृणमूल के बीच हुई रणनीतिक जुगलबंदी के बावजूद नंदीग्राम में ममता समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी की भारी शिकस्त ने यह साबित कर दिया कि यह मेल सिर्फ कागजों पर था, जनता के दिलों में नहीं. नेताओं ने हाथ तो मिला लिए, लेकिन नीचे का जमीनी कार्यकर्ता वोट ट्रांसफर कराने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ और पूरी रणनीति धड़ाम हो गई. सचमुच, युवाओं ने बेरोजगारी और सिस्टम के नाम पर बनाए जा रहे गठबंधन के नैरेटिव को दरकिनार करते हुए नतीजों को एकतरफा कर दिया. राजनीतिक प्रेक्षक इसे राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी गठबंधन मॉडल के लिए भी एक बड़ा संकट बता रहे हैं, क्योंकि बिना किसी एक सर्वमान्य चेहरे और सकारात्मक विजन के सिर्फ 'भाजपा रोको' का नारा अब मतदाताओं को रास नहीं आ रहा. अलबत्ता, गठबंधन के पैरोकार अब भी यह समझाने में जुटे हैं कि एकजुटता की यह तो बस शुरुआती आजमाइश थी. लेकिन इन दोनों सीटों की प्रचंड हार के बाद यक्ष प्रश्न यही छूट जाता है कि क्या यह बेमेल गठबंधन भविष्य में कोई गंभीर चुनौती पेश कर पाएगा या बंगाल में विपक्ष ऐसे ही गहरे शून्य में तैरता रहेगा?

4. ओस्लो से उड़ती धूल, वाशिंगटन का मलाल और नोबेल का नया ठिकाना!

ट्रंप के अरमां आंसुओं में बह गए..ओस्लो ने नावी पिल्लै को पहनाया शांति का सेहरा!

नॉर्वे की नोबेल समिति ने जब ओस्लो के बंद कमरों से लिफाफा खोला तो दुनिया भर में जश्न मना, लेकिन मार-ए-लागो और वाशिंगटन के कुछ कमरों में शायद एक गहरी ठंडी आह भी भरी गई होगी. डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक हर साल की तरह इस बार भी पूरी शिद्दत से उम्मीद लगाए बैठे थे कि अब्राहम अकॉर्ड से लेकर वैश्विक 'डील मेकिंग' के तमाम किस्सों के बदले ओस्लो से कोई बुलावा आ ही जाएगा, लेकिन नोबेल कमेटी ने साफ कर दिया कि शांति का तमगा राजनीतिक डीलों से नहीं, बल्कि दशकों के खामोश और फौलादी संघर्ष से हासिल होता है. दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं भारतवंशी नावी पिल्लै जिन्होंने नेल्सन मंडेला के कानूनी बचाव से लेकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत और संयुक्त राष्ट्र तक युद्ध अपराधों और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने में जिंदगी खपा दी अब इस सर्वोच्च सम्मान की हकदार बनी हैं.

राजनीतिक प्रेक्षक इस घोषणा पर चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि ट्रंप साहब के 'नोबेल अरमां' एक बार फिर ठंडे बस्ते में चले गए, क्योंकि जिस अंतरराष्ट्रीय कानून और अदालतों को वे अपने भाषणों में कठघरे में खड़ा करते रहे हैं, नोबेल कमेटी ने ठीक उसी व्यवस्था की सबसे कद्दावर पहरेदार के सिर पर शांति का ताज सजा दिया है. अलबत्ता अमेरिकी खेमे से अब भी यही दलीलें छनकर आ रही हैं कि वैश्विक स्थिरता में जो भूमिका बड़े राष्ट्राध्यक्षों की होती है, उसका वजन फाइलों और अदालतों के फैसलों से कहीं ज्यादा है!

5. कार्यकर्ताओं की अनदेखी से कैडर में बढ़ती निष्क्रियता?

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारों के सामने डैमेज कंट्रोल की चुनौती!

चुनावी मौसम में जो कार्यकर्ता चिलचिलाती धूप में झंडा उठाकर गली-कूचों की खाक छानता है, सरकार बनते ही वह अक्सर सचिवालय के गलियारों में अफसरों की बेरुखी झेलने को मजबूर हो जाता है. चाहे झंडा किसी भी रंग का हो, हर दल के सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं का दर्द एक जैसा ही रहता है-'अपनी ही सरकार में काम नहीं होते.' जब सिफारिशें ठंडे बस्ते में जाने लगती हैं और फाइलों पर बाबुओं की कलम भारी पड़ने लगती है, तो वही निष्ठावान कैडर धीरे-धीरे मायूस होकर घर बैठ जाता है,सचमुच यह खामोशी उस वक्त सबसे ज्यादा भारी पड़ती है जब चुनाव आते हैं और बूथ स्तर पर पर्ची बांटने वाला भी कोई नहीं मिलता.

राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर एकमत हैं कि यह बीमारी अब किसी एक दल तक सीमित नहीं है,भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों की ही राज्य सरकारें इस नैरेटिव की गिरफ्त में आ चुकी हैं. अलबत्ता शीर्ष नेतृत्व के पास अब भी वक्त है कि वह जमीनी असंतोष को भांपे और वक्त रहते डैमेज कंट्रोल की चाबी घुमाए, अब दोनों खेमों के सामने यही यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा है कि क्या हुकूमत के नुमाइंदे अफसरों की चौखट छोड़कर अपने कार्यकर्ताओं की सुध लेंगे या फिर अगली बार चुनावी नतीजों के झटके के बाद ही नींद से जागेंगे?